आंगनवाड़ी पदोन्नति में वरिष्ठता को दरकिनार करना पड़ा भारी: माखननगर CDPO सुषमा चौरसिया निलंबित
कनिष्ठ सहायिका को कार्यकर्ता बनाने का मामला, कलेक्टर की अनुशंसा के बाद कमिश्नर ने की कार्रवाई; विभागीय जांच भी होगी


माखननगर। महिला एवं बाल विकास विभाग की माखननगर परियोजना में आंगनवाड़ी सहायिका की पदोन्नति में वरिष्ठता नियमों की अनदेखी का मामला अब कार्रवाई की चौखट तक पहुंच गया है। माखननगर परियोजना अधिकारी (CDPO) श्रीमती सुषमा चौरसिया को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। कमिश्नर श्रीकांत बनोठ ने 28 सितंबर 2026 को आदेश जारी कर यह कार्रवाई की। मामला बज्जरवाड़ा-3 आंगनवाड़ी केंद्र में सहायिका से कार्यकर्ता पद पर की गई पदोन्नति से जुड़ा है।
आदेश के मुताबिक, परियोजना अधिकारी पर पदीय दायित्वों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही और अनुशासनात्मक हीनता के आरोप सामने आए। प्रकरण में मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 9(1) के तहत निलंबन की कार्रवाई की गई है। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला एवं बाल विकास, नर्मदापुरम कार्यालय निर्धारित किया गया है।
वरिष्ठ कौन था, फिर कनिष्ठ को कैसे मिली पदोन्नति?
पूरा मामला बज्जरवाड़ा-2 आंगनवाड़ी केंद्र की सहायिका श्रीमती रामरति अहिरवार की शिकायत से सामने आया। उपलब्ध विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार रामरति अहिरवार की नियुक्ति 22 सितंबर 2007 को हुई थी, जबकि श्रीमती सुशीला मोरे की नियुक्ति इसी पद पर 18 दिसंबर 2009 को हुई।
यानी नियुक्ति तिथि के आधार पर रामरति अहिरवार वरिष्ठ थीं। इसके बावजूद आरोप है कि 11 जुलाई 2025 को सुशीला मोरे को बज्जरवाड़ा-3 आंगनवाड़ी केंद्र में कार्यकर्ता पद पर पदोन्नत कर दिया गया।
यहीं से सवाल खड़ा हुआ—जब वरिष्ठता का आधार नियुक्ति तिथि है, तो फिर 2009 में नियुक्त सहायिका को 2007 में नियुक्त सहायिका से पहले पदोन्नति कैसे मिल गई?
यही सवाल शिकायत की जांच का केंद्रीय बिंदु बना।
नियमों की अनदेखी पर अधिकारी से मांगा गया जवाब
शिकायत के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर नर्मदापुरम की ओर से परियोजना अधिकारी सुषमा चौरसिया को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उनसे पदोन्नति प्रक्रिया और वरिष्ठता के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया।
जांच के दौरान प्रस्तुत जवाब को संतोषजनक नहीं माना गया। इसके बाद कलेक्टर ने राज्य शासन को विस्तृत रिपोर्ट भेजते हुए मामले को गंभीर कदाचरण एवं अनुशासनहीनता की श्रेणी में मानते हुए निलंबन तथा विभागीय जांच संस्थित किए जाने की अनुशंसा की।
अब कमिश्नर के आदेश के बाद मामला महज शिकायत या नोटिस तक सीमित नहीं रहा। विभागीय स्तर पर इसकी औपचारिक कार्रवाई आगे बढ़ेगी।
लगातार कटघरे में थीं CDPO: 'देनवा पोस्ट' का बड़ा असर!
माखननगर परियोजना अधिकारी की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठ रहे थे। 'देनवा पोस्ट' ने 16 सितंबर को ही "छह माह से रिक्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पद, माखननगर परियोजना अधिकारी को कारण बताओ नोटिस" शीर्षक से प्रमुखता से खबर प्रकाशित कर इनके कारनामों को उजागर किया था।
सांगाखेड़ाकला-1 केंद्र में 12 फरवरी से पद रिक्त होने के बावजूद जानकारी पोर्टल पर अपडेट न करने और 29 जून को विज्ञप्ति जारी होने के बाद भी भर्ती में अत्यधिक विलंब करने पर जिला कार्यक्रम अधिकारी संजय कुमार जैन ने भी इन्हें 16 सितंबर को नोटिस थमाया था।
लगातार हो रही शिकायतों और नियमविरुद्ध फैसलों के बाद हुई इस सर्जिकल स्ट्राइक से महिला एवं बाल विकास विभाग जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है!
एक शिकायत ने खोल दी पूरी प्रक्रिया पर बहस
बज्जरवाड़ा-3 की पदोन्नति का मामला अब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसमें सवाल केवल एक कर्मचारी की पदोन्नति का नहीं, बल्कि पूरी वरिष्ठता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता का है।
यदि किसी विभाग में वरिष्ठता सूची ही विवादित हो जाए और वरिष्ठ कर्मचारी की जगह कनिष्ठ कर्मचारी को पदोन्नति मिल जाए, तो स्वाभाविक रूप से पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। इसी वजह से प्रकरण में विभागीय जांच का रास्ता अपनाया गया है।
हालांकि अंतिम विभागीय निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। निलंबन स्वयं अंतिम दोषसिद्धि नहीं है, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई है, जिसके दौरान आरोपों की विभागीय जांच की जाएगी।
अब आगे क्या?
निलंबन आदेश के बाद सुषमा चौरसिया को जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय नर्मदापुरम में मुख्यालय अटैच किया गया है। निलंबन अवधि में उन्हें नियमानुसार मूल नियम 53 के अंतर्गत जीवन निर्वाह भत्ते की पात्रता रहेगी।
अब विभागीय जांच में यह स्पष्ट किया जाना है कि वरिष्ठता सूची किस आधार पर तैयार की गई, पदोन्नति की प्रक्रिया में कौन-कौन से दस्तावेज देखे गए, 2007 में नियुक्त सहायिका की वरिष्ठता के बावजूद 2009 में नियुक्त सहायिका को पदोन्नति देने का आधार क्या था और इस पूरी प्रक्रिया में परियोजना अधिकारी की भूमिका क्या रही।
माखननगर में आंगनवाड़ी व्यवस्था से जुड़े इस मामले ने अब एक बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा कर दिया है,यदि वरिष्ठता का नियम स्पष्ट था, तो उसे लागू करने में चूक आखिर कैसे हुई?

