कागजी थाली में डिजिटल 'छप्पन भोग'बच्चों की थाली में गायब!
नर्मदापुरम में एमडीएम को लेकर Denvapost की जमीनी पड़ताल में कई सवाल। हड़ताल के बीच पोर्टल पर भोजन वितरण की एंट्री और स्कूलों में वास्तविक स्थिति पर उठे सवाल!


हमारे देश में तकनीक ने कितनी तरक्की कर ली है, इसका सबसे प्रत्यक्ष, चमकदार और पेट-भरू प्रमाण इन दिनों हमारे जिले के सरकारी स्कूलों में देखने को मिल रहा है। अगर आप 'मिड-डे मील' (एमडीएम) के सरकारी पोर्टल पर अपनी दिव्य दृष्टि डालेंगे, तो आपको लगेगा कि जिले के सभी नौनिहाल इस समय दाल, चावल, सब्जी, रोटियां और शायद खीर-पूरी खाकर एकदम कुश्ती लड़ने लायक सेहतमंद हो चुके हैं। पोर्टल का सर्वर धुएं की तरह तेज चल रहा है, डेटा मक्खन की तरह अपडेट हो रहा है और आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि "हाँ साहब! बच्चा-बच्चा तृप्त है!"
लेकिन जरा ठहरिए! अगर आप अपनी उस पुरानी, घिसी-पिटी और आउटडेटेड 'भौतिक आँखों' से धरातल पर यानी स्कूलों के प्रांगण में झांकेंगे, तो दृश्य थोड़ा अलग मिलेगा। वहाँ आपको बच्चे अपनी जेबों या बस्तों से पराठे, सूखी रोटियां या नमकीन का पैकेट निकालते दिखेंगे। रसोई घर पर बड़ा सा ताला लटक रहा है, चूल्हा ठंडा पड़ा है और उस पर छिपकलियां आराम फरमा रही हैं।
जी हां, इसे कहते हैं डिजिटल युग का चमत्कारी चमत्कार! खाना पेट में भले न पहुंचे, लेकिन पोर्टल में 'अपलोड' होना चाहिए। आख़िरकार, हमारे अधिकारी भूखे पेट से नहीं, 'भरे हुए पोर्टल' से प्यार करते हैं।
16 सितंबर की वो तिथि और रसोई की खामोशी
कहानी शुरू होती है बीते 16 सितंबर से। जिले में सालों से बच्चों के लिए खाना पकाने वाली महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्य और रसोइया बहनें अचानक 'स्वार्थी' हो गईं। उन्होंने सरकार से मांग कर दी कि साहब, इस महंगाई के दौर में जितने पैसे आप देते हैं, उतने में तो कड़वा तेल का छोटा पैकेट भी ठीक से नहीं आता। सो, वे अपनी जायज मांगों को लेकर हड़ताल पर चली गईं।
रसोइया बहनों ने जैसे ही चूल्हा जलाना बंद किया, स्कूलों की पाकशालाओं में 'शांति निकेतन' जैसा सन्नाटा पसर गया। अब होना तो यह चाहिए था कि आला अधिकारी मौके पर पहुंचते, रसोइयों को मनाते या कोई वैकल्पिक वास्तविक व्यवस्था करते। लेकिन आधुनिक प्रशासनिक विज्ञान में समस्याओं का समाधान ढूँढने से बेहतर होता है, उन्हें कागजों और व्हाट्सएप्प पर सुलझा लेना!

व्हाट्सएप्प का 'ब्रह्मास्त्र' और अधिकारियों का दबाब
जैसे ही एमडीएम बंद होने की खबर ऊपर तक पहुंची, अधिकारियों के वातानुकूलित कमरों से एक से बढ़कर एक 'डिजिटल फरमान' जारी होने लगे। अफसरों ने जिले के व्हाट्सएप्प ग्रुप्स पर ब्रह्मास्त्र चला दिया। "चाहे जो हो जाए, एमडीएम बंद नहीं होना चाहिए! एसएमसी (शाला प्रबंधन समिति) हर हाल में भोजन संचालित करे!"
अधिकारियों की इस 'प्रेरणादायक'या डराने वाली धमकी के बाद बेचारों शिक्षकों की घिग्घी बंध गई। अब शिक्षक महोदय करें तो क्या करें?
एक तरफ हड़ताली बहनें बैठी हैं जो खाना बनाने नहीं आ रहीं। दूसरी तरफ अधिकारियों का 'कड़ा रुख' है कि पोर्टल पर रेड (लाल) मार्क दिखा तो निलंबित कर दिए जाओगे और तीसरी तरफ खाली पेट बिलबिलाते मासूम बच्चे हैं!
ऐसी विषम परिस्थिति में हमारे बुद्धिजीवी शिक्षकों ने बीच का एक बड़ा ही 'वैज्ञानिक रास्ता' निकाला। रास्ता यह था कि "बच्चों! कल से घर से टिफिन लेकर आना जब तक रसोइया बहनों की हड़ताल चल रही है।"
बस! समस्या हल हो गई। बच्चे घर से सूखी रोटी लाए, उन्होंने खाई। शिक्षकों ने राहत की सांस ली और तुरंत एमडीएम पोर्टल खोला और बड़े ही गर्व से 'YES' पर क्लिक कर दिया। "आज भी 100% बच्चों को गर्मागर्म पौष्टिक भोजन परोसा गया!"
वाह! क्या गजब की व्यवस्था है। रोटी माता-पिता की, टिफिन बच्चे का, मेहनत शिक्षक की पोर्टल भरने में और श्रेय... हमारी महान शिक्षा व्यवस्था का!
Denvapost की पड़ताल में सामने आया अलग-अलग स्कूलों का सच
जब अफवाहों का बाजार गर्म हुआ, तो देनवापोस्ट की टीम ने ज़मीनी पड़ताल की। शनिवार को टीम ने जिले के कई इलाकों का दौरा किया। आइए, जरा इस डिजिटल ईमानदारी के दर्शन करें:
माखननगर के 5 स्कूल: चूल्हा पूरी तरह ठंडा। पोर्टल पर दर्ज, सबने पेट भरकर खाया!
सिवनीमालवा के 3 स्कूल: रसोई में धूल जमा। पोर्टल पर दर्ज, बच्चों ने भोजन का आनंद लिया!
पिपरिया के 25 स्कूल: धरातल पर एमडीएम नदारद, लेकिन पोर्टल पर हरी झंडी!
हालाँकि, पिपरिया के 18 स्कूल इस मामले में थोड़े 'पिछड़े' रह गए या यूं कहें कि उनके हेडमास्टर साहब में झूठ बोलने का डिजिटल हुनर थोड़ा कम था। उन्होंने डेटा 'सही' अपडेट कर दिया कि खाना नहीं बना। अब ईश्वर ही जाने उन 18 हेडमास्टरों की गोपनीय चरित्रावली (CR) पर अधिकारी कौन सा कड़वा घूंट पियेंगे!
बिना पैसे के 'जादुई भोजन'या एसएमसी का गुप्त खजाना?
अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे रहस्यमयी और तकनीकी पहलू पर। देनवापोस्ट की इन्वेस्टिगेशन ने एक ऐसा सच उजागर किया है, जिसे सुनकर आधुनिक अर्थशास्त्र के बड़े-बड़े विद्वान भी अपना सिर पकड़ लेंगे।
जांच में पता चला कि वर्ष 2026-27 में जिले के किसी भी स्कूल को एसएमसी (SMC) या एसएमडीसी (SMDC) का एक भी रूपया जारी नहीं किया गया है। न तो 'राज्य शिक्षा केंद्र' ने कोई फूटी कौड़ी भेजी, और न ही 'लोक शिक्षण संचालनालय' (DPI) ने कोई फंड ट्रांसफर किया। अब सवाल यह उठता है कि जब खाते में एक रुपया भी नहीं है, तो एसएमसी वाले किस 'अदृश्य मद' से आलू, दाल, चावल और गैस सिलेंडर खरीद रहे हैं?
नियम कहते हैं कि एसएमसी में बच्चों की दर्ज संख्या के हिसाब से राशि आती है।
1 से 50 बच्चे: ₹12,500
51 से 100 बच्चे: ₹25,000
101 से 150 बच्चे: ₹50,000... और इसी क्रम में आगे।
लेकिन जब खाते में ₹0.00 हैं, तो क्या शिक्षक अपनी जेब से, या शाला विकास कोष से, या फिर किसी गुप्त खजाने से बच्चों को खाना खिला रहे हैं? या फिर... यह सब सिर्फ और सिर्फ पोर्टल का 'डिजिटल मायाजाल' है?
अरे साहब, यह अलादीन के चिराग का दौर नहीं, यह पोर्टल का दौर है! यहाँ बिना राशन के भी पोर्टल पर पूरियां तली जा सकती हैं!
आपकी क्यूरी बहुत ज्यादा है!
जब देनवापोस्ट के संवाददाता ने इस पूरे घोल-मटोल, फर्जीवाड़े और बिना बजट के चल रहे 'कागजी ढाबे' के बारे में जिला एमडीएम प्रभारी कंचन कुंभारे से फोन पर संपर्क किया, तो उम्मीद थी कि कोई ठोस जवाब मिलेगा।
संवाददाता ने पूछा "मैडम, जब फंड नहीं आया, रसोइया हड़ताल पर हैं, तो पोर्टल पर खाना कैसे बंट रहा है?"
प्रभारी मैडम ने अत्यंत प्रशासनिक, गंभीर और संक्षिप्त शैली में उत्तर दिया। "आपकी क्यूरी (सवाल) बहुत ज्यादा है! आप इस संबंध में सीधे जिला सीईओ (CEO) सर से बात करें।"
इसे कहते हैं जिम्मेदारी को 'पार्सल' बनाकर दूसरे के कूरियर से भेजना। जब सवाल कड़वे हों और जवाब गायब हों, तो सबसे आसान तरीका यही होता है— "बड़े साहब से पूछो!" मैडम की इस 'क्यूरी-प्रूफ' नीति की दाद देनी पड़ेगी। अब पत्रकार महोदय 'क्यूरी' का झोला लेकर सीईओ साहब के दरवाजे पर दस्तक दें, तब तक पोर्टल पर दो-चार दिन का खाना और दर्ज हो चुका होगा!
महासंघ का दर्द "हमारा आंदोलन कमजोर करने की साजिश"
दूसरी तरफ, हड़ताल पर बैठी बहनों की पीड़ा भी कम नहीं है। महिला स्व-सहायता समूह महासंघ की ओर से श्रीमती गौरी इस्कर ने इस पूरे घटनाक्रम की पोल खोलते हुए बताया "हमारी बहनों पर स्कूलों द्वारा लगातार अनैतिक दबाव बनाया जा रहा है। धमकी दी जा रही है कि अगर तुमने खाना नहीं बनाया, तो तुम्हारे समूह को बेदखल कर दिया जाएगा, समूह हटाने की कार्यवाही की जाएगी। डर के मारे जिले के कुछेक स्कूलों में भले बहनों ने मजबूरी में खाना बना दिया हो, लेकिन यह कहना कि पूरे जिले में एमडीएम प्रभावित नहीं हुआ है—यह कोरा सफेद झूठ है!"
श्रीमती गौरी आगे कहती हैं कि "यह जो ऑनलाइन पोर्टल पर झूठा डेटा ठूंसा जा रहा है, यह कोई तकनीकी गलती नहीं है। यह हमारे जायज और शांतिपूर्ण आंदोलन को कमजोर करने की एक सोची-समझी साजिश है। सरकार और प्रशासन ऊपर बैठे आकाओं को दिखाना चाहते हैं कि 'देखिए, हड़ताल का कोई असर नहीं है, सब बढ़िया चल रहा है।"
शिक्षकों की मजबूरी यह है कि अगर वे सच बोलेंगे, तो 'कारण बताओ नोटिस' पा जाएंगे। रसोइया बहनों की मजबूरी यह है कि वे काम करें तो पैसे नहीं मिलते, न करें तो निकाले जाने की धमकी मिलती है। और बच्चों की मजबूरी? उन्हें तो घर से टिफिन लाकर भी पोर्टल का 'उपभोक्ता' बनना पड़ रहा है!
धन्य है हमारा एमडीएम विभाग, धन्य हैं हमारे आंकड़े अपडेट करने वाले शिक्षक, और धन्य हैं हमारी 'ज्यादा क्यूरी' से घबराने वाली अफसरशाही! जब तक पोर्टल पर खाना पक रहा है, तब तक धरातल पर किसी के भूखे रहने से प्रशासन को क्या फर्क पड़ता है? आख़िरकार, "डेटा ही सत्य है, बाकी सब मोह-माया है!"

