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नेपाल · 6 मिनट पहले

Nepal Flood: ग्लेशियर तबाही के बाद नेपाल-तिब्बत में भीषण बाढ़, सैकड़ों मौतें; चीन पर उठे सवाल

नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियर से जुड़ी भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों के लापता होने के बीच चीन में नुकसान की पूरी तस्वीर सामने न आने पर सवाल उठ रहे हैं।

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समाचार डेस्क · 6 मिनट पहले
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Nepal Flood: ग्लेशियर तबाही के बाद नेपाल-तिब्बत में भीषण बाढ़, सैकड़ों मौतें; चीन पर उठे सवाल

काठमांडू। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में तबाही का सिलसिला जारी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर से जुड़े मलबे और पानी के अचानक नीचे आने के बाद आई बाढ़ ने नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में भारी नुकसान पहुंचाया। गांवों, सड़कों और पुलों के साथ कई महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग तबाह हो गए हैं।

29 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 626 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,426 लोग लापता बताए गए हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी कम से कम 7 लोगों की मौत और 554 लोगों के लापता होने की सूचना है। इस तरह दोनों क्षेत्रों में मृतकों की संख्या 633 तक पहुंच गई है।

आपदा के बाद अब एक और खतरा सामने आया है। मलबे से बनी एक झील के बढ़ते जलस्तर के कारण कुछ समय के लिए राहत और बचाव अभियान रोकना पड़ा था। बाद में खतरा कम होने पर दोनों देशों में बचाव अभियान फिर शुरू किया गया।

ग्लेशियर से शुरू हुई तबाही ने मचाई भारी तबाही

प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ा मलबा और बर्फ-पत्थर का बहाव नदी तंत्र में पहुंचा। इसके बाद पानी और मलबे का विशाल प्रवाह नेपाल तथा तिब्बत की ओर तेजी से बढ़ा।

अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण समेत शुरुआती आकलनों में इस घटना को ग्लेशियर के ढहने और उससे जुड़े मलबा प्रवाह से जोड़ा गया है। चीन ने भी कहा है कि नेपाल की ओर ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के ढहने से यह आपदा शुरू हुई हो सकती है।

बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि कई जगह घर, सड़कें और पुल इसकी चपेट में आ गए। नेपाल में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं और कई दुर्गम इलाकों तक पहुंचना अभी भी चुनौती बना हुआ है।

नेपाल में सामने आ रही तबाही की तस्वीर

नेपाल में राहत और बचाव अभियान के साथ-साथ आपदा की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं। प्रभावित इलाकों में पत्रकारों और राहतकर्मियों की पहुंच अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण नुकसान और स्थानीय लोगों की स्थिति की जानकारी लगातार सामने आ रही है।

कई इलाकों में सड़क संपर्क टूट गया है। हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और लापता लोगों की तलाश के लिए सुरक्षा बलों तथा हेलीकॉप्टरों की मदद ली जा रही है। नेपाल में लापता लोगों की संख्या लगातार बढ़ने से मृतकों का आंकड़ा भी आने वाले दिनों में बदल सकता है।

तिब्बत में नुकसान की पूरी तस्वीर सामने क्यों नहीं?

आपदा का दूसरा बड़ा प्रभाव चीन के तिब्बत क्षेत्र में देखने को मिला है। खासकर ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र में बाढ़ और मलबे ने भारी नुकसान पहुंचाया। चीनी अधिकारियों के अनुसार वहां सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं।

यहीं से सूचना के प्रवाह को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। तिब्बत चीन का संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है और वहां विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्र आवाजाही पर लंबे समय से प्रतिबंधों और निगरानी की खबरें आती रही हैं।

सरकारी चीनी मीडिया ने राहत और बचाव अभियान की तस्वीरें प्रसारित की हैं। चीन ने प्रभावित क्षेत्र में बड़ी संख्या में बचावकर्मियों को भेजा है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि स्वतंत्र पत्रकारों की सीमित पहुंच के कारण आपदा से हुए वास्तविक नुकसान का स्वतंत्र आकलन करना मुश्किल है।

क्या चीन तबाही की पूरी तस्वीर छिपा रहा है?

तिब्बत में सूचना नियंत्रण को लेकर सवाल पहले से उठते रहे हैं। ऐसे में इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा के दौरान भी चीन से सामने आने वाली सूचनाओं की सीमित प्रकृति ने संदेह को बढ़ाया है।

हालांकि, यह कहना कि चीन जानबूझकर बाढ़ की पूरी तस्वीर छिपा रहा है, अभी एक स्थापित तथ्य नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों से इतना जरूर स्पष्ट है कि चीन की ओर बड़ी संख्या में लोग लापता हैं और ग्यिरोंग क्षेत्र में बाढ़ से बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। स्वतंत्र रूप से नुकसान का पूरा आकलन करना अभी भी कठिन है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी बचाव दल ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र तक पहुंचा तो वहां व्यापक तबाही और मलबे का सामना करना पड़ा। सीमा चौकी का क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित हुआ।

तिब्बत में विदेशी पत्रकारों के सामने बड़ी चुनौतियां

तिब्बत में विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही है। सरकार की अनुमति और निगरानी के बीच पत्रकारों की आवाजाही होती है। यही वजह है कि आपदा प्रभावित क्षेत्र से स्वतंत्र जमीनी रिपोर्टिंग सीमित रहती है।

मानवाधिकार संगठन भी तिब्बत में अभिव्यक्ति और सूचना की स्वतंत्रता को लेकर चीन की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। ऐसे माहौल में प्राकृतिक आपदा की वास्तविक स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन और भी मुश्किल हो जाता है।

चीन ने राहत अभियान तेज किया

चीन ने तिब्बत के प्रभावित क्षेत्रों में सैन्य और अर्धसैनिक बलों समेत सैकड़ों बचावकर्मियों को तैनात किया है। चीनी सरकारी मीडिया के मुताबिक, राहत और बचाव अभियान की निगरानी उच्च स्तर पर की जा रही है।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी अधिकारियों को राहत और बचाव अभियान तेज करने तथा चीन और अन्य देशों के लापता लोगों की तलाश के लिए हरसंभव प्रयास करने के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री ली छ्यांग को प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने के लिए भेजा गया है।

नई बाढ़ का खतरा भी मंडरा रहा

ग्लेशियर से जुड़े मलबे के कारण नदी का प्रवाह बाधित होने से एक झील बन गई थी। पानी लगातार जमा होने के कारण इसके टूटने या अचानक बड़े पैमाने पर बहने का खतरा पैदा हुआ। इसी आशंका के चलते कुछ समय के लिए बचाव दलों को पीछे हटना पड़ा।

बाद में खतरा कम होने पर बचाव अभियान दोबारा शुरू किया गया। हालांकि विशेषज्ञों और प्रशासन की नजर अब भी झील के जलस्तर और आसपास के अस्थिर पहाड़ी क्षेत्र पर बनी हुई है।

हजारों लोग अब भी लापता

इस आपदा की सबसे बड़ी चिंता लापता लोगों की संख्या है। नेपाल में 2,400 से अधिक और तिब्बत में 550 से अधिक लोग लापता बताए गए हैं। इनमें विदेशी नागरिक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं।

माउंट कैलाश और मानसरोवर की यात्रा के कारण इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में विदेशी यात्री मौजूद थे। इसलिए आपदा के बाद कई देशों के नागरिकों के लापता होने की जानकारी भी सामने आई है।

फिलहाल नेपाल और चीन दोनों ओर राहत-बचाव अभियान जारी है। लेकिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र, क्षतिग्रस्त सड़कें, मलबा और संभावित नई बाढ़ का खतरा बचाव दलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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