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नई दिल्ली · 44 मिनट पहले

यूपीआई पर 15 अक्टूबर से नया शुल्क , सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक से किया इनकार

15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट पेमेंट पर 0.4% MDR लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक से इनकार कर केंद्र से जवाब मांगा।

अशोक शर्मा
अशोक शर्मा
Sub Editor · 44 मिनट पहले
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यूपीआई पर 15 अक्टूबर से नया शुल्क , सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक से किया इनकार

नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर लागू होने वाले नए शुल्क ढांचे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने वित्त मंत्रालय की ओर से सितंबर 2026 में जारी अधिसूचनाओं के अमल पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने केंद्र  सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और संबंधित यूपीआई समिति से इस व्यवस्था के कानूनी आधार पर जवाब मांगा है।

सरकार

मामला अंजन दत्ता बनाम भारत संघ से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ₹2,000 से अधिक के व्यावसायिक यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ सकती है और व्यापारी इसका अप्रत्यक्ष भार ग्राहकों पर डाल सकते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से यह आशंका भी जताई गई कि अतिरिक्त लागत के कारण कुछ लेन-देन फिर नकदी की ओर लौट सकते हैं।

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने अदालत को बताया कि नया ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा। सरकार का कहना है कि यह राशि कोई कर या  सरकारी शुल्क नहीं है और इसका कोई हिस्सा केंद्र सरकार के खाते में नहीं जाता। यह मर्चेंट भुगतान से जुड़े बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं के बीच सेटलमेंट व्यवस्था का हिस्सा है।

अदालत ने पूछा—कानूनी अधिकार कहां से आया?

सुनवाई के दौरान पीठ ने भुगतान पर शुल्क लगाने की वैधानिक शक्ति को लेकर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने आयकर अधिनियम की धारा 269SU का संदर्भ देते हुए पूछा कि यदि कानून डिजिटल हस्तांतरण की अनुमति देता है, तो इस प्रकार के शुल्क की कानूनी बाध्यता का स्रोत क्या है और सरकार को ऐसा ढांचा बनाने का कार्यकारी अधिकार किस आधार पर प्राप्त होता है।

इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार को हलफनामा दाखिल कर पूरे मामले में तथ्य और कानूनी आधार स्पष्ट करने का निर्देश दिया। फिलहाल अदालत ने नए शुल्क ढांचे पर रोक नहीं लगाई है, इसलिए निर्धारित व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होने की स्थिति में है।

₹2,000 तक के यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं

नए ढांचे में रोजमर्रा के छोटे डिजिटल भुगतानों को राहत दी गई है। ₹2,000 तक के पात्र व्यक्ति-से-मर्चेंट (P2M) भुगतान पर MDR शून्य रहेगा। इसी तरह व्यक्ति से व्यक्ति (P2P) होने वाले यूपीआई ट्रांसफर पर राशि की कोई सीमा लगाए बिना शुल्क नहीं होगा।

सरकार के अनुसार, नए प्रावधानों से मर्चेंट लेन-देन के बड़े हिस्से पर कोई असर नहीं पड़ेगा। छोटे कारोबारियों के लिए भी अलग छूट का प्रावधान रखा गया है। यूपीआई क्यूआर के माध्यम से प्रति माह ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे मर्चेंट को MDR से बाहर रखा गया है।

बड़े मर्चेंट पेमेंट पर कितना शुल्क?

नए ढांचे के तहत ₹2,000 से अधिक के पात्र सामान्य मर्चेंट यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। हालांकि, इस शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन रखी गई है।

यानी ₹3,000 के भुगतान पर मर्चेंट के लिए MDR ₹12 और ₹50,000 के भुगतान पर ₹200 होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर शुल्क अधिकतम ₹300 तक सीमित रहेगा।

शुल्क का गणित

यूपीआई लेन-देन मर्चेंट पर MDR

₹2,000 तक ₹0

₹3,000 ₹12

₹50,000 ₹200

₹75,000 ₹300

₹75,000 से अधिक अधिकतम ₹300

रेलवे, टेलीकॉम और ईंधन क्षेत्र को अलग राहत

सरकार ने कुछ आवश्यक सेवाओं के लिए सामान्य 0.4 प्रतिशत की जगह रियायती शुल्क व्यवस्था रखी है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे निर्धारित क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के पात्र लेन-देन पर फ्लैट ₹5 MDR लागू होगा।

सरकार

वहीं पूंजी बाजार से जुड़े निर्धारित लेन-देन के लिए शुल्क दर और कम रखी गई है। म्यूचुअल फंड, प्रतिभूति और संबंधित पूंजी बाजार श्रेणियों में 0.02 प्रतिशत MDR, अधिकतम ₹300 की सीमा के साथ लागू होगा।

ग्राहक से सीधे शुल्क लेने की अनुमति नहीं

इस पूरे ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि MDR को सीधे ग्राहक से वसूलने की व्यवस्था नहीं है। सरकार ने बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को निर्देश दिए हैं कि मर्चेंट इस लागत को ग्राहक पर अलग से यूपीआई सरचार्ज के रूप में न डालें।

इसी तरह यूपीआई ऐप प्रदाताओं द्वारा उपभोक्ताओं से छिपे हुए प्लेटफॉर्म शुल्क लेने पर भी रोक का प्रावधान किया गया है। यानी ग्राहक जब ₹5,000 का यूपीआई भुगतान करता है तो उसके खाते से भुगतान राशि ₹5,000 ही जाएगी; MDR भुगतान प्रणाली के मर्चेंट पक्ष पर लागू होगा।

 सरकार बनाम याचिकाकर्ता—अब अदालत में तय होगा कानूनी आधार

इस मामले में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल शुल्क की दर से ज्यादा उसकी कानूनी वैधता और सरकार की अधिकार-सीमा को लेकर है। केंद्र सरकार का पक्ष है कि MDR सरकारी टैक्स नहीं, बल्कि भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों के बीच सेटलमेंट शुल्क है। दूसरी ओर याचिकाकर्ता ने इसकी वैधानिकता और संभावित आर्थिक प्रभाव को चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। ऐसे में 15 अक्टूबर 2026 की प्रभावी तारीख से पहले केंद्र के हलफनामे और अदालत की अगली सुनवाई पर निगाहें रहेंगी।

देश में करोड़ों लोग रोजाना यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में नए ढांचे का सीधा असर आम उपभोक्ता पर शुल्क के रूप में नहीं, बल्कि बड़े डिजिटल कारोबार की भुगतान लागत और मर्चेंट-स्तरीय सेटलमेंट व्यवस्था पर पड़ने वाला है। अंतिम तस्वीर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित चुनौती और आगे आने वाले न्यायिक आदेशों से स्पष्ट होगी।

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