भाजयुमो जिलाध्यक्ष कुलदीप रघुवंशी की नियुक्ति पर सवाल, 2023 के निष्कासन आदेश की चर्चा
नर्मदापुरम में कुलदीप रघुवंशी को भाजयुमो जिलाध्यक्ष बनाए जाने पर सवाल। 2023 में छह साल के निष्कासन आदेश और अक्टूबर 2026 की नियुक्ति ने संगठन के अनुशासन पर बहस छेड़ी।


नर्मदापुरम। भारतीय जनता पार्टी के युवा संगठन भारतीय जनता युवा मोर्चा में नर्मदापुरम जिले की नई नियुक्ति ने पार्टी के भीतर राजनीतिक समीकरणों और संगठनात्मक अनुशासन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इटारसी के कुलदीप रघुवंशी को भाजयुमो का जिला अध्यक्ष बनाए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल उनके पुराने निष्कासन आदेश को लेकर उठ रहा है। वर्ष 2023 में छह साल के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित किए गए कुलदीप को अक्टूबर 2026 में सीधे जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।
भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर ने 29 अक्टूबर को प्रदेश के 19 संगठनात्मक जिलों में जिला अध्यक्षों और महामंत्रियों की नियुक्ति की सूची जारी की। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सहमति से जारी इस सूची में नर्मदापुरम जिले से कुलदीप रघुवंशी को जिला अध्यक्ष और रूपेंद्र साहू को जिला महामंत्री बनाया गया है। नियुक्ति की घोषणा के बाद जिले की राजनीति में इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
2023 का विवाद और छह साल का निष्कासन
कुलदीप रघुवंशी का नाम अप्रैल 2023 में इटारसी के भाजयुमो नगर मंडल अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़े विवाद के दौरान सामने आया था। तत्कालीन नगर मंडल अध्यक्ष अभिषेक निर्मल के साथ विवाद और मारपीट की घटना के बाद संगठन में मामला काफी चर्चा में रहा था। इसके बाद तत्कालीन भाजपा जिलाध्यक्ष माधवदास अग्रवाल ने कुलदीप रघुवंशी को छह वर्ष के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित करने का निर्णय लिया था।
उस समय संगठन की ओर से की गई कार्रवाई को अनुशासनात्मक कदम के तौर पर देखा गया था। ऐसे में निष्कासन की निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले ही उन्हें युवा मोर्चा में जिले की शीर्ष जिम्मेदारी सौंपे जाने से संगठन के फैसलों की निरंतरता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या बदले राजनीतिक समीकरण?
जिले के राजनीतिक हलकों में इस नियुक्ति को केवल संगठनात्मक बदलाव के रूप में नहीं देखा जा रहा है। कुलदीप रघुवंशी को नर्मदापुरम विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा का करीबी समर्थक माना जाता है। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में इस नियुक्ति को विधायक खेमे के प्रभाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
हालांकि, नियुक्ति में किसी नेता के हस्तक्षेप या दबाव की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि कुलदीप रघुवंशी का निष्कासन आदेश औपचारिक रूप से निरस्त किया गया था या उनकी सदस्यता बहाल करने के लिए संगठन ने कोई अलग निर्णय लिया था।
संगठन के अनुशासन पर उठे सवाल
राजनीतिक विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि यदि किसी कार्यकर्ता को छह साल के लिए निष्कासित किया गया था, तो निर्धारित अवधि से पहले उसे संगठन में महत्वपूर्ण पद देने का आधार क्या रहा? क्या पार्टी ने पुराने अनुशासनात्मक फैसले की समीक्षा की? क्या निष्कासन समाप्त करने का कोई औपचारिक आदेश जारी हुआ? और क्या इस संबंध में जिला एवं प्रदेश संगठन के स्तर पर कोई प्रक्रिया अपनाई गई?
इन सवालों पर भाजपा संगठन की ओर से स्थिति स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है। क्योंकि संगठनात्मक नियुक्तियां केवल पदों का बंटवारा नहीं होतीं, बल्कि वे पार्टी के अनुशासन, निर्णय प्रक्रिया और कार्यकर्ताओं के बीच स्थापित संदेश को भी प्रभावित करती हैं।
फिलहाल कुलदीप रघुवंशी की नियुक्ति के साथ नर्मदापुरम भाजपा की अंदरूनी राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चा तेज है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि पार्टी नेतृत्व पुराने निष्कासन आदेश और नई नियुक्ति के बीच के अंतर को लेकर क्या स्पष्टीकरण देता है।
