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देनवा एक्सक्लूसिव · 54 मिनट पहले

स्कूलों में ताले, चूल्हे ठंडे... पर सरकारी पोर्टल की फुल डाइट! माखननगर में मिड-डे मील के 'डिजिटल खेल' का खुलासा

माखननगर में मिड-डे मील का बड़ा फर्जीवाड़ा! 16 सितंबर से रसोइया बहनें हड़ताल पर हैं, लेकिन अधिकारियों के दबाव में पोर्टल पर झूठा डेटा फीड कर फर्जी खाना बांटा जा रहा है। देनवापोस्ट की ऑन-ग्राउंड एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 54 मिनट पहले
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स्कूलों में ताले, चूल्हे ठंडे... पर सरकारी पोर्टल की फुल डाइट! माखननगर में मिड-डे मील के 'डिजिटल खेल' का खुलासा

हमारे देश में तरक्की के दो बड़े पैमाने हैं। एक वो जो ज़मीन पर धूल फांकता नज़र आता है और दूसरा वो जो सरकारी कंप्यूटर की चमचमाती स्क्रीन पर 'ऑल इज़ वेल' के ढोल पीटता है। आजकल हमारे माखननगर क्षेत्र में मिड-डे मील (एमडीएम) यानी मध्याह्न भोजन की जो पावन गंगा बह रही है,उसे देखकर तो डिजिटल इंडिया की आत्मा भी गदगद होकर गिटार बजाने लगे।

देनवापोस्ट की पड़ताल ने जिस सच्चाई से परदा उठाया है,वह किसी महान वैज्ञानिक चमत्कार से कम नहीं है। ज़मीन पर चूल्हे ठंडे पड़े हैं, रसोइया बहनें और महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य 16 सितंबर से अपने जायज़ हकों के लिए हड़ताल पर बैठी हैं,लेकिन सरकारी एमडीएम पोर्टल का पेट इतना भरा हुआ है कि वह लगातार डेटा की डकारें ले रहा है। इसे कहते हैं कि "चूल्हा जले न जले, पोर्टल पर हलवा बंटना चाहिए!"

कहते हैं कि अन्न का अपमान नहीं करना चाहिए, लेकिन माखननगर में तो अन्न का ऐसा सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रो-मैनेजमेंट) चल रहा है कि देखकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट मैनेजर भी इस्तीफा देकर झोला उठा लें। यहाँ बच्चों को खाना मुंह देखकर दिया जा रहा है या फिर पोर्टल किसी खास डाइट प्लान पर चल रहा है, यह शोध का विषय है।

नासा वाले मौसम का अनुमान बाद में लगा पाते हैं, लेकिन हमारे शिक्षा विभाग और एमडीएम के कारिंदों का गणित इतना सटीक है कि वे जानते हैं कि किस बच्चे को भूख लगी है और किस बच्चे का आत्मा से पेट भरा हुआ है।

आइए,माखननगर के कुछ चुनिंदा विद्या मंदिरों के इस 'डिजिटल चमत्कार' के आंकड़ों पर एक भक्तिमय नज़र डालते हैं!

1.एकीकृत शाला आंखमऊ: 'दशमलव' में बंटता खाना

कुल दर्ज संख्या: 115

गुरूवार की उपस्थिति: 67 बच्चे

एमडीएम पोर्टल पर भोजन पाने वाले 'भाग्यशाली': 10 बच्चे!

आंखमऊ स्कूल का दृश्य सोचकर ही आंखों में पानी आ जाता है। 67 बच्चे स्कूल पहुंचे। 10 बच्चों को भोजन मिला और बाकी 57 बच्चे शायद यह सोचकर डिजिटल ध्यान में बैठ गए कि पोर्टल पर तो 10 की एंट्री हो गई है, बाकी 57 का पेट अपने आप भर गया होगा! अब इसे अधिकारियों का दबाव कहें या पोर्टल की कृपादृष्टि? 67 में से सिर्फ 10 का पेट भरना यह दर्शाता है कि बाकियों को शायद भोजन का विचार (Food Thought)परोसा गया था।

2.एकीकृत शाला गूजरवाड़ा:'शून्य' का महा-दर्शन

कुल दर्ज संख्या: 67

गुरूवार की उपस्थिति: 36 बच्चे

एमडीएम पोर्टल पर भोजन पाने वाले: 0 (शून्य)!

गूजरवाड़ा स्कूल ने तो ईमानदारी की सारी हदें पार कर दीं।कम से कम पोर्टल के मामले में! 36 बच्चे आस लगाए बैठे रहे, लेकिन पोर्टल ने साफ़-साफ़ लिख दिया गया 'जीरो'। यह शून्य आर्यभट्ट के शून्य से भी महान है। यह शून्य चीख-चीख कर कह रहा है कि अधिकारियों के दबाव में बटन तो दबाया गया, लेकिन ज़मीर ने शायद एक पल के लिए काम करना बंद कर दिया। यहाँ बच्चों को शायद यह सिखाया गया कि 'शून्य' ही जीवन का परम सत्य है और खाली पेट ही ज्ञान की सबसे बड़ी कुंजी है!

3.एकीकृत स्कूल मानागांव: 'सैकड़ा' बनाम 'इकाई'

कुल दर्ज संख्या: 304

गुरूवार की उपस्थिति: 130 बच्चे

एमडीएम पोर्टल पर भोजन पाने वाले: 11 बच्चे!

मानागांव में 130 नन्हे-मुन्ने बच्चे पढ़ाई करने आए। उन्हें उम्मीद थी कि दोपहर को गर्म-गर्म रोटी और दाल मिलेगी। लेकिन एमडीएम के जादूगरों ने 130 में से 11 बच्चों की लॉटरी निकाली! बाकी 119 बच्चे शायद यह सोचकर संतुष्ट हो गए होंगे कि अगली बार जब पोर्टल अपडेट होगा, तो शायद हमारा नंबर भी आ जाए। 130 बच्चों में से 11 का डेटा दर्ज करना यह बताता है कि डेटा एंट्री करने वाले बाबू का हाथ भी झूठ लिखते-लिखते कांप रहा था, इसलिए उसने 130 का '11' ही रहने दिया!

4.एकीकृत शाला बागड़ा: '35 में से 12 का कल्याण'

कुल दर्ज संख्या: 121

गुरूवार की उपस्थिति: 35 बच्चे

एमडीएम पोर्टल पर भोजन पाने वाले: 12 बच्चे!

बागड़ा में जब देनवापोस्ट की टीम पहुंची तो पता चला कि हाँ बच्चों को भोजन दिया गया है! लेकिन जब पोर्टल का लेखा-जोखा देखा गया, तो 35 उपस्थित बच्चों में से सिर्फ 12 बच्चों के पेट में खाना पहुंचा दर्ज हुआ। बाकी 23 बच्चे शायद हवा खाकर पढ़ाई कर रहे थे।

5. हायर सेकंडरी बागड़ा (मिडिल स्कूल): '5 बच्चों का महाभोज'

कुल दर्ज संख्या: 61

गुरूवार की उपस्थिति: 17 बच्चे

एमडीएम पोर्टल पर भोजन पाने वाले: 5 बच्चे!

17 बच्चे आए, 5 ने खाना खाया। बाकी 12 बच्चों ने शायद यह शपथ ली होगी कि वे हड़ताल खत्म होने तक सिर्फ 5 भाग्यशाली सहपाठियों को खाना खाते हुए देखकर ही अपनी भूख मिटाएंगे।

साहब, पोर्टल गलत अपडेट हो रहा है!

जब इस अनोखे डिजिटल छलावे और आंकड़ों के भारी-भरकम अंतर पर संबंधित जिम्मेदारों से सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब इतना निर्दोष और मासूम था कि सुनकर पत्थर का दिल भी मोम हो जाए।

उन्होंने फरमाया, नहीं भोजन तो सभी को दिया गया है! पोर्टल पर गलत जानकारी अपडेट हो रही है, हमें इसकी जानकारी ही नहीं है!

वाह! क्या गजब की तकनीक है!

पीएचडी स्कॉलर को तुरंत माखननगर आकर इस दिव्य 'पोर्टल' पर रिसर्च करनी चाहिए। दुनिया में एआई (Artificial Intelligence) आ गया है, लेकिन हमारे विभाग के पास 'एआई' से भी खतरनाक तकनीक है'बीआई' यानी 'बोगस इंटेलिजेंस'!

ज़रा सोचिए, स्कूल में रसोइया बहनें नहीं हैं, चूल्हे में लकड़ी नहीं है, बर्तनों में छौंक की खुशबू नहीं है, लेकिन पोर्टल अपनी मर्ज़ी से कभी 10, कभी 11, कभी 12 बच्चों की एंट्री कर रहा है! क्या यह पोर्टल खुद ही खाना पका रहा है? क्या यह बच्चों के सपनों में जाकर उन्हें पूड़ी-सब्जी खिला रहा है?

अगर जिम्मेदार अधिकारियों की मानें, तो पोर्टल कोई भूतिया जगह है जहाँ आंकड़े अपने आप टाइप हो जाते हैं। बाबूजी तो बस कीबोर्ड पर हाथ रखते हैं और पोर्टल खुद-ब-खुद वाह-वाही का डेटा फीड कर लेता है।

जब इस पूरे डेटा खेल का भांडा फूटा और बात जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन साहब तक पहुंची, तो उनका जवाब भी पारंपरिक और अत्यंत शालीन था। मुझे इसकी जानकारी नहीं है। अगर ऐसा कुछ चल रहा है, तो मैं दिखवाता हूं।

क्या बात है!मैं दिखवाता हूं, यह हमारे प्रशासनिक तंत्र का सबसे पसंदीदा और अचूक मंत्र है। जब भी ज़मीन पर कोई घोटाला, फर्जीवाड़ा या लापरवाही पकड़ी जाए, इस मंत्र का जाप कर दीजिए, आधी समस्या तो वैसे ही वातानुकूलित कमरों की ठंडी हवा में उड़ जाती है।

साहब को जानकारी नहीं है कि 16 सितंबर से पूरे जिले की रसोइया बहनें हड़ताल पर हैं! साहब को यह भी नहीं पता कि जब रसोइया बहनें सड़कों पर नारे लगा रही हैं, तो स्कूलों में चूल्हा कौन जला रहा है? शायद साहब सोचते होंगे कि बच्चे खुद ही घर से आटा-दाल लाते होंगे, खुद ही स्कूल के पीछे चूल्हा चुनते होंगे और खुद ही खाना बनाकर पोर्टल पर एंट्री भी कर देते होंगे!

साहब जब दिखवाएंगे, तब तक तो शायद बच्चे कुपोषण के नए कीर्तिमान स्थापित कर चुके होंगे या फिर पोर्टल अपने आप सभी 100% बच्चों को सुपोषित घोषित कर चुका होगा।

वाह-वाही की अंधी दौड़ जब ज़मीन सूखी हो और पोर्टल पर सावन बरसे,असल सवाल यही है कि आखिर यह फर्जीवाड़ा, यह डेटा का खेल खेला क्यों जा रहा है?

जवाब बहुत सीधा है 'ऊपर' सब ठीक दिखाना है!

भोपाल में बैठे आला अफसरों को पीपीटी (PPT) में हरी-हरी पट्टियां दिखानी हैं। अगर पोर्टल पर दर्ज हो जाए कि रसोइयों की हड़ताल के कारण माखननगर में एमडीएम बंद है,तो साहबों की छवि पर बट्टा लग जाएगा। फिर नेता जी का फोन आएगा, समीक्षा बैठक में डांट पड़ेगी। इसलिए निचले स्तर के कर्मचारियों पर दबाव बनाया जाता है। कुछ भी करो, पोर्टल बंद नहीं होना चाहिए! चाहे 5 बच्चे दिखाओ या 10, लेकिन एमडीएम की बत्ती हरी जलनी चाहिए!

इस वाह-वाही की होड़ में व्यवस्था इतनी पारंगत हो चुकी है कि अब उसे ज़मीन पर काम करने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती। ज़मीन पर बच्चे खाली पेट तख्ती लिख रहे हैं? कोई बात नहीं, पोर्टल पर खाना बंट गया! ज़मीन पर रसोइया बहनें अपने हक के लिए गिड़गिड़ा रही हैं? कोई बात नहीं, पोर्टल पर व्यवस्था 'सुचारू' है!ज़मीन पर 130 में से 11 बच्चों को खाना मिला? कोई बात नहीं, कम से कम 11 का डेटा तो चमका!

यह डेटा का खेल नहीं, बल्कि बच्चों के निवाले पर किया जाने वाला एक भद्दा मज़ाक है। यह उन गरीब परिवारों के बच्चों के साथ छल है जो इस उम्मीद में स्कूल आते हैं कि कम से कम दोपहर को एक वक्त का गर्म और पौष्टिक खाना नसीब होगा।

हड़ताल पर बहनें, बेहाल में बच्चे और निहाल में कागज़!

16 सितंबर से रसोइया बहनें और स्व-सहायता समूह की महिलाएं हड़ताल पर हैं। उनकी मांगें क्या हैं? वही मामूली मानदेय, जो समय पर नहीं मिलता। जिन हाथों ने सालों से बच्चों के लिए रोटियां बेलीं, आज वे हाथ तख्तियां थामे सड़कों पर हैं।

लेकिन हमारी संवेदनशील व्यवस्था ने इस समस्या का हल ढूंढने की जगह एक नया ही शॉर्टकट निकाल लिया। रसोइया नहीं हैं तो क्या हुआ, हमारे पास पासवर्ड और आईडी तो है!

अब खाना पकाने के लिए आटा, दाल, तेल और लकड़ी की ज़रूरत नहीं है। अब सिर्फ एक कंप्यूटर, एक डेटा एंट्री ऑपरेटर और एक बेशर्म दिल की ज़रूरत है। बटन दबाइए, 10 बच्चों का एमडीएम ओके! फिर बटन दबाइए, 12 बच्चों का एमडीएम ओके!

अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब स्कूलों से शिक्षकों और छात्रों की भी छुट्टी कर दी जाएगी। एक पोर्टल बना दिया जाएगा जहाँ लिखा होगा आज 500 बच्चों ने पोर्टल पर प्रवेश लिया, पोर्टल पर ही पढ़ाई की, पोर्टल पर ही एमडीएम खाया और पोर्टल से ही प्रथम श्रेणी में पास होकर डिजिटल नौकरी करने चले गए!

अधिकारियों के दबाव में जो गलत डेटा फीड किया जा रहा है, वह सिर्फ वरिष्ठ अधिकारियों को धोखा देना नहीं है, बल्कि देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जब 130 में से 11 बच्चों का खाना दर्ज होता है, तो बाकी 119 बच्चों का राशन कहाँ जाता है? क्या वह राशन कागजों में ही पच जाता है या किसी की जेब का 'पोषण' करता है?

माखननगर के इस ऐतिहासिक 'एमडीएम डेटा मॉडल' के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अफसरों को एक नमन तो बनता ही है।

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