ब्रेकिंग
मंगलवार, 8 सितंबर 2026
Denva Post
सभी खबरें
नई दिल्ली · 7 मिनट पहले

E20 पर नई बहस: इथेनॉल की बढ़ती मांग से खाद्य सुरक्षा पर दबाव, ICRIER ने सुझाया E15 का विकल्प

अशोक गुलाटी समेत विशेषज्ञों की रिपोर्ट में E20 को दीर्घकालिक लक्ष्य बनाए रखने की सलाह, लेकिन कच्चे माल की कमी या खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ने पर ब्लेंडिंग घटाने का सुझाव

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 7 मिनट पहले
शेयर
E20 पर नई बहस: इथेनॉल की बढ़ती मांग से खाद्य सुरक्षा पर दबाव, ICRIER ने सुझाया E15 का विकल्प

नई दिल्ली। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति ने जहां आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और घरेलू जैव ईंधन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं अब इसके सामने ‘फूड बनाम फ्यूल’ की चुनौती भी उभर रही है।

आर्थिक शोध संस्थान ICRIER की हालिया शोध रिपोर्ट “Food vs Fuel: Recalibrating India’s Ethanol Blending Strategy” में सरकार से इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को लेकर अधिक लचीला रुख अपनाने की सिफारिश की गई है।

प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के सह-लेखन में तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को E20 यानी पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण के दीर्घकालिक लक्ष्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। हालांकि, जब घरेलू स्तर पर इथेनॉल की उपलब्धता कम हो या खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ने लगे, तब सरकार को परिस्थितियों के अनुसार ब्लेंडिंग को अस्थायी रूप से E15 यानी 15 प्रतिशत तक कम करने का विकल्प खुला रखना चाहिए।

पांच साल पहले हासिल हुआ E20 लक्ष्य

भारत ने पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से प्रगति की है। सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसे मूल समयसीमा से करीब पांच साल पहले ही इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2025-26 में हासिल कर लिया गया।

EBP कार्यक्रम का उद्देश्य पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता घटाना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और देश में उपलब्ध कृषि उत्पादों से नवीकरणीय ईंधन को बढ़ावा देना है।

इथेनॉल खरीद में तेजी

ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) की इथेनॉल खरीद में भी पिछले कुछ वर्षों में तेज वृद्धि हुई है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

ESY 2023-24: 679.04 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद, करीब ₹48,757 करोड़ का मूल्य।

ESY 2024-25: 1,033.31 करोड़ लीटर की खरीद, करीब ₹73,996 करोड़।

जून 2026 तक: 705.43 करोड़ लीटर की खरीद, करीब ₹49,577 करोड़।

वहीं 2019-20 से 2025-26 के बीच OMCs को सप्लाई किए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा 173.03 करोड़ लीटर से बढ़कर अनुमानित 1,200 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है। रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक यह करीब 38 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) को दर्शाता है।

असली चिंता इथेनॉल की मांग नहीं, कच्चे माल की उपलब्धता

रिपोर्ट में इथेनॉल ब्लेंडिंग की तेज रफ्तार और इसके लिए जरूरी कृषि उत्पादों की उत्पादन वृद्धि के बीच अंतर को महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिस अवधि में इथेनॉल की मांग करीब 38 प्रतिशत CAGR से बढ़ी, उसी दौरान इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख फसलों का उत्पादन अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ा।

इस अवधि में:

मक्के का उत्पादन: करीब 11.4% CAGR

चावल का उत्पादन: करीब 4.4% CAGR

गन्ने का उत्पादन: करीब 5.1% CAGR

यानी इथेनॉल की मांग जिस गति से बढ़ रही है, उसके मुकाबले इसके प्रमुख फीडस्टॉक यानी कच्चे कृषि माल की उपलब्धता उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है।

यहीं से ‘फूड बनाम फ्यूल’ की बहस और गंभीर हो जाती है।

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी ने बढ़ाई चिंता

रिपोर्ट में चीनी बाजार के हालिया रुझानों को भी इस चुनौती से जोड़कर देखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक कम शुरुआती स्टॉक और उत्पादन में गिरावट के बीच खुदरा चीनी की मोडल कीमत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

आंकड़ों के अनुसार चीनी की मोडल कीमत जुलाई में करीब ₹45 प्रति किलोग्राम थी, जो 29 अगस्त तक बढ़कर लगभग ₹65 प्रति किलोग्राम हो गई। यानी इस अवधि में करीब 44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन के लिए होता है, तो खाद्य बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर इसका कितना असर पड़ सकता है।

क्या E20 लक्ष्य को बदलने की जरूरत है?

ICRIER की रिपोर्ट का सुझाव E20 लक्ष्य को खत्म करना नहीं है, बल्कि इसे परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाने पर जोर देता है।

रिपोर्ट के मुताबिक E20 को भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य के रूप में जारी रखा जाना चाहिए। लेकिन यदि किसी वर्ष घरेलू स्तर पर इथेनॉल की उपलब्धता कम हो जाती है या कृषि उत्पादों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है, तो सरकार को कुछ समय के लिए ब्लेंडिंग लक्ष्य को E15 तक घटाने का विकल्प रखना चाहिए।

इसका उद्देश्य ईंधन नीति और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना है।

‘फ्लेक्सिबल फीडस्टॉक स्ट्रैटेजी’ पर जोर

रिपोर्ट में सरकार के लिए ‘फ्लेक्सिबल फीडस्टॉक स्ट्रैटेजी’ अपनाने की सिफारिश की गई है। यानी इथेनॉल उत्पादन के लिए किसी एक फसल या कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय उपलब्धता के अनुसार अलग-अलग स्रोतों का इस्तेमाल किया जाए।

गन्ने का इस्तेमाल उपलब्धता के हिसाब से

चीनी की पर्याप्त उपलब्धता होने पर गन्ने और उससे जुड़े स्रोतों से इथेनॉल उत्पादन जारी रखा जा सकता है। लेकिन जब चीनी का स्टॉक कम हो या खाद्य बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़े, तो गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को नियंत्रित करने की जरूरत हो सकती है।

मक्के की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

रिपोर्ट में मक्के की उत्पादकता बढ़ाने को भी महत्वपूर्ण माना गया है। इससे इथेनॉल उत्पादन के लिए एक वैकल्पिक और अपेक्षाकृत मजबूत फीडस्टॉक तैयार किया जा सकता है।

मक्के की उत्पादकता और आपूर्ति बढ़ने से गन्ने और चीनी पर इथेनॉल उत्पादन का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

FCI के चावल का इस्तेमाल केवल वास्तविक अधिशेष में

रिपोर्ट में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के चावल के इस्तेमाल को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

सुझाव है कि FCI के चावल का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में तभी किया जाए जब देश में वास्तविक खाद्य अधिशेष उपलब्ध हो। साथ ही इसकी कीमत कम से कम अधिग्रहण लागत के बराबर रखने की बात कही गई है।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईंधन उत्पादन के लिए खाद्य सुरक्षा से समझौता न हो।

जरूरत पड़ने पर आयात का विकल्प

रिपोर्ट में घरेलू आपूर्ति में कमी आने की स्थिति में आयात को भी नीति विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है।

चीनी की कमी होने पर बफर स्टॉक बनाए रखने के लिए चीनी आयात का सहारा लिया जा सकता है। इसके साथ ही कच्चे माल और इथेनॉल के आयात को लेकर अधिक खुला और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की गई है।

इससे घरेलू कृषि उत्पादन पर अचानक बढ़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

भारत के सामने अब दोहरी चुनौती

भारत के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा और किसानों के लिए बाजार उपलब्ध कराने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन जैसे-जैसे E20 का लक्ष्य आगे बढ़ रहा है, सरकार के सामने ऊर्जा सुरक्षा के साथ खाद्य सुरक्षा का संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ रही है।

ICRIER की रिपोर्ट का मूल संदेश यही है कि E20 को दीर्घकालिक दिशा के रूप में बनाए रखते हुए नीति में इतना लचीलापन होना चाहिए कि खाद्य वस्तुओं की कमी या कीमतों में तेज उछाल की स्थिति में सरकार तत्काल रणनीति बदल सके।

यानी आने वाले वर्षों में भारत की इथेनॉल नीति का सवाल सिर्फ ‘कितना इथेनॉल पेट्रोल में मिलाना है’ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी तय करना होगा कि इथेनॉल बनाने के लिए कच्चा माल कहां से आएगा और उसकी कीमत खाद्य बाजार पर कितना असर डालेगी।

यह खबर शेयर करें
शेयर
ज़्यादा जानें
इतिहास
पत्रकारिता और समाचार उद्योग
राजनीतिक