बढ़ती आमदनी ही घरेलू कर्ज संकट का स्थायी समाधान, RBI रिपोर्ट ने जताई चिंता
RBI की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में घरेलू कर्ज बढ़ने पर चिंता जताई गई है। कम आय वाले परिवारों में ऋण का दबाव बढ़ा है, जबकि गोल्ड लोन में तेज वृद्धि दर्ज हुई है।


नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नवीनतम वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) ने देश की बैंकिंग व्यवस्था को लेकर सकारात्मक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में हैं। हालांकि, रिपोर्ट ने आम नागरिकों, विशेषकर कम आय वाले परिवारों की बढ़ती कर्ज निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता भी व्यक्त की है।
घरेलू कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर
रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2025 तक भारत का घरेलू ऋण (Household Debt) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 47.8 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से यह आंकड़ा बहुत अधिक नहीं माना जाता, लेकिन इसकी संरचना चिंता बढ़ाने वाली है।
विशेषज्ञों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग घर खरीदने या आय बढ़ाने वाले निवेश के बजाय दैनिक खर्च, चिकित्सा, घरेलू जरूरतों और पुराने कर्ज चुकाने के लिए ऋण ले रहे हैं। इससे भविष्य में वित्तीय दबाव बढ़ने की आशंका है।
कम आय वाले परिवारों पर सबसे अधिक दबाव
RBI के अध्ययन के मुताबिक, ₹10 लाख से कम वार्षिक आय वाले परिवारों को नए खुदरा ऋणों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा मिला। वहीं, दिसंबर 2025 में बने नए एनपीए (Non-Performing Assets) में इन उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी 78 प्रतिशत रही।
यह संकेत देता है कि ऋण चुकाने का सबसे अधिक दबाव आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर है, जबकि कॉरपोरेट क्षेत्र के ऋण अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
गोल्ड लोन में तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि माइक्रोफाइनेंस ऋण में गिरावट के बाद बड़ी संख्या में लोग गोल्ड लोन की ओर बढ़े हैं। मार्च 2024 से गोल्ड लोन में करीब 42.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई, जो सामान्य खुदरा ऋण वृद्धि से लगभग दोगुनी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई परिवार बढ़ी हुई सोने की कीमतों का लाभ उठाकर पुराने कर्ज चुकाने या नए ऋण लेने के लिए अपने आभूषण गिरवी रख रहे हैं।
जोखिम परिवारों पर स्थानांतरित
विश्लेषकों का कहना है कि बैंकों के लिए गोल्ड लोन अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं क्योंकि उनके पास गिरवी के रूप में सोना मौजूद रहता है। लेकिन यदि उधारकर्ता किस्तें नहीं चुका पाते, तो उनके गहनों की नीलामी हो सकती है। ऐसे में बैंकिंग व्यवस्था भले ही मजबूत दिखाई दे, लेकिन वास्तविक वित्तीय जोखिम परिवारों पर स्थानांतरित हो जाता है।
केवल ऋण माफी नहीं, आय बढ़ाना जरूरी
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि समय-समय पर घोषित ऋण माफी योजनाएं स्थायी समाधान नहीं हैं। इससे सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ता है और ऋण चुकाने का अनुशासन भी प्रभावित हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार घरेलू कर्ज संकट को कम करने के लिए वास्तविक आय में वृद्धि, सुरक्षित रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा पर जेब से होने वाले खर्च में कमी तथा मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है। साथ ही बेहतर क्रेडिट मूल्यांकन, सक्रिय क्रेडिट ब्यूरो और जिम्मेदार ऋण वितरण व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आय बढ़ेगी तो घटेगा कर्ज का बोझ
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि ऋण अस्थायी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन यह स्थायी आय का विकल्प नहीं बन सकता। यदि परिवारों को रोजमर्रा के खर्च या पुराने कर्ज चुकाने के लिए लगातार नया कर्ज लेना पड़े, तो वित्तीय समावेशन धीरे-धीरे वित्तीय असुरक्षा में बदल सकता है। ऐसे में देश की बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ आम लोगों की आय बढ़ाने पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होगा।
