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जबलपुर · 22-08-2026

हाईकोर्ट में फर्जी NOC और शपथ-पत्र से अपील वापस लेने की कोशिश, न्यायिक रजिस्ट्रार को जांच के आदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में फर्जी NOC और शपथ-पत्र के जरिए अपील वापस लेने की कोशिश का मामला सामने आया। जस्टिस विवेक जैन ने न्यायिक रजिस्ट्रार को जांच के आदेश दिए।

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समाचार डेस्क · 22-08-2026
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हाईकोर्ट में फर्जी NOC और शपथ-पत्र से अपील वापस लेने की कोशिश, न्यायिक रजिस्ट्रार को जांच के आदेश

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक अपील को वापस लेने के लिए कथित तौर पर फर्जी एनओसी और शपथ-पत्र पेश किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को पता चला कि जिस अधिवक्ता के माध्यम से अपील वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत किया गया था, उसे अपीलकर्ता ने नियुक्त ही नहीं किया था। इतना ही नहीं, संबंधित अधिवक्ता ने भी कोर्ट के सामने किसी वकालतनामे के बारे में जानकारी होने से इनकार किया।

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मामले को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने न्यायिक रजिस्ट्रार को पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि जांच के दौरान यदि आपराधिक गतिविधि सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई जाए, ताकि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सके।

अपील वापस लेने के लिए लगाया गया आवेदन

मामला भोपाल निवासी शालिनी शर्मा से जुड़ा है। उन्होंने भोपाल न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील पर 14 अगस्त को सुनवाई के दौरान मौजूद अधिवक्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अपीलकर्ता ने अपील वापस लेने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया है।

रिकॉर्ड की जांच करने पर एकलपीठ को पता चला कि अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता एसपी मिश्रा, फाल्गुनी यादव और जितेंद्र मोहन शर्मा के माध्यम से अपील दायर की गई थी। इसके बाद अपीलकर्ता की ओर से 5 अगस्त को अधिवक्ता अजय कुमार यादव को नियुक्त करने संबंधी आवेदन पेश किया गया। इस आवेदन के साथ अधिवक्ता एसपी मिश्रा की एनओसी भी लगाई गई थी।

इसके बाद अधिवक्ता अजय कुमार यादव की ओर से अपील वापस लेने के लिए शपथ-पत्र के साथ आवेदन पेश किया गया।

अपीलकर्ता ने कहा- अजय कुमार यादव को पहचानती तक नहीं

सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद अपीलकर्ता शालिनी शर्मा ने एकलपीठ के सामने स्पष्ट किया कि उन्होंने अधिवक्ता अजय कुमार यादव के पक्ष में कभी कोई वकालतनामा निष्पादित नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह अजय कुमार यादव को पहचानती तक नहीं हैं।

वहीं, अधिवक्ता एसपी मिश्रा की ओर से भी कोर्ट को बताया गया कि उनकी तरफ से ऐसी कोई एनओसी जारी नहीं की गई थी।

इन बयानों के बाद कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और संबंधित अधिवक्ता तथा शपथ-पत्र निष्पादित करने वाली शपथ आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए।

अधिवक्ता ने भी वकालतनामा से किया इनकार

कोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए अधिवक्ता अजय कुमार यादव ने बताया कि उन्हें इस मामले में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी ओर से कोई वकालतनामा दायर नहीं किया गया और वह कोर्ट में मौजूद अपीलकर्ता को भी नहीं पहचानते हैं।

इसके बाद मामले में शपथ आयुक्त लक्ष्मी देवी सिंह का बयान भी महत्वपूर्ण रहा।

शपथ आयुक्त के रजिस्टर में मिली ओवरराइटिंग

शपथ आयुक्त लक्ष्मी देवी सिंह ने कोर्ट को बताया कि 9 अगस्त को एक महिला शपथ-पत्र तैयार करवाने के लिए उनके पास आई थी। उस महिला का नाम उनके रजिस्टर में सीरियल नंबर 1037 पर दर्ज है।

हालांकि, कोर्ट में मौजूद अपीलकर्ता वह महिला नहीं थी, जो शपथ-पत्र तैयार करवाने के लिए उनके पास आई थी। शपथ आयुक्त ने यह भी बताया कि अधिवक्ता अजय कुमार यादव भी उस व्यक्ति से अलग थे, जो कथित तौर पर महिला के साथ आया था।

सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने शपथ आयुक्त के रजिस्टर का अवलोकन किया। कोर्ट को रजिस्टर में कई स्थानों पर ओवरराइटिंग दिखाई दी। इसके अलावा बीत चुकी तारीखों के लिए कई पन्ने खाली पाए गए। 9 अगस्त के लिए भी रजिस्टर में चार खाली पन्ने पाए गए।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित रजिस्टर को जब्त करने के आदेश जारी किए।

चार सप्ताह में जांच के निर्देश

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने न्यायिक रजिस्ट्रार को पूरे प्रकरण की जांच चार सप्ताह के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि जब्त किए गए शपथ आयुक्त के रजिस्टर को भी जांच का हिस्सा बनाया जाए।

एकलपीठ ने निर्देश दिया कि जांच के दौरान यदि किसी तरह की आपराधिक गतिविधि सामने आती है तो पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई जाए, ताकि मामले में शामिल दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सके।

फर्जी दस्तावेज, कथित फर्जी एनओसी और बिना अनुमति अपील वापस लेने की कोशिश से जुड़े इस मामले ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली और न्यायिक दस्तावेजों की प्रमाणिकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब न्यायिक रजिस्ट्रार की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कौन लोग शामिल थे और दस्तावेज किस स्तर पर तैयार किए गए।

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