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उज्जैन · 23 दिन पहले

Ujjain News: उज्जैन का 5 हजार साल पुराना बोरेश्वर महादेव मंदिर, जलाधारी का रहस्य आज भी कायम

उज्जैन के दंगवाड़ा स्थित प्राचीन बोरेश्वर महादेव मंदिर की रहस्यमयी जलाधारी और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में जानिए। सावन में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

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समाचार डेस्क · 23 दिन पहले
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Ujjain News: उज्जैन का 5 हजार साल पुराना बोरेश्वर महादेव मंदिर, जलाधारी का रहस्य आज भी कायम

उज्जैन। मध्य प्रदेश की मालवा भूमि प्राचीन धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। इसी पावन धरती पर उज्जैन से करीब 36 किलोमीटर दूर दंगवाड़ा गांव में स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि यह मंदिर करीब 5,000 वर्ष पुराना है और यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग की जलाधारी का जलस्तर कभी कम या अधिक नहीं होता।

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जलाधारी का रहस्य आज भी बना हुआ है अनसुलझा

मंदिर के पुजारी प्रकाश शर्मा के अनुसार बोरेश्वर महादेव एक सिद्ध एवं अतिप्राचीन तीर्थ है। स्थानीय मान्यता है कि यहां 12 ज्योतिर्लिंगों का समावेश है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता शिवलिंग की जलाधारी है, जिसमें श्रद्धालु कितना भी जल अर्पित करें, जल का स्तर हमेशा समान बना रहता है।

लोकविश्वास है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल सीधे पाताल गंगा में समा जाता है। पुजारी के अनुसार समय-समय पर इस प्राकृतिक जलधारा को रोकने के प्रयास किए गए, लेकिन हर बार जल पुनः स्वतः प्रकट हो गया। श्रद्धालु जलकुंभ में सिक्के भी अर्पित करते हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे भी पाताल गंगा में विलीन हो जाते हैं।

चंबल नदी करती है मंदिर की परिक्रमा, ऐसी है मान्यता

बोरेश्वर महादेव मंदिर चंबल नदी के किनारे स्थित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार मां चंबल मंदिर की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ती हैं, लेकिन भगवान शिव के सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करतीं।

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ग्रामीणों का विश्वास है कि नंदी महाराज रात्रि में मंदिर परिसर में विचरण करते हैं और कई श्रद्धालुओं ने उनके दर्शन होने का दावा भी किया है। कुछ लोगों का कहना है कि रात के समय मंदिर में घंटी और घड़ियाल अपने आप बजने जैसी घटनाएं भी देखने को मिली हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

पौराणिक कथाओं से जुड़ा है मंदिर

स्थानीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान का संबंध माता सती की तपस्या और भगवान गणेश के प्राकट्य से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि माता सती ने यहीं कठोर तप किया था। एक लोककथा के अनुसार उन्होंने अपने उबटन से भगवान गणेश की प्रतिमा बनाकर उसमें प्राण स्थापित किए थे।

एक अन्य लोककथा के अनुसार प्राचीन काल में यहां बसे एक गांव के बोरेश्वर नामक व्यक्ति को खेत में हल चलाते समय शिवलिंग प्राप्त हुआ। इसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई और उसी के नाम पर इसका नाम बोरेश्वर महादेव पड़ा। कुछ लोग शिवलिंग की आकृति को बोर (बेर) के समान होने के कारण भी इस नाम का कारण मानते हैं।

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सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

श्रावण मास में बोरेश्वर महादेव मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाता है और प्रत्येक सोमवार को भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। वर्षभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां जलाभिषेक और दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

भक्तों की आस्था है कि सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर बोरेश्वर महादेव उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

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