भारत में बदल रही गाड़ी खरीदने की पसंद, EV-CNG-Hybrid को मिल रहा बढ़ावा
भारत में वाहन खरीदारों की पसंद तेजी से बदल रही है। EV, CNG और Hybrid की हिस्सेदारी बढ़ रही है, जबकि पेट्रोल-डीजल का दबदबा घट रहा है। जानें आंकड़े और वजह।


भारत में कार या दोपहिया खरीदना कभी बहुत सीधा फैसला हुआ करता था—पेट्रोल या डीजल। लेकिन अब भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की तस्वीर तेजी से बदल रही है। ग्राहक केवल यह नहीं देख रहा कि गाड़ी कितनी बड़ी, खूबसूरत या ताकतवर है; वह यह भी पूछ रहा है कि इसे चलाने का खर्च कितना आएगा, ईंधन कितना महंगा पड़ेगा और आने वाले वर्षों में यह तकनीक कितनी उपयोगी रहेगी।
यही बदलाव पेट्रोल और डीजल से आगे निकलकर सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग में दिखाई दे रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बदलाव अब केवल महानगरों या चुनिंदा कार खरीदारों तक सीमित नहीं रह गया है। इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि वैकल्पिक ईंधन भारतीय परिवहन व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में अपनी जगह बना रहे हैं।
ईवी की रफ्तार अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आंकड़े इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। अप्रैल से जून 2026 के बीच देश में 82,737 इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों का पंजीकरण हुआ, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह संख्या 43,710 थी। यानी लगभग एक साल में पंजीकरण में 89 फीसदी से अधिक की वृद्धि।
यह आंकड़ा केवल बिक्री का नहीं, बल्कि उपभोक्ता मानसिकता में बदलाव का संकेत है।
टाटा मोटर्स, महिंद्रा और जेएसडब्ल्यू एमजी जैसी कंपनियों के इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या बताती है कि वाहन निर्माता भी इस बदलते बाजार को गंभीरता से ले रहे हैं। और जुलाई 2026 का आंकड़ा तो इस बदलाव को और मजबूत करता है। एफएडीए के अनुसार, जुलाई में देश में 3,27,901 इलेक्ट्रिक वाहन रिटेल हुए। यह एक महीने में ईवी रिटेल का नया रिकॉर्ड बताया गया है।
सबसे बड़ा संकेत दोपहिया और तिपहिया बाजार से मिल रहा है
भारत में इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति को समझने के लिए सिर्फ कारों को देखना पर्याप्त नहीं है।
जुलाई 2026 में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 11.24 फीसदी रही, जबकि जुलाई 2025 में यह 7.65 फीसदी थी। लेकिन तिपहिया वाहन बाजार में बदलाव कहीं ज्यादा बड़ा है। यहां इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 65.08 फीसदी तक पहुंच गई।
यह आंकड़ा बहुत कुछ कहता है।
तिपहिया वाहन बड़ी संख्या में व्यावसायिक उपयोग में आते हैं। इनके मालिक के लिए वाहन केवल सुविधा नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का साधन होता है। ऐसे में प्रति किलोमीटर संचालन लागत का महत्व बेहद ज्यादा होता है।
अगर इलेक्ट्रिक वाहन कम संचालन लागत उपलब्ध कराते हैं, तो उनका तेजी से अपनाया जाना स्वाभाविक है। यानी भारत में ईवी का भविष्य केवल निजी कारों से तय नहीं होगा। कमर्शियल और सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक बदलाव शायद इससे भी ज्यादा निर्णायक साबित हो सकता है।
पेट्रोल की हिस्सेदारी घट रही है, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई
जुलाई 2026 के ईंधन मिश्रण के आंकड़े सबसे दिलचस्प संकेत देते हैं।
पेट्रोल/एथेनॉल की हिस्सेदारी 41.68 फीसदी रही। वहीं सीएनजी/एलपीजी 24.67 फीसदी, डीजल 17.73 फीसदी, हाइब्रिड 8.02 फीसदी और ईवी 7.90 फीसदी पर रहे। एक साल पहले पेट्रोल/एथेनॉल की हिस्सेदारी 47.62 फीसदी थी। यानी इसमें स्पष्ट कमी आई।
दूसरी ओर सीएनजी/एलपीजी और ईवी की हिस्सेदारी बढ़ी।
अगर सीएनजी/एलपीजी, हाइब्रिड और ईवी को एक साथ देखें तो इनकी संयुक्त हिस्सेदारी 40.59 फीसदी बैठती है। पेट्रोल/एथेनॉल से अंतर केवल 1.09 प्रतिशत अंक रह जाता है।
यही शायद इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है।
हालांकि, इसे इस रूप में देखना सही नहीं होगा कि पेट्रोल अगले ही दिन बाजार से गायब होने वाला है। ऐसा न तो आंकड़े बताते हैं और न ही वर्तमान भारतीय ऑटोमोबाइल ढांचा इसकी पुष्टि करता है।लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पेट्रोल का एकछत्र दबदबा अब पहले जैसा नहीं रहा।
CNG क्यों बनी मजबूत पसंद?
भारत में वैकल्पिक ईंधन की कहानी केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की कहानी नहीं है।
सीएनजी ने भी अपनी जगह मजबूत की है। इसका सबसे बड़ा कारण है—चलाने की लागत।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी पेट्रोल कार का माइलेज 15 किलोमीटर प्रति लीटर है और पेट्रोल की कीमत ₹102.12 प्रति लीटर है, तो प्रति किलोमीटर ईंधन खर्च लगभग ₹6.81 होगा।
वहीं 20 किलोमीटर प्रति किलो का माइलेज देने वाली सीएनजी कार ₹86.98 प्रति किलो की कीमत पर लगभग ₹4.35 प्रति किलोमीटर पड़ेगी। यानी इस उदाहरण में सीएनजी करीब ₹2.46 प्रति किलोमीटर सस्ती पड़ती है।
यह अंतर रोजाना वाहन चलाने वाले उपभोक्ता के लिए महत्वपूर्ण है।
इसीलिए सीएनजी की कीमत बढ़ने के बावजूद अगर प्रति किलोमीटर खर्च पेट्रोल से कम रहता है, तो वह एक मजबूत विकल्प बनी रह सकती है।
हाइब्रिड उन ग्राहकों के लिए 'बीच का रास्ता' है
हाइब्रिड वाहन शायद भारतीय बाजार की एक अलग जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
ऐसे ग्राहक जो इलेक्ट्रिक तकनीक के फायदे चाहते हैं, लेकिन चार्जिंग की चिंता या पूरी तरह ईवी पर निर्भर रहने को लेकर अभी आश्वस्त नहीं हैं, उनके लिए हाइब्रिड एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है। जुलाई 2025 में हाइब्रिड की हिस्सेदारी 7.89 फीसदी थी, जो जुलाई 2026 में बढ़कर 8.02 फीसदी हुई।
यह वृद्धि ईवी जितनी तेज नहीं है, लेकिन यह बताती है कि बाजार में एक ही तकनीक नहीं जीत रही। ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से विकल्प चुन रहा है।
यही भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की सबसे बड़ी विशेषता बनती जा रही है।
क्या ई20 पेट्रोल के प्रति ग्राहकों की धारणा बदलेगा?
पेट्रोल वाहनों के भविष्य की चर्चा ई20 के बिना अधूरी है।
ई20 का उद्देश्य पेट्रोल में इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। लेकिन इसके साथ वाहन मालिकों के बीच माइलेज और पुराने वाहनों की अनुकूलता को लेकर सवाल भी उठे हैं।
यदि किसी वाहन में ई20 के कारण माइलेज प्रभावित होता है, तो ग्राहक स्वाभाविक रूप से वाहन की कुल रनिंग कॉस्ट की गणना करेगा।यहां सरकार और वाहन उद्योग के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी है—उपभोक्ता को स्पष्ट, तकनीकी और पारदर्शी जानकारी देना।
कौन-सा वाहन किस ईंधन के लिए डिजाइन किया गया है, वास्तविक माइलेज पर कितना असर पड़ सकता है और पुराने वाहनों के लिए क्या सावधानी जरूरी है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब ग्राहक तक पहुंचना चाहिए।
ईवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं है
ईवी की बिक्री बढ़ रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इसकी राह पूरी तरह आसान हो गई है।
ईवी के सामने कई सवाल अभी भी मौजूद हैं—
चार्जिंग नेटवर्क कितना व्यापक होगा?
लंबी दूरी के यात्रियों के लिए चार्जिंग सुविधा कितनी भरोसेमंद होगी?
बैटरी की उम्र और बदलने की लागत क्या होगी?
सेकेंड हैंड ईवी का बाजार कितना मजबूत होगा?
अलग-अलग शहरों और छोटे कस्बों में सर्विस नेटवर्क कितना उपलब्ध होगा?
सरकार ने पीएम ई-ड्राइव जैसी योजनाओं और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए ईवी को बढ़ावा देने की कोशिश की है। 7 अगस्त 2026 तक देश में 67,657 ईवी चार्जर स्थापित किए जाने की जानकारी भी दी गई है।
लेकिन भारत जैसे विशाल देश में चुनौती केवल संख्या की नहीं है। चार्जर कहां हैं, कितने समय में चार्ज करते हैं और जरूरत के वक्त काम करते हैं या नहीं—ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए यह बदलाव चेतावनी भी है और अवसर भी
बदलते आंकड़े वाहन कंपनियों के लिए साफ संदेश हैं।
अब केवल पेट्रोल इंजन को बेहतर बनाना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को ईवी, हाइब्रिड, सीएनजी और दूसरी वैकल्पिक तकनीकों में भी निवेश करना होगा। जो कंपनियां ग्राहक की बदलती जरूरत को पहले समझेंगी, वे बाजार में आगे निकल सकती हैं।
दूसरी ओर सरकार के सामने भी चुनौती है। नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो किसी एक तकनीक को जबरन आगे बढ़ाने के बजाय उपभोक्ता को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराएं।
भारत की परिस्थितियां यूरोप या अमेरिका से अलग हैं। यहां महानगरों के साथ छोटे शहर, ग्रामीण क्षेत्र, लंबी दूरी के यात्री, व्यावसायिक वाहन और दोपहिया वाहन—सभी की जरूरतें अलग हैं।
इसलिए भारत के लिए शायद एक ही ईंधन का भविष्य नहीं, बल्कि कई तकनीकों का मिश्रण अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा।
क्या पेट्रोल-डीजल का युग खत्म होने वाला है?
सीधा जवाब है—अभी नहीं।
लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि पेट्रोल-डीजल के प्रभुत्व वाला युग बदल रहा है।
ईवी तेजी से बढ़ रहे हैं। सीएनजी अपनी आर्थिक उपयोगिता के कारण मजबूत है। हाइब्रिड संक्रमणकालीन तकनीक के रूप में जगह बना रहा है। वहीं पेट्रोल और डीजल अभी भी देश के विशाल वाहन बेड़े की रीढ़ हैं।
भविष्य की सड़क पर शायद सिर्फ इलेक्ट्रिक कारें नहीं दौड़ेंगी। वहां ईवी, हाइब्रिड, सीएनजी और पेट्रोल-आधारित वाहन साथ-साथ नजर आएंगे।
अंतर सिर्फ इतना होगा कि अब चुनाव वाहन निर्माता नहीं, बल्कि ग्राहक करेगा।
और भारतीय ग्राहक का संदेश आंकड़ों में साफ सुनाई दे रहा है—
उसे सिर्फ गाड़ी नहीं चाहिए, उसे ऐसी गाड़ी चाहिए जो उसकी जेब, जरूरत और भविष्य—तीनों के अनुकूल हो।
यही बदलती पसंद आने वाले वर्षों में भारत के ऑटोमोबाइल बाजार की सबसे बड़ी कहानी बनने वाली है।
