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नर्मदापुरम · 13 मिनट पहले

पचमढ़ी में उगेंगी काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता, किसानों को पहली बार मिलेंगे पौधे

पचमढ़ी में काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी। उद्यानिकी विभाग की नर्सरी में पौधे तैयार, किसानों को प्रशिक्षण और पौधे उपलब्ध कराने की योजना।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 13 मिनट पहले
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पचमढ़ी में उगेंगी काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता, किसानों को पहली बार मिलेंगे पौधे

नर्मदापुरम। मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन पचमढ़ी में अब काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता की खेती को व्यावसायिक रूप देने की तैयारी शुरू हो गई है। वर्षों से प्रायोगिक स्तर पर इन मसालों के पौधे उगाए जा रहे थे, लेकिन अब उद्यानिकी विभाग इस प्रयोग को किसानों तक पहुंचाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसके लिए पचमढ़ी के पोलो उद्यान में मसालों की नर्सरी तैयार की गई है, जहां से पहली बार किसानों को इन मसाला फसलों के पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे।

उद्यानिकी विभाग की इस पहल का उद्देश्य किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ नए विकल्प उपलब्ध कराना है। यदि पचमढ़ी की जलवायु में इन मसालों की खेती सफल रहती है, तो भविष्य में इनके व्यावसायिक उत्पादन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

पचमढ़ी की जलवायु में मसाला खेती की संभावनाएं

काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता ऐसी मसाला फसलें हैं, जिनके लिए विशेष जलवायु और अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है। देश में इनकी खेती मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होती है, जहां तापमान, नमी और वर्षा की परिस्थितियां इनके अनुकूल रहती हैं।

काली मिर्च और दालचीनी की खेती दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में बड़े पैमाने पर की जाती है। केरल और कर्नाटक इनके प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। वहीं, तेजपत्ता का उत्पादन हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में भी होता है, जिनमें पश्चिम बंगाल और मेघालय प्रमुख हैं।

पचमढ़ी की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए इन मसालों की खेती की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर उत्पादन से पहले पौधों की वृद्धि, उपज, रोगों के प्रभाव और स्थानीय परिस्थितियों में उनकी अनुकूलता का आकलन महत्वपूर्ण होगा।

ब्रिटिश काल से हो रहा है प्रयोग

पचमढ़ी में इन मसालों को उगाने का इतिहास पुराना है। बताया जाता है कि ब्रिटिश काल में यहां की भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु को देखते हुए काली मिर्च, दालचीनी और अन्य मसालों के पौधे लगाने के प्रयोग किए गए थे।

उस दौर में कुछ अधिकारियों के बंगलों और आवासीय परिसरों में भी इन पौधों को लगाया गया था। इसके बाद स्थानीय स्तर पर नर्सरी में प्रायोगिक तौर पर पौधे तैयार किए जाते रहे। कभी-कभी इन्हें विशिष्ट अतिथियों को देने या पर्यटकों को बेचने के लिए भी उपलब्ध कराया जाता था।

आज भी पचमढ़ी के कुछ पुराने प्रशासनिक आवासीय परिसरों में काली मिर्च की बेल और दालचीनी के पेड़ देखने को मिल जाते हैं। इसके बावजूद अब तक इन फसलों को बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेती से जोड़ने की दिशा में ठोस प्रयास नहीं हो सके थे। अब उद्यानिकी विभाग की पहल से इस दिशा में नई संभावनाएं बन रही हैं।

नर्सरी में तैयार किए 100 काली मिर्च के पौधे

पचमढ़ी के पोलो उद्यान स्थित उद्यानिकी विभाग की नर्सरी में फिलहाल काली मिर्च के 100 पौधे तैयार किए गए हैं। इसके अलावा दालचीनी और तेजपत्ता के पौधे भी तैयार किए गए हैं।

विभाग की योजना आने वाले दिनों में काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता के 500-500 पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराने की है। इसके साथ ही किसानों को इन फसलों की खेती से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, ताकि पौधों की देखभाल, रोपण और उत्पादन की तकनीक की जानकारी मिल सके।

यह पहल फिलहाल शुरुआती स्तर पर है। पौधों की उपलब्धता बढ़ने और किसानों के खेतों में इनके परिणाम सामने आने के बाद ही इनके व्यावसायिक उत्पादन की संभावनाओं का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।

पारंपरिक खेती के साथ मिलेगा नया विकल्प

उद्यानिकी विभाग किसानों को पारंपरिक खेती के साथ मसाला फसलों के उत्पादन के लिए भी प्रेरित कर रहा है। काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता जैसी फसलें किसानों के लिए अतिरिक्त आय का विकल्प बन सकती हैं, बशर्ते स्थानीय जलवायु में इनकी उपज और बाजार की मांग अनुकूल साबित हो।

मध्यप्रदेश में पहले से ही धनिया, लहसुन, लाल मिर्च, मेथी, कलौंजी, सौंफ और जीरे जैसी मसाला फसलों का उत्पादन होता है। ऐसे में पचमढ़ी में काली मिर्च, दालचीनी और तेजपत्ता की खेती का विस्तार प्रदेश के मसाला उत्पादन में विविधता ला सकता है।

हालांकि, किसानों को इन फसलों की लागत, उत्पादन अवधि, बाजार उपलब्धता और संभावित लाभ की जानकारी देना भी जरूरी होगा। प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के साथ खेती के परिणामों का आकलन इस पहल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

शासन स्तर पर अभी कोई योजना नहीं

जिला उद्यानिकी अधिकारी रीता उइके ने बताया कि पचमढ़ी में स्थानीय स्तर पर यह पहल शुरू की गई है। शासन स्तर पर फिलहाल इन मसालों के उत्पादन को लेकर कोई योजना नहीं है। इस संबंध में शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।

विभाग की मौजूदा कोशिश नर्सरी में पौधे तैयार करने, किसानों को उपलब्ध कराने और उन्हें प्रशिक्षण देने पर केंद्रित है। यदि प्रयोग के सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो आगे इन मसालों की खेती का दायरा बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।

फिलहाल पचमढ़ी में शुरू हुई यह पहल किसानों के लिए खेती के नए विकल्प तलाशने की दिशा में एक शुरुआती कदम है। अब इसकी सफलता स्थानीय परिस्थितियों में पौधों की वृद्धि, उत्पादन और किसानों को मिलने वाले वास्तविक आर्थिक लाभ पर निर्भर करेगी।

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