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देनवा एक्सक्लूसिव · 19 दिन पहले

आंचलखेड़ा का 'सफाई' मॉडल: 5वें वित्त के 12 लाख सफाचट, अंत्येष्टि के नाम पर भी सचिव का 'अंतिम' हाथ साफ!

आंचलखेड़ा पंचायत में सफाई के नाम पर 11 लाख का भुगतान, 1.93 लाख अंत्येष्टि सहायता पर सवाल

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 19 दिन पहले
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आंचलखेड़ा का 'सफाई' मॉडल: 5वें वित्त के 12 लाख सफाचट, अंत्येष्टि के नाम पर भी सचिव का 'अंतिम' हाथ साफ!

माखननगर। शासकीय नियमों के मुताबिक ग्राम पंचायतों को 'साफ-सफाई' के लिए अलग से कोई जादुई चिराग या कुबेर का खजाना नहीं दिया जाता। नियम तो यह कहते हैं कि विकास कार्यों के लिए मिलने वाली 5वें वित्त आयोग की राशि में से मात्र 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही झाड़ू-पोछे और दफ्तर के कागज-कलम पर खर्च किया जा सकता है। लेकिन जनपद माखननगर की ग्राम पंचायत आंचलखेड़ा तो नियमों की किताब को रद्दी के भाव बेचकर दो कदम आगे निकल चुकी है!

यहाँ सफाई का मतलब गांव की गलियां चमकाना नहीं, बल्कि सरकारी खजाने का पूरी तरह 'सफाचट' होना है। आंचलखेड़ा पंचायत को वर्ष 2025-26 और 2026-27 के दौरान विकास कार्यों के नाम पर लगभग 12 लाख रुपये की राशि मिली थी। पंचायत के नीति-निर्माताओं को लगा कि गांव में सड़क, नाली या पानी का काम कराने से क्या फायदा, क्यों न पूरी की पूरी राशि को 'साफ-सफाई' की बलि चढ़ा दिया जाए!

नतीजा यह हुआ कि पूरी पंचायत का 12 लाख का बजट और गरीबों के अंतिम संस्कार का 1 लाख 93 हजार रुपये का फंड, सब कुछ हवा में गायब हो गया।

अजूबा: पूरी पंचायत का सरकारी बजट सिर्फ दो खातों में 'समाहित'!

बैंकिंग इतिहास और पंचायती राज के इतिहास में आंचलखेड़ा पंचायत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। आम तौर पर पंचायत में दर्जनों मस्टर रोल बनते हैं, अलग-अलग वेंडरों को चेक या ऑनलाइन पेमेंट होते हैं। लेकिन आंचलखेड़ा में तो 'डिजिटल क्रांति' का ऐसा अनोखा रूप देखने को मिला कि लाखों रुपये की राशि घूम-फिरकर सिर्फ दो खातों में जाकर सिमट गई:

1. स्वयं सचिव पुरुषोत्तम गौर का खाता

2. स्थानीय सफाई मजदूर मधुसूदन कहार का खाता

मानो पूरी पंचायत का विकास और सफाई व्यवस्था इन्हीं दो महापुरुषों के कंधों पर टिकी हुई थी!

'कलाकार' सचिव: जहाँ जाते हैं, सरकारी पैसे का 'कल्याण' कर आते हैं!

सचिव पुरुषोत्तम गौर के लिए यह कोई नया कारनामा नहीं है। वे इस विधा के पुराने और मजे हुए 'कलाकार' हैं। पूर्व की कई पंचायतों में भी वे पैसों की ऐसी 'जादूगरी' दिखा चुके हैं, जिसकी रिकवरी फाइलें आज भी सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं और रिकवरी की कछुआ चाल जारी है।

जुलाई 2025 में जैसे ही पुरुषोत्तम गौर जी की आंचलखेड़ा में शुभ एंट्री होती है, वे बिना किसी देर के अपने हुनर का प्रदर्शन शुरू कर देते हैं:

* आते ही श्रीगणेश: पदभार संभालते ही जुलाई 2025 में अंत्येष्टि सहायता के नाम पर 30 हजार रुपये सीधे अपने निजी खाते में आहरित कर लिए।

* साल-दर-साल का 'निजी विकास': वर्ष 2025-26 में सफाई व अंत्येष्टि के नाम पर 2 लाख 81 हजार रुपये और वर्ष 2026-27 में 3 लाख 71 हजार रुपये की राशि सचिव महोदय के खाते के माध्यम से 'सुरक्षित' बाहर निकाल ली गई।

* कुल अंत्येष्टि घोटाला: गरीबों को मौत के बाद मिलने वाली 1.93 लाख रुपये की सहायता राशि पर भी सचिव महोदय ने अपने ही खाते से हक जता दिया।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचिव महोदय को न तो इनकम टैक्स वालों की लाल आंखें दिखती हैं और न ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों की डंडा परेड का डर सताता है?

चमत्कार! 40 हजार कमाने वाला मजदूर रातों-रात बना 'लखपति'

जब सचिव जी को लगा कि सिर्फ अपने अकेले के खाते में इतनी बड़ी राशि बार-बार मंगाने से कहीं किसी की नज़र न लग जाए, तब इस कहानी में प्रवेश होता है एक 'भाग्यशाली' किरदार का— मधुसूदन कहार!

मधुसूदन आंचलखेड़ा का ही निवासी है। पेशे से मजदूर है और राशन की दुकान से चावल लाने के लिए बीपीएल (गरीबी रेखा) कार्ड जेब में लेकर घूमता है। मधुसूदन वर्ष 2022-23 से पंचायत में झाड़ू-पोछा लगा रहा था। बेचारे को तीन साल तक हर साल औसतन 40 हजार रुपये ही मिल पाते थे।

लेकिन, जुलाई 2025 में जैसे ही पुरुषोत्तम गौर की 'कृपा दृष्टि' पड़ी, मधुसूदन की लॉटरी निकल आई:

* शुरुआती 3 महीने: सचिव जी के आते ही मात्र 90 दिनों के भीतर मजदूर के खाते में 74,900 रुपये टपक पड़े!

* वर्ष 2025-26: सफाई के नाम पर मजदूर के खाते में 2 लाख 94 हजार रुपये ट्रांसफर हुए।

* वर्ष 2026-27: यह राशि बढ़कर सीधे 3 लाख 52 हजार रुपये तक पहुँच गई।

व्यंग्य का गणित: जिस मजदूर को एक साल में 6 लाख 46 हजार रुपये का भुगतान पंचायत कर रही हो, क्या वह सचमुच बीपीएल कार्डधारी मजदूर है या पंचायत का अनधिकृत 'फाइनेंस मिनिस्टर'?

अगर आंचलखेड़ा में सफाई का सारा काम अकेला मधुसूदन ही कर रहा था और वही अकेला 6 लाख रुपये से ज्यादा समेट रहा था, तो फिर 'जीरामजी' (MGNREGA) में दर्ज बाकी दर्जनों गरीब परिवारों के नाम क्या सिर्फ कागजी खानापूर्ति और फर्जी हाजिरी लगाने के लिए लिखे गए हैं?

31 गरीबों के अंतिम संस्कार पर 'सन्नाटा', 8 मामलों पर 'तत्परता'

गरीबों के दुख-दर्द में काम आने वाली अंत्येष्टि सहायता योजना में भी अनोखा खेल देखने को मिला है। सूत्रों की मानें तो विगत एक वर्ष में पंचायत क्षेत्र के अंदर दर्जनों मौते हुईं, लेकिन सचिव महोदय की 'कृपा' केवल 8 मामलों पर ही बरसी।

इन 8 प्रकरणों की राशि तत्काल शासन से स्वीकृत कराकर पीड़ित परिवारों के खाते में पहुँचा दी गई। लेकिन 31 पीड़ित परिवारों के प्रकरण अभी तक क्यों नहीं बनाए गए?

लेकिन 31 पीड़ित परिवारों के प्रकरण अभी तक क्यों नहीं बनाए गए?

या फिर सचिव जी के पास उन प्रकरणों को पंचायत खाते तक पहुँचाने का 'समय' नहीं मिल पाया?

यह अपने आप में एक यक्ष प्रश्न है जो पंचायती राज की संवेदनहीनता पर करारा तमाचा जड़ता है।

जब तक 'मीडिया' न ढोल बजाए, तब तक सोता रहता है प्रशासन!

पंचायतों में भ्रष्टाचार का यह खेल कोई बंद कमरे की पहेली नहीं है। 'पंचायत दर्पण' पोर्टल पर एक-एक पाई का हिसाब ऑनलाइन दर्ज रहता है। लेकिन मजे की बात यह है कि जब तक मीडिया (देनवा पोस्ट) ऐसे मामलों की परतें उधेड़कर जनता के सामने न लाए, तब तक जनपद से लेकर जिला स्तर तक के आला अधिकारियों को कुछ दिखाई ही नहीं देता।

क्या अधिकारियों की नाक के नीचे चल रही इस खुली लूट में उनकी मौन 'सहमति' का इत्र महक रहा है?

क्या किसी शासकीय कर्मचारी को यह खुली छूट है कि वह सरकारी पैसे को अपनी जेब और चहेते मजदूर के खाते में घुमाता रहे?

इस अनूठे 'सफाई अभियान' और लाखों रुपये की वित्तीय बाजीगरी के संबंध में जब देनवा पोस्ट की टीम ने जनपद सीईओ (माखननगर) से उनके आधिकारिक मोबाइल नंबर पर संपर्क साधने की कोशिश की, तो घंटी बजती रही परंतु संपर्क नहीं हो सका। अधिकारी महोदय जब भी कुंभकर्णी नींद से जागकर कोई जवाब देंगे, उसे जनता के समक्ष अपडेट किया जाएगा।

Disclaimer : इस खबर में प्रस्तुत सभी तथ्य और आंकड़े 'पंचायत दर्पण' पोर्टल पर दर्ज सरकारी रिकॉर्ड एवं स्थानीय सूत्रों से प्राप्त विश्वसनीय जानकारी पर आधारित हैं। इसमें किसी भी प्रकार का काल्पनिक फेरबदल नहीं किया गया है—पंचायत का काम खुद अपनी 'सफाई' बयां कर रहा है!

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