संघर्ष के दिनों में स्टूडियो के बाहर घंटों खड़े रहते थे अनु मलिक, पिता को बस स्टॉप पर देखकर गिफ्ट की थी कार
अनु मलिक ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे स्टूडियो के बाहर घंटों इंतजार किया और सफलता मिलने पर पिता सरदार मलिक को कार गिफ्ट की।


हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मशहूर संगीतकार और सिंगर अनु मलिक ने अपने संघर्ष के दिनों से जुड़ा एक भावुक किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब उन्हें फिल्मों में काम पाने के लिए घंटों तक स्टूडियो के बाहर इंतजार करना पड़ता था। कई बार निर्माता-निर्देशकों से अपने गाने सुनाने का मौका मांगना पड़ता था। लेकिन जब मेहनत रंग लाई और उनका काम चल निकला, तो उन्होंने सबसे पहले अपने पिता सरदार मलिक के लिए एक कार खरीदी।
दरअसल, सिंगर समीर के साथ अनु मलिक की पुरानी बातचीत का एक वीडियो क्लिप इन दिनों इंटरनेट पर फिर से वायरल हो रहा है। इस बातचीत में उन्होंने अपने शुरुआती करियर, संघर्ष और पिता के प्रति अपने भावनात्मक लगाव से जुड़ी कई बातें बताई हैं।
बड़े संगीतकारों के बीच पहचान बनाना आसान नहीं था
अनु मलिक ने बताया कि जब उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में कदम रखा, उस दौर में आर.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों का दबदबा था। उनके बीच अपनी जगह बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था।
उन्होंने बातचीत में कहा कि उस समय इन बड़े संगीतकारों के साथ किसी का एक गाना भी रिकॉर्ड हो जाना बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता था। महबूब स्टूडियो, फिल्म सेंटर स्टूडियो और फेमस स्टूडियो जैसे प्रमुख रिकॉर्डिंग स्टूडियो ज्यादातर समय बुक रहते थे। ऐसे में नए संगीतकारों को न तो आसानी से फिल्में मिलती थीं और न ही रिकॉर्डिंग के लिए म्यूजिशियन और सिंगर उपलब्ध हो पाते थे।
अनु मलिक के मुताबिक, उस दौर में लता मंगेशकर, आशा भोसले और किशोर कुमार जैसे दिग्गज कलाकारों की तारीखें मिलना भी बेहद मुश्किल था।
घंटों स्टूडियो के बाहर करते थे इंतजार
संघर्ष के दिनों को याद करते हुए अनु मलिक ने बताया कि वह घंटों तक महबूब स्टूडियो के बाहर खड़े रहते थे। उन्हें अंदर जाने तक का मौका नहीं मिलता था। जब कभी कोई निर्माता वहां पहुंचता, तो वह उससे अपने गाने सुनने की गुजारिश करते थे।
उन्होंने बताया कि एक किस्सा काफी मशहूर हुआ था कि उन्हें एक फिल्म तब मिली, जब उन्होंने निर्देशक को बाथरूम में अपना गाना सुनाया था। अनु मलिक ने स्वीकार किया कि उन्होंने काम पाने के लिए ऐसे कई प्रयास किए, क्योंकि उस समय उनकी प्रतिभा सुनने वाला कोई नहीं था।
उनका कहना था कि न कोई उन्हें देखने वाला था और न ही उनके काम के बारे में पूछने वाला। ऐसे में उन्हें खुद ही मौके तलाशने पड़े। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अपने पिता की तकलीफ थी। वह अपने पिता को संघर्ष करते हुए नहीं देखना चाहते थे।
पिता को बस स्टॉप पर खड़ा देखकर भावुक हो गए
अनु मलिक ने बातचीत का सबसे भावुक किस्सा साझा करते हुए बताया कि जब उनका काम धीरे-धीरे चलने लगा और आर्थिक स्थिति बेहतर हुई, तब एक दिन उन्होंने अपने पिता सरदार मलिक को बस स्टॉप पर खड़े देखा।
यह दृश्य उनके मन को छू गया। इसके बाद उन्होंने अपने पिता को एक कार गिफ्ट करने का फैसला किया। अनु मलिक ने बताया कि उन्होंने पिता को कार की चाबी देते हुए कहा था, 'पापा, आज से ड्राइवर और कार आपकी है।'
यह किस्सा बताता है कि अनु मलिक के लिए सफलता केवल नाम और शोहरत हासिल करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह अपने पिता को वह सुख देना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया था।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
अनु मलिक का यह अनुभव फिल्म संगीत की दुनिया में संघर्ष कर रहे नए कलाकारों के लिए भी एक मिसाल है। बड़े नामों के दबदबे के बीच अपनी पहचान बनाना, बार-बार असफल होने के बावजूद कोशिश जारी रखना और अपने हुनर के दम पर आगे बढ़ना आसान नहीं था।
उनकी कहानी का सबसे खास पहलू यह है कि सफलता मिलने के बाद उन्होंने अपने पिता को याद रखा। स्टूडियो के बाहर काम के लिए इंतजार करने वाले अनु मलिक ने एक दिन अपने पिता को कार और ड्राइवर की सुविधा देकर उनके प्रति अपना प्यार और सम्मान जाहिर किया। यही वजह है कि उनका यह पुराना किस्सा एक बार फिर लोगों का ध्यान खींच रहा है।
