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मंदसौर/नीमच · 37 मिनट पहले

नई अफीम नीति 2026-27 से किसानों को झटका, चीरा पद्धति के पट्टों पर सख्ती, नहीं बढ़े अफीम के दाम

मंदसौर-नीमच के अफीम किसानों में निराशा, चीरा पट्टे के लिए औसत उत्पादन की सीमा 4.4 किलो निर्धारित; सीपीएस पद्धति को मिलेगा बढ़ावा, कम उत्पादन वाले किसानों के पट्टों पर संकट

अशोक शर्मा
अशोक शर्मा
Sub Editor · 37 मिनट पहले
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नई अफीम नीति 2026-27 से किसानों को झटका, चीरा पद्धति के पट्टों पर सख्ती, नहीं बढ़े अफीम के दाम

मंदसौर/नीमच। केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा अफीम फसल वर्ष 2026-27 के लिए घोषित नई अफीम नीति ने मध्यप्रदेश के प्रमुख अफीम उत्पादक जिलों मंदसौर और नीमच के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। लंबे समय से अफीम के सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को नई नीति में कोई बड़ी आर्थिक राहत नहीं मिली है। इसके विपरीत पारंपरिक चीरा पद्धति के लाइसेंस के लिए उत्पादन संबंधी शर्तों को और सख्त कर दिया गया है। नई व्यवस्था में चीरा पद्धति के पट्टों की संख्या घटने और केंद्रित पोस्त पुआल यानी सीपीएस (Concentrated Poppy Straw) पद्धति के पट्टों में बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।

नई नीति के अनुसार, पारंपरिक चीरा पद्धति से अफीम उत्पादन करने वाले किसानों के लिए औसत उत्पादन की पात्रता सीमा 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कर दी गई है। इससे निर्धारित सीमा से कम उत्पादन देने वाले किसानों को चीरा पद्धति के बजाय सीपीएस प्रणाली में स्थानांतरित किया जा सकता है।

चीरा पद्धति के लिए अब 4.4 किलो औसत जरूरी

नई अफीम नीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव पारंपरिक चीरा पद्धति के पट्टों की पात्रता को लेकर किया गया है। पहले जहां 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की औसत उत्पादन सीमा लागू थी, वहीं अब इसे बढ़ाकर 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है।

नई शर्तों के अनुसार, जिन किसानों का औसत उत्पादन 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या उससे अधिक रहा है, वे 10 आरी क्षेत्रफल के चीरा पद्धति वाले पट्टे के पात्र होंगे।

वहीं तीन किलोग्राम से लेकर 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम औसत उत्पादन वाले किसानों को पारंपरिक चीरा पद्धति के बजाय सीपीएस पद्धति के अंतर्गत पांच आरी का पट्टा दिया जाएगा।

इस बदलाव का सीधा असर उन किसानों पर पड़ सकता है, जो वर्षों से चीरा पद्धति के माध्यम से अफीम की खेती करते आ रहे हैं।

तीन किलो से कम औसत वाले किसानों पर संकट

नई नीति में कम उत्पादन देने वाले किसानों के लिए भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। जिन किसानों का औसत अफीम उत्पादन तीन किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम रहा है, वे सामान्य प्रावधानों के तहत चीरा पद्धति के पट्टे की पात्रता खो देंगे।

हालांकि वर्ष 1998 से 2003 के बीच दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन वाले कुछ पुराने मामलों में विशेष छूट का प्रावधान रखा गया है। ऐसे पात्र किसानों को सीपीएस पद्धति के अंतर्गत पांच आरी का पट्टा मिल सकेगा।

इस व्यवस्था से लंबे समय से पट्टे बहाल होने की उम्मीद लगाए बैठे कुछ किसानों को राहत मिल सकती है, लेकिन सामान्य श्रेणी में कम उत्पादन वाले किसानों के सामने लाइसेंस की पात्रता बनाए रखने की चुनौती रहेगी।

समझिए नई अफीम नीति में पट्टों का गणित

औसत उत्पादन या पात्रता प्रस्तावित पट्टा

4.4 किलो प्रति हेक्टेयर या अधिक 10 आरी, चीरा पद्धति

3 से 4.4 किलो प्रति हेक्टेयर से कम 5 आरी, सीपीएस पद्धति

3 किलो प्रति हेक्टेयर से कम सामान्य नियम में चीरा पट्टे की पात्रता नहीं

1998–2003 के पात्र पुराने मामले, 2 किलो औसत 5 आरी, सीपीएस पद्धति

800 किलो प्रति हेक्टेयर या अधिक डोडा पोस्त उत्पादन 5 आरी, सीपीएस पट्टा बहाली

डोडा पोस्त उत्पादन के लिए भी कड़े नियम

नई नीति में डोडा पोस्त के उत्पादन को लेकर भी स्पष्ट पात्रता निर्धारित की गई है। जिन किसानों ने 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या उससे अधिक डोडा पोस्त का उत्पादन दिया है, उनके सीपीएस पट्टे बहाल किए जाने का प्रावधान बताया गया है।

ऐसे किसानों को पांच आरी क्षेत्रफल में सीपीएस पद्धति से खेती करने की अनुमति मिल सकेगी। वहीं निर्धारित उत्पादन सीमा से कम उपज देने वाले किसानों को पट्टे की पात्रता खोने का खतरा रहेगा।

इस व्यवस्था से उन किसानों की चिंता बढ़ सकती है, जिनका उत्पादन मौसम, फसल रोग या अन्य कृषि संबंधी परिस्थितियों के कारण निर्धारित सीमा से नीचे रह गया था।

सीपीएस पद्धति का बढ़ेगा दायरा, चीरा पट्टे घटने की संभावना

नई नीति से केंद्र सरकार का जोर पारंपरिक चीरा पद्धति की तुलना में सीपीएस प्रणाली का विस्तार करने पर दिखाई दे रहा है।

चीरा पद्धति में अफीम के पौधे के डोडे पर चीरा लगाकर निकलने वाले लेटेक्स को एकत्र किया जाता है। इसके विपरीत सीपीएस प्रणाली में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पोस्त पुआल को एकत्र कर उसमें मौजूद औषधीय एल्कलॉइड के औद्योगिक निष्कर्षण की व्यवस्था की जाती है।

नई पात्रता शर्तों के कारण तीन से 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम औसत वाले किसानों को सीपीएस प्रणाली में स्थानांतरित किए जाने से इसके पट्टों की संख्या बढ़ सकती है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का अनुमान है कि आगामी फसल सत्र में इस बदलाव का व्यापक असर देखने को मिलेगा।

अफीम के दाम नहीं बढ़ने से किसानों में मायूसी

अफीम उत्पादक किसानों की लंबे समय से प्रमुख मांग सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोतरी की रही है। किसानों का तर्क है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। मजदूरी, सिंचाई, खाद, दवाइयों और फसल की देखभाल पर होने वाला खर्च उनकी आमदनी को प्रभावित करता है।

ऐसे में नई नीति से किसानों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद थी। हालांकि उपलब्ध नीति विवरण में अफीम के खरीद मूल्य में बढ़ोतरी का कोई प्रावधान सामने नहीं आया है।

मंदसौर और नीमच जैसे अफीम उत्पादक क्षेत्रों में नई पात्रता शर्तों को लेकर किसानों के बीच चिंता बढ़ने की संभावना है।

मंदसौर-नीमच के किसानों पर पड़ेगा सीधा असर

मध्यप्रदेश के मंदसौर और नीमच जिले देश के प्रमुख लाइसेंस प्राप्त अफीम उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हैं। यहां बड़ी संख्या में किसान निर्धारित सरकारी नियमों के तहत अफीम की खेती करते हैं।

नई नीति में उत्पादन की औसत सीमा बढ़ने से उन किसानों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है, जिनका उत्पादन पिछली पात्रता सीमा के आसपास रहा है।

विशेष रूप से 4.2 से 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के बीच औसत उत्पादन देने वाले किसानों को नई शर्तों के कारण चीरा पद्धति के बजाय सीपीएस पद्धति में जाना पड़ सकता है।

किसानों के सामने उत्पादन बढ़ाने की चुनौती

नई नीति लागू होने के बाद अफीम किसानों के सामने निर्धारित उत्पादन सीमा हासिल करने की चुनौती बढ़ जाएगी। अफीम की खेती पूरी तरह लाइसेंस और सरकारी नियंत्रण के अंतर्गत होती है। इसलिए किसानों के लिए पट्टे की पात्रता बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मौसम की अनिश्चितता, फसल में रोग और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियां उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में अधिक औसत उत्पादन की अनिवार्यता किसानों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।

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