पुराने और नए आंकड़ों ने खड़े किए सवाल, बाघ गणना पर फिर छिड़ी बहस
देश में बाघों की संख्या को लेकर पुराने और नए सरकारी आंकड़ों पर बहस तेज। पगमार्क बनाम कैमरा ट्रैप गणना, 26 साल के आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय जानें।


भोपाल। देश में बाघों की संख्या को लेकर पिछले दो दशकों के सरकारी आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। वर्ष 2001-02 में संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, उस समय पगमार्क (पंजों के निशान) पद्धति के आधार पर देश में 3,642 बाघ और मध्य प्रदेश में 710 बाघ होने का अनुमान लगाया गया था। वहीं, ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन-2022 के अनुसार देश में बाघों की औसत संख्या 3,682 और मध्य प्रदेश में 785 दर्ज की गई है।
इन आंकड़ों के आधार पर देखें तो करीब 26 वर्षों में देशभर में केवल 40 और मध्य प्रदेश में 75 बाघों की वृद्धि दिखाई देती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों आंकड़ों की तुलना सीधे तौर पर करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है, क्योंकि दोनों की गणना पद्धति पूरी तरह अलग है।
बदली गणना पद्धति, इसलिए सीधी तुलना नहीं
वर्ष 2006 तक देश में बाघों की गणना पगमार्क पद्धति से की जाती थी। इसमें जंगल में मिले बाघों के पंजों के निशानों के आधार पर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता था। इसके बाद भारत सरकार ने वैज्ञानिक ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन प्रणाली लागू की, जिसमें कैमरा ट्रैप,
डीएनए विश्लेषण,साइन सर्वे,सांख्यिकीय एवं वैज्ञानिक मॉडल का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति को अधिक सटीक और विश्वसनीय माना जाता है।
विशेषज्ञों ने उठाए अहम सवाल
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह तुलना कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। मुख्य सवाल यह है कि क्या पगमार्क पद्धति में बाघों की संख्या वास्तविकता से अधिक आंकी जाती थी?
या फिर संरक्षण प्रयासों के बावजूद बाघों की संख्या अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रही है? विशेषज्ञों का कहना है कि इन सवालों का उत्तर विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण से ही मिल सकता है।
सरकार हर साल 6% वृद्धि का अनुमान मानती है
भारत सरकार का आकलन है कि देश में बाघों की संख्या में औसतन 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हो रही है। ऐसे में पुराने और नए आंकड़ों के बीच दिखाई देने वाला सीमित अंतर कई सवाल खड़े करता है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2012 से 2026 के बीच देशभर में 1,700 से अधिक बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है। यदि बाघ संरक्षण परियोजना पर सरकार का औसत खर्च करीब 100 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष माना जाए, तो पिछले 26 वर्षों में इस पर 2,500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं।
पगमार्क और कैमरा ट्रैप में क्या अंतर?
पगमार्क पद्धति
पुरानी प्रणाली में जंगल में मिले बाघों के पंजों के निशानों के आधार पर संख्या का अनुमान लगाया जाता था। इसमें एक ही बाघ के निशान कई बार गिने जाने या अलग-अलग बाघों के निशानों में भ्रम की संभावना रहती थी।
कैमरा ट्रैप पद्धति
नई प्रणाली में जंगलों में विशेष कैमरे लगाए जाते हैं, जो स्वतः बाघों की तस्वीरें लेते हैं। प्रत्येक बाघ के शरीर पर बनी धारियां अलग-अलग होती हैं, जिससे उसकी सटीक पहचान और गणना संभव होती है। इस कारण इसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
वर्षवार बाघों की संख्या
सरकारी जवाब और एनटीसीए के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—
वर्ष बाघों की संख्या
2001-02 3,642 (पगमार्क पद्धति)
2006 1,411
2010 1,706
2014 2,226
2018 2,967
2022 3,682
इन आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि 2006 में वैज्ञानिक पद्धति अपनाने के बाद शुरुआती अनुमान पहले की तुलना में काफी कम सामने आया था।
वन्यजीव कार्यकर्ता ने मांगा वैज्ञानिक विश्लेषण
मध्य प्रदेश के वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे का कहना है कि इस पूरे विषय पर विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए। उनके अनुसार, पुराने और वर्तमान आंकड़ों के बीच अंतर यह संकेत देता है कि गणना पद्धतियों की विश्वसनीयता पर गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह लोकसभा में दिया गया सरकारी जवाब है, इसलिए सरकार को इस विषय पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
वन मंत्रालय ने कहा- हमारे आंकड़े सही
भारत सरकार के वन मंत्रालय में एडीजी (वाइल्डलाइफ) सुशील कुमार अवस्थी ने कहा कि वर्तमान बाघ गणना के आंकड़े पूरी तरह सही हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय वर्ष 2010 से वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर बाघों की गणना कर रहा है और वर्तमान आंकड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों तथा सेंट पीटर्सबर्ग डिक्लेरेशन के अनुरूप तैयार किए गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2001-02 के आंकड़ों के संबंध में उन्हें जानकारी नहीं है।
संरक्षण पर फिर शुरू हुई चर्चा
बाघों की संख्या से जुड़े इन अलग-अलग सरकारी आंकड़ों ने संरक्षण नीति, गणना पद्धति और सरकारी दावों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में पारदर्शी और वैज्ञानिक मानकों के आधार पर किए गए विश्लेषण से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि देश में बाघों की वास्तविक स्थिति क्या है और संरक्षण प्रयास कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।