MP News: दतिया BJP में बदलाव की तैयारी तेज, नए जिलाध्यक्ष की दौड़ में आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरोनिया के नाम चर्चा में
दतिया उपचुनाव में हार के बाद BJP जिला संगठन में बदलाव की तैयारी। नए जिलाध्यक्ष की रेस में आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरोनिया के नाम चर्चा में हैं।


दतिया। विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में बदलाव की कवायद तेज हो गई है। पार्टी की जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद अब नए जिलाध्यक्ष को लेकर संगठन के भीतर मंथन चल रहा है। इस दौड़ में आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम प्रमुखता से चर्चा में बताए जा रहे हैं।
दोनों नेताओं को 2028 के विधानसभा चुनाव में भी संभावित दावेदार माना जा रहा है। ऐसे में भाजपा के लिए जिलाध्यक्ष का चयन केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव और जिले के राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उपचुनाव की हार के बाद संगठन में बदलाव
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को मिली हार के बाद पार्टी ने जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया है। हालांकि, अभी तक जिले के किसी पदाधिकारी को निलंबित करने या पार्टी से बाहर किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।
पार्टी के अंदर इसे सामूहिक संगठनात्मक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। नए सिरे से जिला संगठन तैयार करने के दौरान भाजपा के सामने गुटीय संतुलन के साथ-साथ आगामी चुनावों की रणनीति तय करने की चुनौती भी होगी।
दतिया भाजपा की राजनीति में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि नए संगठन में उनके समर्थक खेमे की भूमिका सीमित की जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष या 2028 की टिकट का सवाल
आशुतोष तिवारी का नाम नए जिलाध्यक्ष के लिए प्रमुखता से चर्चा में है। वह दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी रहे थे और संगठन के करीबी एवं सक्रिय नेताओं में उनकी गिनती होती है।
हालांकि, यदि तिवारी को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है तो उनके सामने 2028 के विधानसभा चुनाव की टिकट को लेकर राजनीतिक चुनौती भी खड़ी हो सकती है।
जिलाध्यक्ष के तौर पर अगले डेढ़ से दो साल में उन्हें संगठन को मजबूत करने, आगामी नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी और पार्टी प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी निभानी होगी। इसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
ऐसे में पार्टी के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या वह एक ऐसे नेता को जिलाध्यक्ष बनाना चाहेगी, जो खुद 2028 में विधानसभा टिकट के संभावित दावेदार हैं।
घनश्याम पिरोनिया के नाम पर भी मंथन
पूर्व विधायक और भाजपा प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया का नाम भी जिलाध्यक्ष पद के लिए चर्चा में है। पिरोनिया भांडेर विधानसभा सीट से दोबारा टिकट के संभावित दावेदार माने जाते हैं।
ऐसे में यदि उन्हें संगठन की जिम्मेदारी मिलती है तो उनके सामने भी जिलाध्यक्ष पद और 2028 की विधानसभा टिकट के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
भाजपा के सामने ऐसे चेहरे का चयन करने की चुनौती है, जो संगठन को सक्रिय करने के साथ-साथ जिले के विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को भी साध सके।
ब्राह्मण और दलित समीकरण पर भी नजर
नए जिलाध्यक्ष के चयन में सामाजिक समीकरण भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। आशुतोष तिवारी के नाम के साथ ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग के समीकरण को साधने की संभावना की चर्चा है।
वहीं, घनश्याम पिरोनिया के जरिए दलित वर्ग के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर भी विचार किए जाने की बात कही जा रही है।
उपचुनाव के परिणाम के बाद भाजपा के लिए दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी इन सामाजिक समीकरणों को लेकर रणनीति तैयार कर सकती है।
रघुवीर कुशवाह को हटाने के बाद कुशवाह समाज की चुनौती
दतिया भाजपा में संगठनात्मक बदलाव के बीच कुशवाह समाज को साधना भी पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है। जिला अध्यक्ष पद से रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि नए संगठन में इस समाज को किस तरह प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
रघुवीर कुशवाह ने पूर्व में कहा था कि उन्होंने चुनाव से पहले इस्तीफा दिया था और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। उनका यह भी कहना रहा है कि उन्होंने चुनाव में पूरी मेहनत से काम किया, इसके बावजूद पार्टी की हार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
हालांकि, पार्टी की ओर से संगठन भंग करने के फैसले को लेकर किसी एक पदाधिकारी पर हार की जिम्मेदारी तय किए जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
करीब 35 हजार कुशवाह मतदाताओं का समीकरण
दतिया में कुशवाह समाज के करीब 35 हजार मतदाता होने का दावा किया जाता है। यही वजह है कि भाजपा के लिए इस वर्ग को संगठन और चुनावी राजनीति में साथ बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र में कुशवाह समाज की नाराजगी को भी भाजपा के तत्कालीन प्रदर्शन से जोड़कर देखा गया था। इसके बाद रघुवीर कुशवाह को ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी।
अब नए जिलाध्यक्ष के चयन के साथ पार्टी के सामने इस सामाजिक समीकरण को बनाए रखने की चुनौती भी होगी।
निकाय चुनाव से पहले संगठन खड़ा करना बड़ी चुनौती
भाजपा ने दतिया जिले की संगठनात्मक संरचना भंग कर दी है। इसके चलते दतिया के अलावा सेवढ़ा और भांडेर में भी नए सिरे से संगठन खड़ा करने की आवश्यकता होगी।
आगामी नगरीय निकाय चुनाव को देखते हुए भाजपा लंबे समय तक संगठनात्मक असमंजस की स्थिति में नहीं रहना चाहेगी। नए जिलाध्यक्ष के सामने सबसे पहली चुनौती बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करना होगी।
इसके साथ ही 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की जमीन तैयार करना भी नए नेतृत्व की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
चार समीकरणों के बीच होगा फैसला
दतिया भाजपा के नए जिलाध्यक्ष का फैसला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के सामने जातीय समीकरण, गुटीय संतुलन, 2028 की विधानसभा टिकट और आगामी निकाय चुनाव—चारों को साधने की चुनौती है।
ऐसे में आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरोनिया के नामों पर चल रही चर्चा के बीच अंतिम फैसला भाजपा का शीर्ष संगठन किस आधार पर करता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल पार्टी की ओर से नए जिलाध्यक्ष के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।