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एक्सक्लूसिव · 1 मिनट पहले

बीजेपी नहीं तो कौन? हमारा जवाब क्या है!

"बीजेपी नहीं तो कौन?" क्या यह सवाल एक निर्मित नैरेटिव है? जानिए कैसे लोकतंत्र में सरकारें अस्थायी कर्मचारी होती हैं और नागरिकों का सवाल पूछना क्यों ज़रूरी है।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 1 मिनट पहले
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बीजेपी नहीं तो कौन? हमारा जवाब क्या है!

यह प्रश्न “बीजेपी नहीं तो कौन?” आज की भारतीय  राजनीति का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक मिथक बन चुका है। यह कोई सहज सवाल नहीं है, जो किसी नागरिक के मन में अपने देश की फिक्र से उपजा हो; बल्कि यह एक ऐसा गढ़ा गया नैरेटिव है,जिसे सालों की राजनीतिक रणनीति, मीडिया प्रबंधन और सोची-समझी ब्रांडिंग के जरिए हमारे और आपके अवचेतन मन में बिठा दिया गया है।

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इस एक सवाल ने भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर हमला किया है। इसने जनता को नागरिक से बदलकर एक लाचार दर्शक बना दिया है, जिसे यह विश्वास दिला दिया गया है कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि “बीजेपी नहीं तो कौन?”,असली सवाल यह है कि “बीजेपी जो भी करे,हम क्यों मौन?”

विकल्पहीनता की अवधारणा

जब आप किसी से पूछते हैं कि “बीजेपी नहीं तो कौन?”,तो अप्रत्यक्ष रूप से आप यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि सत्ता में बैठी पार्टी चाहे जो फैसले ले,चाहे जैसी नीतियां बनाए,वह किसी भी तरह की जवाबदेही से ऊपर है।

लोकतंत्र में 'विकल्प की कमी' का तर्क तानाशाही और निरंकुशता का पहला कदम होता है।140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में,जहाँ विविधताओं का समुद्र लहराता है,जहाँ हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली नेता,विचारक और नीतिकार मौजूद हैं।वहाँ यह दावा करना कि एक पार्टी या एक व्यक्ति के अलावा देश को चलाने के योग्य कोई नहीं है,भारतीय जनमानस की बौद्धिक क्षमता का अपमान है।

यह नैरेटिव रातों-रात तैयार नहीं हुआ। इसके पीछे वर्षों का ऐसा प्रचार तंत्र (Propaganda Machine) काम कर रहा है जिसका एकमात्र उद्देश्य विपक्ष को पूरी तरह खारिज करना,उसकी हर आलोचना को 'देशद्रोही' या 'कमजोर' साबित करना और सत्ता को एकमात्र रक्षक के रूप में पेश करना है।

स्वाभाविक कमजोरी या सोची-समझी रणनीति?

हाँ, यह सत्य है कि भारतीय विपक्ष में गंभीर संरचनात्मक,वैचारिक और रणनीतिक कमियाँ हैं। विपक्ष में नेतृत्व का संकट,स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडे का अभाव और जनता से जुड़ाव की कमी दिखाई देती है। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है,जिसे अनदेखा करना भारतीय लोकतंत्र के साथ छल होगा।

सवाल यह उठता है कि क्या विपक्ष केवल अपनी नाकामियों के कारण कमजोर हुआ है या उसे व्यवस्थित रूप से अपंग बनाया गया है?

संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल:जब केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED, CBI, Income Tax) का इस्तेमाल मुख्य रूप से विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने या उन्हें सत्ताधारी दल में शामिल होने के लिए मजबूर करने के लिए किया जाने लगे, तो यह निष्पक्ष राजनीतिक स्पर्धा के नियमों को बदल देता है।

संसाधनों का असमान वितरण:चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) जैसे माध्यमों से सत्ताधारी दल के पास अरबों रुपये का धनबल इकट्ठा हुआ,जबकि विपक्ष आर्थिक रूप से पंगु बना दिया गया।

मीडिया की भूमिका: मीडिया,जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, आज सत्ता का ढोल बजाने वाला यंत्र बन चुका है। मुख्यधारा के  समाचार चैनलों पर दिन-रात विपक्ष की कमियों, उसके अंतर्विरोधों और उसकी असफलताओं पर बहस होती है, लेकिन सत्ता की नीतियों, उसकी असफलताओं और उसके वादों पर सवाल पूछना जैसे अपराध बन गया है।

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नैतिक विरोधाभास की पराकाष्ठा

नागरिक के रूप में हमें उस सबसे बड़े विरोधाभास पर ध्यान देना होगा जो हमारी आंखों के सामने रोज घटित होता है।जब कोई नेता विपक्ष में होता है,तो सत्ताधारी पार्टी उसे भ्रष्टाचार,घोटाले और देशद्रोह का प्रतीक घोषित करती है।उसके खिलाफ जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं, रैलियों से उसके खिलाफ भाषण दिए जाते हैं और मीडिया में उसका चरित्र-हनन किया जाता है। लेकिन जैसे ही वही नेता सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो जाता है,उसके सारे आरोप जैसे हवा में गायब हो जाते हैं। जांच की रफ्तार धीमी हो जाती है या मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। वह रातों-रात 'स्वीकार्य' और 'ईमानदार' हो जाता है।

यह तथाकथित "पॉलिटिकल वॉशिंग मशीन" केवल राजनीतिक अवसरवादिता नहीं है;यह देश के नागरिकों की नैतिकता और समझदारी का सीधा मज़ाक है। यदि भ्रष्टाचार वास्तव में एक मुद्दा है, तो पार्टी बदलने से भ्रष्टाचार खत्म कैसे हो गया? और यदि भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं था,तो जनता को धोखा क्यों दिया गया?

जब नागरिक इस दोहरे मापदंड पर शांत रहते हैं, तो वे अनजाने में राजनीतिक भ्रष्टाचार के भागीदार बन जाते हैं।

जनता मालिक,सरकार कर्मचारी

हम इस बुनियादी सत्य को भूलते जा रहे हैं कि लोकतंत्र में जनता 'मालिक' (Employer) होती है और चुनी हुई सरकार केवल एक 'अस्थायी कर्मचारी' (Temporary Employee)।

आप अपने घर या व्यवसाय में किसी कर्मचारी को केवल इसलिए नौकरी पर बनाए नहीं रखते कि आपको दूसरा कर्मचारी ढूँढने में आलस आ रहा है। यदि कोई कर्मचारी काम नहीं करता,वादों को पूरा नहीं करता,या अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है,तो आप उससे सवाल पूछते हैं,उसे चेतावनी देते हैं और अंततः उसे बदलने का विकल्प चुनते हैं।

लेकिन  राजनीति में,नागरिकों ने उल्टा रुख अपना लिया है। वे सत्ताधारी पार्टी के बचावकर्ता बन गए हैं। जब सरकार से बेरोजगारी पर सवाल पूछा जाता है,तो नागरिक विपक्ष के इतिहास की बात करने लगते हैं। जब शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर बात होती है,तो धर्म और पहचान की राजनीति का बहाना बना दिया जाता है। जब महंगाई पर सवाल उठते हैं,तो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चुप रहने की सलाह दी जाती है।

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जिस क्षण नागरिक सरकार से सवाल पूछना बंद कर देते हैं और उसकी विफलताओं का औचित्य साबित करने में लग जाते हैं,उसी क्षण लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है।

असली कसौटी क्या होनी चाहिए?

किसी भी राजनीतिक दल के प्रति बिना शर्त वफादारी लोकतंत्र के लिए जहर के समान है। सरकारों का मूल्यांकन खोखले नारों,विशाल आयोजनों या भावनात्मक भाषणों के आधार पर नहीं होना चाहिए। उनका मूल्यांकन उन ठोस और ज़मीनी नतीजों पर होना चाहिए जो आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं:

शिक्षा: क्या हमारे सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों का स्तर बेहतर हो रहा है? क्या गरीब का बच्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा पाने में सक्षम है?

स्वास्थ्य सेवा: क्या गंभीर बीमारी के समय किसी आम परिवार को अपनी जमीन-जायदाद नहीं बेचनी पड़ती? क्या सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं और डॉक्टर उपलब्ध हैं?

रोजगार: क्या देश के करोड़ों युवाओं के पास उनकी योग्यता के अनुसार सम्मानजनक रोजगार के अवसर हैं?

महंगाई और जीवन स्तर: क्या आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) बढ़ी है, या बुनियादी जरूरतों की वस्तुएं उसकी पहुंच से बाहर होती जा रही हैं?

संस्थागत स्वतंत्रता: क्या देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग और पुलिस व्यवस्था बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर पा रही हैं?

सामाजिक सौहार्द: क्या समाज में आपसी विश्वास और शांति बढ़ रही है या नफरत और विभाजन की दीवारें गहरी हो रही हैं?

यदि इन पैमानों पर जवाब नकारात्मक है, तो सवाल पूछना नागरिक का कर्तव्य बन जाता है।

मौन की कीमत,कौन चुका रहा है?

जब नागरिक सवाल पूछना बंद कर देते हैं, तो उसकी कीमत पूरी पीढ़ी को चुकानी पड़ती है।

युवा भर्ती परीक्षाओं के लीक होते पेपरों, सालों तक रुकी हुई नौकरियों और बेरोजगारी के दौर से गुजरते हुए मौन की कीमत चुका रहे हैं।

किसान अपनी फसलों के वाजिब दाम और कर्ज के बोझ तले दबकर मौन की कीमत चुका रहे हैं।

मध्यम वर्ग बढ़ती महंगाई, भारी करों (Taxes) और घटती बचत के बीच पिसकर मौन की कीमत चुका रहा है।

गरीब और वंचित बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं के अभाव में अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार में देखकर मौन की कीमत चुका रहे हैं।

यह मौन शांति का प्रतीक नहीं है; यह नागरिकता के प्रति हमारी लापरवाही और लाचारी का प्रतीक बन गया है।

लोकतंत्र किसी एक पार्टी का मोहताज नहीं

"बीजेपी नहीं तो कौन?" का सवाल वास्तव में इस बात का डर दिखाता है कि हमारे पास कोई मसीहा नहीं है। लेकिन लोकतंत्र को किसी मसीहा की जरूरत ही नहीं होती। लोकतंत्र संस्थाओं, नियमों,संविधान और जागरूक नागरिकों से चलता है,किसी एक व्यक्ति या पार्टी से नहीं।

यदि आज विपक्ष कमजोर है,तो उसे मजबूत करने का तरीका सत्ता के आगे घुटने टेकना नहीं है। विपक्ष को मजबूर कीजिए कि वह जनता के मुद्दों पर बात करे। सत्ता पक्ष से सवाल पूछिए ताकि वह अपनी जिम्मेदारियों से भाग न सके।

विकल्प रातों-रात आसमान से नहीं टपकते। जब जनता सवाल पूछना शुरू करती है,जब जनता प्रदर्शन करती है,जब जनता अपने वोटों से सत्ता के घमंड को तोड़ती है।तब विकल्प खुद-ब-खुद पैदा होते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत की जनता ने अपनी ताकत का अहसास कराया है,तब-तब मजबूत से मजबूत सरकारों को झुकना पड़ा है और नए नेतृत्व का जन्म हुआ है।

अब जागने का वक्त

यह लेख किसी विशेष विपक्षी पार्टी को सत्ता में लाने का आह्वान नहीं है। कांग्रेस,क्षेत्रीय दल या कोई नया विकल्प कोई भी दल स्वतः ही दूध का धुला नहीं हो सकता। हर राजनीतिक दल सत्ता पाना चाहता है और बिना नियंत्रण के हर दल निरंकुश होने की प्रवृत्ति रखता है।

ज़रूरत इस बात की है कि हम किसी राजनीतिक दल के 'भक्त' या 'समर्थक' बनना बंद करें और 'नागरिक' बनना शुरू करें।

अपनी आंखें खोलिए और सवाल पूछिए

जब बजट का पैसा जनहित के बजाय फिजूलखर्ची में लगे तो सवाल पूछिए।

जब न्यायपालिका या मीडिया की निष्पक्षता पर आंच आए तो सवाल पूछिए।

जब आपके बच्चों के भविष्य को नफरत की  राजनीति में झोंका जाए तो सवाल पूछिए।

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"बीजेपी नहीं तो कौन?" यह सवाल सत्ता का पूछा गया सवाल है,जो आपको डराकर चुप रखना चाहता है। आपका सवाल होना चाहिए—"हम चुप क्यों रहें?"

लोकतंत्र में सरकारों को बदलना एक प्रक्रिया है,लेकिन सवाल पूछने की ताकत को खो देना लोकतंत्र का अंत है। मौन तोड़िए,क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताक़त आपकी आवाज़ और आपका सवाल है।

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