मरम्मत के नाम पर 81 लाख खर्च, सत्यापन में निकलीं खामियां! दो तत्कालीन BEO पर कार्रवाई
आष्टा और सीहोर के 18 सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए जारी करीब 81 लाख रुपये की राशि जांच के घेरे में है। टेंडर, भौतिक सत्यापन और भुगतान पर सवाल उठे हैं।


आष्टा/सीहोर। सरकारी स्कूलों की मरम्मत के नाम पर जारी करीब 81 लाख रुपये की राशि अब शिक्षा विभाग की जांच के घेरे में है। आष्टा और सीहोर विकासखंड के कुल 18 स्कूलों में कराए गए मरम्मत कार्यों की टेंडर प्रक्रिया, कार्य आवंटन, भौतिक सत्यापन और भुगतान से जुड़े मामलों में विभागीय स्तर पर गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं।
मामले में लोक शिक्षण संचालनालय ने आष्टा के तत्कालीन बीईओ प्रमोद कुशवाह और सीहोर के तत्कालीन बीईओ दीपा कीर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की है। दोनों अधिकारियों को मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियमों के तहत आरोप-पत्र जारी कर निर्धारित अवधि में अपना लिखित जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि, विभागीय कार्रवाई अभी जांच के स्तर पर है और आरोप-पत्र जारी होना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। अंतिम जिम्मेदारी अधिकारियों के जवाब और जांच में सामने आने वाले दस्तावेजों के आधार पर तय होगी।
18 स्कूलों के लिए करीब 81 लाख रुपये
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार आष्टा विकासखंड के 11 सरकारी स्कूलों के लिए 49.50 लाख रुपये तथा सीहोर विकासखंड के 7 स्कूलों के लिए 31.50 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। इस तरह दोनों विकासखंडों के कुल 18 स्कूलों से संबंधित लगभग 81 लाख रुपये की राशि जांच के केंद्र में है।
विभागीय आरोपों के मुताबिक तत्कालीन बीईओ स्तर पर निर्धारित टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि खुली निविदा प्रक्रिया के बजाय चुनिंदा फर्मों से कोटेशन प्राप्त कर कार्य आवंटित किए गए।
यही प्रक्रिया अब विभागीय जांच का प्रमुख बिंदु बनी हुई है।
आष्टा में 11 स्कूल, 49.50 लाख की राशि
आष्टा विकासखंड के जिन स्कूलों से मामला जुड़ा बताया गया है, उनमें लोरसकलां, मैना, सामरदा, पगारिया हाट, खामखेड़ा बैजनाथ सहित अन्य विद्यालय शामिल हैं।
दस्तावेजों के अनुसार इन स्कूलों में मरम्मत कार्यों के लिए करीब 49.50 लाख रुपये स्वीकृत किए गए और लगभग 49.49 लाख रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
जांच में कार्यादेश जारी करने की प्रक्रिया, तकनीकी औपचारिकताओं, कार्य की वास्तविकता और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
अब विभाग यह देख रहा है कि स्वीकृत राशि के अनुरूप वास्तव में कितना काम हुआ, किस आधार पर कार्य का मूल्यांकन किया गया और भुगतान से पहले निर्धारित प्रक्रिया का कितना पालन किया गया।
सीहोर के सात स्कूल भी जांच के दायरे में
सीहोर विकासखंड में संग्रामपुर, पीएम श्री श्यामपुर, गुडभेला, बरखेड़ी, जताखेड़ा, मोगराराम और मुस्करा स्कूलों के लिए 31.50 लाख रुपये की राशि स्वीकृत किए जाने का उल्लेख विभागीय रिकॉर्ड में है।
इन स्कूलों से जुड़े कार्यों में भी खुली निविदा के बजाय कोटेशन के आधार पर कार्य आवंटित किए जाने और भुगतान प्रक्रिया को लेकर विभागीय जांच शुरू की गई है।
इस मामले में जांच का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कार्य शुरू कराने से लेकर भुगतान तक कौन-कौन से अधिकारी और कर्मचारी प्रक्रिया में शामिल थे और किस स्तर पर कार्य की स्वीकृति एवं भुगतान किया गया।
भौतिक सत्यापन में उठे बड़े सवाल
लोक शिक्षण संचालनालय के निर्देश पर कराए गए भौतिक सत्यापन ने मामले को और गंभीर बना दिया। सत्यापन के दौरान कुछ स्कूलों में कराए गए कार्यों की गुणवत्ता और आवश्यकता को लेकर टिप्पणियां सामने आईं।
कुछ मामलों में जांच टीम ने कार्य को असंतोषजनक बताते हुए पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता बताई। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि जिन कार्यों के लिए सरकारी राशि खर्च की गई, उनका वास्तविक स्वरूप और उपयोगिता क्या थी।
खजूरिया कासम में मरम्मत की जरूरत नहीं, फिर भुगतान क्यों?
जांच रिपोर्ट में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खजूरिया कासम के भवन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी दर्ज होने की बात सामने आई है। सत्यापन रिपोर्ट के अनुसार भवन में मरम्मत की आवश्यकता नहीं होने की बात दर्ज की गई, जबकि इस कार्य से संबंधित करीब 4.49 लाख रुपये के भुगतान का मामला सामने आया।
अब विभागीय जांच में यह पड़ताल की जा रही है कि जब भवन में मरम्मत की आवश्यकता नहीं बताई गई, तब किस आधार पर कार्य स्वीकृत हुआ और भुगतान की प्रक्रिया किस तरह पूरी की गई।
यह बिंदु इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी राशि खर्च करने से पहले कार्य की वास्तविक आवश्यकता और उसके भौतिक निष्पादन का सत्यापन वित्तीय प्रक्रिया का अहम हिस्सा होता है।
मोगराराम स्कूल में भी मरम्मत पर सवाल
इसी तरह शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मोगराराम को लेकर सत्यापन रिपोर्ट में भवन नया होने और मरम्मत की आवश्यकता नहीं होने की टिप्पणी दर्ज होने की बात सामने आई है।
इसके बावजूद इस विद्यालय से संबंधित भुगतान की प्रक्रिया जांच के दायरे में है।
अब जांच में यह देखा जा रहा है कि मरम्मत कार्य के लिए क्या आधार था, कार्य की वास्तविक मात्रा कितनी थी और भुगतान किस दर एवं किस मूल्यांकन के आधार पर किया गया।
यदि किसी भवन में मरम्मत की आवश्यकता नहीं थी, तो वहां कार्य की स्वीकृति और भुगतान का औचित्य क्या था—यह विभागीय जांच के प्रमुख सवालों में शामिल है।
सिर्फ टेंडर नहीं, भुगतान प्रक्रिया भी जांच में
मामले में सवाल केवल टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। विभागीय जांच में कार्यादेश, कोटेशन, तकनीकी प्रक्रिया, कार्य की वास्तविक मात्रा, भौतिक सत्यापन और भुगतान जैसे कई स्तरों की पड़ताल की जा रही है।
वित्तीय प्रक्रिया में भौतिक सत्यापन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि सरकारी राशि का भुगतान वास्तविक और स्वीकृत कार्य के आधार पर किया जाना अपेक्षित होता है।
विभागीय आरोपों के अनुसार भुगतान से पहले आवश्यक भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया। यही कारण है कि अब संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
दोनों तत्कालीन BEO से जवाब तलब
लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह द्वारा मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियमों के तहत दोनों तत्कालीन बीईओ को आरोप-पत्र जारी किए गए हैं।
विभाग ने अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। निर्धारित अवधि में जवाब प्रस्तुत किए जाने के बाद विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
यदि अधिकारी निर्धारित समय में जवाब प्रस्तुत नहीं करते हैं, तो विभागीय नियमों के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
81 लाख की कहानी में अब कई सवाल
इस पूरे मामले ने सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए जारी होने वाली राशि की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी स्कूल भवन में वास्तव में मरम्मत की आवश्यकता थी, तो उसका तकनीकी और भौतिक सत्यापन किस स्तर पर किया गया? यदि मरम्मत की आवश्यकता नहीं थी, तो कार्य की स्वीकृति और भुगतान किस आधार पर हुआ?
दूसरा सवाल टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा है—क्या निर्धारित नियमों के तहत खुली निविदा आवश्यक थी और यदि थी, तो कोटेशन के आधार पर कार्य आवंटित करने का आधार क्या था?
तीसरा सवाल भुगतान से पहले सत्यापन को लेकर है। यदि भौतिक सत्यापन बाद में कराया गया और उसमें कार्य की आवश्यकता या गुणवत्ता पर आपत्तियां सामने आईं, तो भुगतान से पहले संबंधित अधिकारियों ने क्या जांच की थी?
जांच पूरी होने के बाद तय होगी जिम्मेदारी
फिलहाल यह पूरा मामला विभागीय जांच के चरण में है। आरोप-पत्र जारी होने को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है और जांच में सामने आने वाले दस्तावेजों, रिकॉर्ड तथा जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
लेकिन करीब 81 लाख रुपये की सरकारी स्कूल मरम्मत राशि से जुड़े इस मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि स्कूलों की मरम्मत के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी राशि की जरूरत, निविदा, गुणवत्ता और भुगतान—इन चारों स्तरों पर निगरानी कितनी प्रभावी है।

