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भोपाल · 45 मिनट पहले

एम्स भोपाल का शोध खोलेगा मौत के पीछे छिपे संक्रमण के राज, 331 शव-परीक्षण मामलों का अध्ययन

एम्स भोपाल की पीएचडी शोधार्थी अश्विनी चंद्रन 331 शव-परीक्षण मामलों में बैक्टीरिया और फंगस का अध्ययन कर रही हैं। जानिए पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी और सेप्सिस की पहचान में इस शोध का महत्व।

अशोक शर्मा
अशोक शर्मा
Sub Editor · 45 मिनट पहले
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एम्स भोपाल का शोध खोलेगा मौत के पीछे छिपे संक्रमण के राज, 331 शव-परीक्षण मामलों का अध्ययन

भोपाल। किसी मरीज की मौत के पीछे गंभीर संक्रमण जिम्मेदार था या नहीं, बीमारी फैलाने वाले जीवाणु अथवा फंगस की पहचान संभव थी या नहीं और संक्रमण ने मृत्यु में कितनी भूमिका निभाई—ऐसे महत्वपूर्ण सवालों के जवाब तलाशने में एम्स भोपाल का शोध मददगार साबित हो सकता है। संस्थान के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग की पीएचडी शोधार्थी अश्विनी चंद्रन 331 शव-परीक्षण मामलों में बैक्टीरिया और फंगस का अध्ययन कर रही हैं। उनके इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित एक वेबिनार में प्रस्तुत किया गया है।

यह अध्ययन मृत्यु के संभावित कारणों को समझने के साथ संक्रमण की पहचान, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण और रोगाणुओं में एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, शोध के निष्कर्षों की चिकित्सकीय पुष्टि और अन्य साक्ष्यों से मिलान के बाद ही किसी मृत्यु में संक्रमण की भूमिका निर्धारित की जा सकती है।

331 शव-परीक्षण मामलों में बैक्टीरिया और फंगस का अध्ययन

शोध का प्रमुख उद्देश्य शव-परीक्षण के दौरान सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी का अध्ययन करना है। इस प्रक्रिया को पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी कहा जाता है। इसमें मृत्यु के बाद शरीर के रक्त और ऊतकों के नमूनों की जांच करके बैक्टीरिया तथा फंगस की पहचान करने का प्रयास किया जाता है।

इस तरह के अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि मृत्यु से पहले व्यक्ति गंभीर संक्रमण से पीड़ित था या नहीं और संक्रमण ने उसकी हालत बिगाड़ने में कितनी भूमिका निभाई। इसके अलावा, संक्रमण से जुड़े ऐसे पैटर्न सामने आ सकते हैं, जिनकी पहचान सामान्य चिकित्सकीय जांच से करना मुश्किल होता है।

शोध से प्राप्त आंकड़े अस्पतालों में संक्रमण के प्रकार और रोगाणुओं के दवा प्रतिरोध से जुड़े रुझानों को समझने में भी उपयोगी हो सकते हैं। इससे भविष्य में संक्रमण की रोकथाम और उपचार संबंधी रणनीतियों को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार मिल सकता है।

अनसुलझी मौतों की जांच में मिल सकती है मदद

कुछ मामलों में मरीज की हालत तेजी से बिगड़ती है और मृत्यु का स्पष्ट कारण निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सेप्सिस ऐसी ही गंभीर स्थिति है, जिसमें संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है और समय पर उपचार नहीं मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है।

ऐसे मामलों में शव-परीक्षण के साथ सूक्ष्मजीवों और संक्रमण से जुड़े संकेतकों की जांच से फॉरेंसिक विशेषज्ञों तथा चिकित्सकों को मृत्यु के संभावित कारणों का आकलन करने में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है।

हालांकि, केवल रक्त या ऊतकों में बैक्टीरिया अथवा फंगस की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि मृत्यु उसी संक्रमण के कारण हुई। इसके लिए पोस्टमार्टम निष्कर्षों, मरीज के चिकित्सकीय इतिहास, प्रयोगशाला जांच और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र विश्लेषण जरूरी होता है।

सेप्सिस की पहचान पर शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित

अश्विनी चंद्रन का एक शोध पत्र इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लीगल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। इसमें मृत्यु के बाद रक्त में प्रोकैल्सिटोनिन (PCT) की जांच के जरिए सेप्सिस को मृत्यु के संभावित कारण के रूप में पहचानने की उपयोगिता का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है।

प्रोकैल्सिटोनिन शरीर में गंभीर संक्रमण के दौरान बढ़ सकने वाला एक जैविक संकेतक है। मृत्यु के बाद रक्त में इसकी मात्रा का अध्ययन करने से सेप्सिस से जुड़े मामलों की जांच में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है।

हालांकि, प्रोकैल्सिटोनिन का स्तर अकेले सेप्सिस या मृत्यु के कारण की पुष्टि नहीं करता। इसकी उपयोगिता को समझने के लिए अन्य चिकित्सकीय और फॉरेंसिक निष्कर्षों के साथ इसका आकलन करना आवश्यक है।

यूरोप के वैज्ञानिक मंच पर प्रस्तुत किया गया शोध

अश्विनी चंद्रन को यूरोपियन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड इन्फेक्शियस डिजीज (ESCMID) के दो अध्ययन समूहों—ESGFOR और EFISG—द्वारा आयोजित वेबिनार में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। इस कार्यक्रम में चार वक्ताओं ने अपने शोध और अनुभव साझा किए।

331 शव-परीक्षण मामलों पर आधारित उनका अध्ययन पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी के बड़े अध्ययनों में शामिल बताया गया है। पीएचडी शोध में डॉ. अरनीत अरोड़ा पर्यवेक्षक हैं। वहीं, डॉ. जयंती यादव, डॉ. निरंजन साहू, डॉ. आयुष गुप्ता, डॉ. सागर खदंगा और डॉ. टी. करुणा सह-मार्गदर्शक हैं। फंगस संक्रमण और मृत्यु के बाद उसकी जांच से जुड़े पहलुओं में डॉ. टी. करुणा का मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा है।

संक्रमण नियंत्रण और फॉरेंसिक जांच के लिए अहम पहल

एम्स भोपाल का यह शोध मृत्यु के कारणों की वैज्ञानिक पड़ताल को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इससे संक्रमण की पहचान से जुड़े तरीकों, पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी और रोगाणुओं के दवा प्रतिरोध को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलने की संभावना है।

शोध के निष्कर्षों की आगे की पुष्टि और चिकित्सकीय उपयोगिता के आकलन के बाद यह अध्ययन संक्रमण से जुड़ी मौतों की जांच तथा अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की रणनीतियों के विकास में योगदान दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में शोध की प्रस्तुति से एम्स भोपाल के अनुसंधान कार्य को वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने रखने का अवसर भी मिला है।

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