ब्रेकिंग
रविवार, 25 अक्टूबर 2026
Denva Post
सभी खबरें
भोपाल · 22 मिनट पहले

नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी AJL को बड़ी राहत, भोपाल की 1.14 एकड़ जमीन से बेदखली की याचिका खारिज

भोपाल जिला अदालत ने BDA की बेदखली याचिका की खारिज, 1981 में आवंटित जमीन को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद; मालिकाना हक पर अंतिम फैसला अभी स्पष्ट नहीं

अशोक शर्मा
अशोक शर्मा
Sub Editor · 22 मिनट पहले
शेयर
नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी AJL को बड़ी राहत, भोपाल की 1.14 एकड़ जमीन से बेदखली की याचिका खारिज

भोपाल। नेशनल हेराल्ड अखबार की प्रकाशक कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जमीन से जुड़े एक पुराने विवाद में बड़ी कानूनी राहत मिली है। जिला एवं सत्र न्यायालय ने शनिवार को भोपाल विकास प्राधिकरण (BDA) की ओर से दायर बेदखली याचिका खारिज कर दी। यह मामला एमपी नगर स्थित प्रेस कॉम्प्लेक्स की लगभग 1.14 एकड़ जमीन से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1981 में एजेएल को आवंटित किया गया था।

भोपाल विकास प्राधिकरण ने जमीन के कथित दुरुपयोग और आवंटन निरस्त किए जाने के आधार पर कंपनी को परिसर से बेदखल करने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने प्राधिकरण की याचिका स्वीकार नहीं की। एजेएल की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता विकास गुप्ता ने फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि बीडीए ने कंपनी को जमीन से बेदखल करने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन उसकी याचिका खारिज हो गई है।

1981 में हुआ था जमीन का आवंटन, 1992 में बंद हुआ नवजीवन अखबार

विवादित जमीन भोपाल के व्यावसायिक क्षेत्र एमपी नगर के प्रेस कॉम्प्लेक्स में स्थित है। वर्ष 1981 में लगभग 1.14 एकड़ जमीन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को समाचार पत्र प्रकाशन के उद्देश्य से आवंटित की गई थी। इस परिसर से हिंदी दैनिक 'नवजीवन' का प्रकाशन किया जाता था।

बताया जाता है कि वर्ष 1992 में नवजीवन का प्रकाशन बंद हो गया। इसके बाद जमीन के उपयोग और उस पर विकसित संपत्ति को लेकर सवाल उठने लगे। भोपाल विकास प्राधिकरण ने आवंटन की शर्तों के उल्लंघन और जमीन के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर आपत्ति दर्ज की।

2014 में BDA ने जारी किया था नोटिस

भोपाल विकास प्राधिकरण ने वर्ष 2014 में एजेएल को जमीन के कथित दुरुपयोग के संबंध में नोटिस जारी किया था। कंपनी ने नोटिस का जवाब भी प्रस्तुत किया, लेकिन प्राधिकरण ने जवाब को संतोषजनक नहीं माना।

इसके बाद बीडीए ने जमीन का आवंटन निरस्त करने की कार्रवाई की और कंपनी को बेदखल करने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की। यह मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया में उलझा हुआ था।

अब जिला अदालत द्वारा बेदखली याचिका खारिज किए जाने से एजेएल को राहत मिली है। हालांकि, इस फैसले के पीछे न्यायालय के विस्तृत कानूनी आधार आदेश की प्रति सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।

पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर इमारत निर्माण और बिक्री से बढ़ा विवाद

इस जमीन से जुड़ा विवाद उस समय और जटिल हो गया, जब वर्ष 2001 में नई दिल्ली की गंगा एंटरप्राइजेज से जुड़े नरेंद्र कुमार मित्तल ने कथित पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर परिसर में एक बड़ी इमारत का निर्माण कराया।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बाद में इमारत के अलग-अलग हिस्से कई लोगों को बेच दिए गए। भोपाल के हरमहेंद्र सिंह बग्गा और संजय सिन्हा भी मित्तल के साथ साझेदार के रूप में काम कर रहे थे।

इमारत के विभिन्न हिस्से खरीदने वाले लोगों ने संपत्ति पर अपने अधिकारों का दावा किया। इनमें से कुछ खरीदारों को उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश भी प्राप्त हुए। इसके चलते जमीन के आवंटन, निर्माण, बिक्री और कब्जे से जुड़े कानूनी सवाल लंबे समय तक बने रहे।

बेदखली याचिका खारिज, लेकिन मालिकाना हक का सवाल अलग

जिला अदालत के फैसले से एजेएल को तत्काल राहत जरूर मिली है, लेकिन इस आदेश को जमीन के मालिकाना हक पर अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

कानूनी दृष्टि से बेदखली की याचिका खारिज होना और संपत्ति पर स्वामित्व का अंतिम निर्धारण दो अलग-अलग विषय हैं। जमीन के मूल आवंटन, उसके निरस्तीकरण, निर्माण की वैधता और संपत्ति खरीदने वाले व्यक्तियों के अधिकारों पर फैसले का वास्तविक प्रभाव विस्तृत न्यायालयीन आदेश तथा अन्य संबंधित मामलों की स्थिति से स्पष्ट होगा।

यह खबर शेयर करें
शेयर
ज़्यादा जानें
कोरियर सर्विस चुनें
नक्शे देखें
खबरें पढ़ें