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एक्सक्लूसिव · 1 मिनट पहले

दूध जब तक, माँ तब तक?

जब तक दूध मिला, गाय हमारी थी; बूढ़ी हुई तो हाईवे और सरकार की? जानिए आवारा मवेशी संकट, डेरी अर्थशास्त्र और तथाकथित गौ-प्रेम।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 1 मिनट पहले
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दूध जब तक, माँ तब तक?

भारत के किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) पर चले जाइए। सड़क के बिल्कुल बीचों-बीच,डिवाइडर के पास एक गाय शांत भाव से बैठी मिलेगी।तेज रफ्तार से गुजरती गाड़ियों और हॉर्न के शोर से बेपरवाह। उस गाय की आँखों में न तो कोई शिकायत है और न ही कोई उम्मीद। लेकिन उसके ठीक पीछे देश की व्यवस्था, धर्म, कानून और अर्थशास्त्र का जो तमाशा चल रहा है, वह किसी डार्क कॉमेडी से कम नहीं है।

अदालत का दरवाजा खटखटाया जाए तो सुप्रीम कोर्ट आदेश देगा,"इसे हाईवे से हटाओ,यह जानलेवा है।"नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया(NHAI) तुरंत हाथ खड़े करके कहेगा,"हमारा काम सड़कें बनाना और टोल वसूलना है,शेल्टर होम चलाना नहीं। इसमें हजारों करोड़ रुपये लगेंगे,बजट कहाँ से आएगा?" राज्य सरकार कहेगी,"यह तो नगर निगम और स्थानीय निकायों (Municipality) का मामला है।" नगर निगम के अफसर फाइल आगे खिसका कर कहेंगे,"हम तो पकड़कर गौशाला भेज देंगे।"और गौशाला वाले कहेंगे,"हमारे पास न दाने के पैसे हैं,न जगह,हम नई गाय कहाँ रखें?"

इस पूरी सरकारी नौटंकी के बीच जिसे देसी भाषा में 'मुस्द्दीलाल का खेल' कहते हैं। वह गाय जस की तस सड़क पर खड़ी रहती है। तब तक,जब तक कि कोई 100 की रफ्तार से आती एसयूवी उससे टकरा न जाए। टक्कर होती है,गाय का शरीर छिन्न-भिन्न होता है,गाड़ी में बैठा इंसान मरता है या जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाता है। और फिर?फिर न्यूज चैनलों पर डिबेट शुरू होती है।"इसका सॉल्यूशन क्या है?"

लेकिन कड़वा सच यह है कि समाधान गाय के हाईवे पर पहुँचने के बाद शुरू नहीं होता;समाधान उस सोच से शुरू होता है जिसने उस गाय को हाईवे तक पहुँचाया है।

सवाल दूध का है

जब भी आवारा मवेशियों पर बात होती है,तो हमारा समाज कुतर्क देने लगता है।"बूचड़खाने बंद हो गए,इसलिए गाय सड़क पर है या किसान बेवफा हो गया है, वह बूढ़ी गाय को छोड़ देता है।" चलिए,किसान के रोल को भी मान लेते हैं। लेकिन इस पूरी बहस में हम सबसे बुनियादी सवाल को गोल कर जाते हैं।गाय आखिर पैदा क्यों हुई थी?

गाय कोई जंगल का जंगली जानवर नहीं है जो कुदरती रूप से हाईवे पर आ गया। गाय को इंसान ने अपनी जरूरत के लिए पैदा किया था।

जब तक इस देश में दूध,दही,पनीर,घी और मावे की मांग रहेगी,तब तक गाय और भैंसों की ब्रीडिंग (प्रजनन) करानी ही पड़ेगी।यह डेरी इंडस्ट्री का सीधा नियम है और प्रकृति का नियम क्या है? प्रकृति जब भी किसी जीव को जन्म देती है, तो 50% संभावना मेल (बछड़ा) की होती है और 50% फीमेल (बछड़ी) की।

हर पैदा हुआ बच्चा फीमेल नहीं होगा। जो नर बछड़े पैदा होंगे,वे आज के ट्रैक्टराइज्ड खेती के दौर में किसी काम के नहीं हैं। जो बछड़ी पैदा होगी,वह भी अपनी पूरी 20 साल की उम्र तक दूध नहीं देगी। वह अपनी जिंदगी के बमुश्किल 7-8 साल दूध देगी।

लेकिन पेट हर मवेशी का है! चाहे नर बछड़ा हो, दूध देने वाली गाय हो या दूध देना बंद कर चुकी बूढ़ी गाय—खाना, भूसा, पानी और इलाज तो 20 साल तक हर जीव को चाहिए। बस,यहीं आकर भारत का पूरा 'गौ-अर्थशास्त्र' (Cattle Economics) गड़बड़ा जाता है।

मुनाफा प्राइवेट,जिम्मेदारी पब्लिक

"जब तक दूध मिल रहा था,तब तक गाय हमारी 'माता' थी। जैसे ही दूध सूख गया,गाय NHAI की हो गई,नगर निगम की हो गई,गौशाला की हो गई,सरकार की हो गई और टैक्सपेयर की हो गई!"

यानी दूध बेचकर जो मुनाफा कमाया,वह डेरी मालिक और किसान की जेब में गया (प्राइवेट प्रॉफिट)। लेकिन जब वही गाय बूढ़ी हो गई,बीमार हो गई या बछड़ा अनुपयोगी हो गया,तो उसकी जिम्मेदारी समाज और सरकार पर फेंक दी गई (पब्लिक रिस्पॉन्सिबिलिटी)।हम बड़े गर्व से चिल्लाते हैं—"गौशालाएँ बनाओ! शेल्टर होम्स बनाओ!"अरे भाई,बना तो दो शेल्टर होम,लेकिन उसका 'फादर' (माई-बाप) कौन बनेगा?

20 साल तक उस गाय का हरा चारा, भूसा और दाना कौन खरीदेगा?

उसके इलाज और पशु चिकित्सक का खर्चा कौन उठाएगा?

और मान लीजिए, टैक्सपेयर के पैसे से आपने 1 लाख गायों का शेल्टर भर भी दिया, तो कल जो नई 1 लाख गायें बूढ़ी होंगी, वे कहाँ जाएँगी? क्या पूरा देश ही गौशाला बना दिया जाए?

हम एक ऐसे आर्थिक तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं जहाँ दूध का स्वाद तो सबको चाहिए, लेकिन उस दूध को पैदा करने वाली की वृद्धावस्था का खर्च उठाने में सबकी नानी याद आती है।

कहाँ है गौ-रक्षकों का'प्रेम'?

इस देश में'गौ-रक्षक' हैं,'गौ-सेवक' हैं,'गौ-पुत्र' हैं और ना जाने कितने 'गौ-प्रेमी' संगठन हैं। व्हाट्सएप ग्रुपों से लेकर सड़कों तक इनकी सक्रियता देखते ही बनती है। कहीं गौमांस या कत्लखाने की जरा सी अफवाह आ जाए—चाहे वह खबर सही हो या झूठी—इन्हीं गौ-भक्तों का खून तुरंत खौल उठता है। लाठियाँ निकल आती हैं, कानून हाथ में ले लिया जाता है, और मॉब लिंचिंग तक हो जाती है।

लेकिन वही 'गौ-पुत्र' जब शाम को अपनी चमचमाती बाइक से गुजरते हैं और सड़क के डिवाइडर पर बैठी किसी गाय को कचरे का ढेर, सड़ती हुई प्लास्टिक और ब्लड लगी हुई पन्नियाँ खाते देखते हैं... तब उनका 'गौ-प्रेम' अचानक कहाँ बिजी हो जाता है? तब उनका खून क्यों नहीं खौलता?

प्लास्टिक खाकर तड़प-तड़प कर मरती हुई गाय को देखकर किसी गौरक्षक के हाथ में लाठी क्यों नहीं आती? किसी नगर निगम अधिकारी या नेता का कॉलर क्यों नहीं पकड़ा जाता?

सच तो यह है कि इस देश में गौ-रक्षा एक भावनात्मक व्यापार और राजनीतिक हथियार बनकर रह गई है। अगर गाय सच में तुम्हारी 'माता' है, तो माँ के साथ रिश्ता सिर्फ तब तक का क्यों है जब तक वह स्तनपान करा रही है? दूध देना बंद करते ही माँ 'लावारिस संपत्ति' कैसे हो जाती है कि उसे ट्रैफिक के बीच मरने के लिए छोड़ दिया जाए?

गौ-रक्षा नहीं है,यह क्रूरता है!

हमने गौरक्षा का मतलब बहुत संकुचित और विकृत बना दिया है। हमारे लिए गौरक्षा का मतलब सिर्फ इतना है।"गाय को कटना नहीं चाहिए,गाय की हत्या नहीं होनी चाहिए।"लेकिन क्या किसी जीव को काटने से बचाकर,उसे प्लास्टिक खाने,गंदे नालों का पानी पीने,गाड़ियों से हड्डियाँ तुड़वाने और हाईवे पर तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ देना'रक्षा'कहलाता है? यह रक्षा नहीं, यह हत्या से भी ज्यादा भयानक क्रूरता है!

आप गाय को कटने मत दो,लेकिन कम से कम उसे ऐसी जिंदगी भी मत दो जिसके अंत में उसके लिए सिर्फ हाईवे का डिवाइडर,कचरे का ढेर और किसी ट्रक का पहिया ही बचे। अगर आप किसी जीव की गरिमापूर्ण जिंदगी की जिम्मेदारी नहीं ले सकते,तो आपको उसके जन्म और इस्तेमाल का अधिकार भी नहीं होना चाहिए।

कड़वी सच्चाई स्वीकार करो

अगर भारत को सच में इस हाईवे-क्राइसिस और आवारा मवेशियों की समस्या से निजात पानी है, तो हमें धर्म के चश्मे को उतारकर व्यावहारिक और कठोर कदम उठाने होंगे:

सख्त टैगिंग और ओनरशिप कानून (Traceability): हर पालतू गाय और भैंस का डिजिटल बारकोड/चिप (Ear Tagging) अनिवार्य हो,जो सीधे किसान या डेरी मालिक के आधार कार्ड से जुड़ा हो। अगर वह गाय सड़क पर लावारिस पाई जाती है, तो मालिक पर भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान हो।आप दूध का मलाई खाकर गाय को सड़क पर नहीं फेंक सकते।

सैलैक्सिस (Sex-Sorted Semen) का 100% उपयोग: सरकार को आर्टिफिशल इन्सेमिनेशन (AI) में सिर्फ सेक्स-सॉर्टेड सीमेन अनिवार्य कर देना चाहिए, जिससे 80% से अधिक केवल मादा (बछड़ी) ही पैदा हों। जब नर बछड़े पैदा ही नहीं होंगे, तो उन्हें सड़क पर फेंकने की नौबत ही नहीं आएगी।

दूध पर 'गौ-कल्याण सेस' (Cattle Welfare Tax): जो उपभोक्ता बाजार से दूध, घी या पनीर खरीदता है, प्रति लीटर दूध पर 1-2 रुपये का 'सिटिजन सेस' लगे। इस पैसे का इस्तेमाल केवल और केवल बूढ़ी गायों की वैज्ञानिक गौशालाओं (जहाँ उनके गोबर और मूत्र से सीएनजी/पेंट बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए) के संचालन के लिए हो।

ढोंग की राजनीति बंद हो: सरकारों को बजट आवंटन में ईमानदारी दिखानी होगी। हाईवे से गायों को हटाना NHAI और राज्य पुलिस की संयुक्त जिम्मेदारी बने, और हाईवे पर गाय से टक्कर होने पर टोल कंपनी/NHAI पर भारी जुर्माना ठोका जाए। जब टोल कंपनी की जेब से पैसा कटेगा, तो हाईवे पर कैटल गार्ड्स (Cattle Patrol) तुरंत तैनात हो जाएँगे।

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