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माखन नगर · 23-08-2026

नगर बदलना है तो पहले हमें बदलना होगा, हर समस्या के लिए प्रशासन को दोष कब तक?

अतिक्रमण, जाम और गंदगी के लिए सिर्फ प्रशासन को दोष देना कितना सही है? जानिए नागरिक जिम्मेदारी से नगर को बेहतर बनाने की जरूरत।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
Editor-in-Chief · 23-08-2026
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नगर बदलना है तो पहले हमें बदलना होगा, हर समस्या के लिए प्रशासन को दोष कब तक?

माखन नगर। नगर की सड़क पर जाम लगा है। दुकानों के सामने वाहन बेतरतीब खड़े हैं। सड़क के किनारे ठेले लगे हैं। कहीं दुकान का सामान सड़क तक फैला है तो कहीं कचरे का ढेर दिखाई देता है। नाली के आसपास गंदगी है और फिर हम कहते हैं—“प्रशासन कुछ नहीं करता।”

लेकिन जरा ठहरिए...

क्या हमने कभी खुद से पूछा है कि इस अव्यवस्था में हमारा कितना योगदान है?

यह सवाल कड़वा जरूर है, लेकिन जरूरी है। क्योंकि किसी भी नगर को सिर्फ अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस या नगर परिषद नहीं बनाते। नगर हम सब मिलकर बनाते हैं। हमारी आदतें, हमारा व्यवहार, हमारी जिम्मेदारी और सार्वजनिक स्थानों के प्रति हमारी सोच ही किसी नगर की वास्तविक तस्वीर तय करती है।

हाल ही में माखन नगर थाने में हुई शांति समिति की बैठक में नगर की कई समस्याओं पर चर्चा हुई। अतिक्रमण, यातायात जाम, पार्किंग, सड़क निर्माण, त्योहारों के दौरान यातायात व्यवस्था और साफ-सफाई जैसे मुद्दे सामने आए। प्रशासन ने भी अपनी तरफ से व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए निर्देश दिए।

लेकिन इस बैठक से निकलने वाला सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर की हर समस्या का समाधान केवल प्रशासन के पास है?

शायद नहीं।

शिकायत करना आसान है, जिम्मेदारी निभाना मुश्किल

हम सभी चाहते हैं कि हमारा नगर साफ हो। सड़कें चौड़ी और व्यवस्थित हों। बाजार में जाम न लगे। अतिक्रमण न हो। त्योहारों के दौरान यातायात सुचारु रहे। लेकिन जब बात अपनी जिम्मेदारी निभाने की आती है तो हमारी सोच बदल जाती है। हम चाहते हैं कि सड़क खाली रहे, लेकिन अपनी गाड़ी दुकान के ठीक सामने खड़ी करेंगे। हम चाहते हैं कि बाजार में जाम न लगे, लेकिन “सिर्फ पांच मिनट” कहकर सड़क पर वाहन खड़ा कर देंगे। हम चाहते हैं कि नगर साफ रहे, लेकिन हाथ में मौजूद कचरे के लिए डस्टबिन खोजने की बजाय उसे सड़क किनारे फेंक देंगे। हम चाहते हैं कि अतिक्रमण हटे, लेकिन सुविधा के लिए दुकान का सामान सड़क तक फैला देंगे। फिर जब जाम लगेगा, गंदगी होगी या रास्ता संकरा होगा तो सबसे पहले सवाल प्रशासन से होगा।

आखिर यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा?

सड़क किसी एक की निजी संपत्ति नहीं

माखन नगर की सड़कों पर रोजाना हजारों लोग आते-जाते हैं। व्यापारी हैं, ग्राहक हैं, विद्यार्थी हैं, बुजुर्ग हैं, महिलाएं हैं, मरीज हैं और जरूरी काम से निकलने वाले लोग हैं। सड़क सबकी है।

फिर सड़क के एक हिस्से पर अपना वाहन खड़ा कर देना या सामान फैला देना किसी एक व्यक्ति का अधिकार कैसे हो सकता है?

कई बार हम यह सोचकर वाहन खड़ा कर देते हैं कि “मेरे कारण थोड़ी न जाम लगेगा।” लेकिन जाम कभी एक वाहन से नहीं लगता। एक वाहन के बाद दूसरा वाहन उसी के पीछे रुकता है। फिर तीसरा। देखते ही देखते सड़क का प्रवाह रुक जाता है। और जब सामने से कोई बड़ा वाहन आ जाता है तो पूरा यातायात ठहर जाता है।

उस समय हम पुलिसकर्मी को ढूंढते हैं।

लेकिन असली समस्या पुलिसकर्मी की अनुपस्थिति से पहले हमारी आदत में पैदा हो चुकी होती है। “पांच मिनट” की पार्किंग कई लोगों का समय खराब कर देती है। हमारी सबसे सामान्य दलील होती है—“बस पांच मिनट के लिए गाड़ी लगाई है।”

लेकिन क्या सड़क पर मौजूद हर व्यक्ति यही सोचे तो?

एक व्यक्ति पांच मिनट के लिए वाहन खड़ा करता है। दूसरा दस मिनट के लिए। तीसरा दुकान के सामने वाहन छोड़कर खरीदारी करने चला जाता है।

फिर कोई पूछता है—जाम क्यों लगा है?

जवाब हमारे सामने ही होता है। हमें यह समझना होगा कि सड़क पर खड़ा किया गया हमारा वाहन केवल हमारा मामला नहीं है। वह किसी दूसरे व्यक्ति की यात्रा को प्रभावित कर सकता है। किसी को अस्पताल जाना हो सकता है। किसी विद्यार्थी की परीक्षा हो सकती है। किसी कर्मचारी को समय पर काम पर पहुंचना हो सकता है। हमारी छोटी सी लापरवाही किसी दूसरे के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।

यही सिविक सेंस (Civic Sense) है—दूसरे की परेशानी को समझना।

अतिक्रमण केवल प्रशासन की समस्या नहीं, अतिक्रमण की चर्चा होते ही अक्सर उंगली प्रशासन की ओर उठती है।

लेकिन अतिक्रमण पैदा कैसे होता है?

कहीं दुकान का सामान थोड़ा बाहर आया। फिर कुछ दिन बाद उससे थोड़ा और बाहर आया। फिर सामने ठेला लग गया। किसी ने सड़क किनारे स्थायी रूप से सामान रखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे सार्वजनिक रास्ता छोटा होता गया। और एक दिन हम कहते हैं—“नगर में अतिक्रमण बहुत बढ़ गया है।”

सवाल यह है कि क्या अतिक्रमण एक दिन में पैदा हुआ? नहीं।

यह हमारी छोटी-छोटी स्वार्थपूर्ण सुविधाओं से धीरे-धीरे बढ़ा है। इसलिए प्रशासन को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन नागरिकों को भी यह तय करना होगा कि वे सार्वजनिक जगह को अपनी निजी जगह नहीं बनाएंगे।

सफाई सिर्फ नगर परिषद की जिम्मेदारी नहीं, सफाई के मामले में भी हमारी सोच बदलनी होगी।

नगर परिषद के कर्मचारी रोजाना सफाई करते हैं। लेकिन अगर सफाई के कुछ घंटे बाद ही सड़क पर फिर प्लास्टिक, कागज, डिस्पोजल, पान की पीक और अन्य कचरा दिखाई देने लगे तो हमें यह भी देखना होगा कि कचरा वहां पहुंचा कैसे?

क्या नगर परिषद का कर्मचारी हर नागरिक के पीछे चल सकता है?

क्या हर दुकान के सामने एक कर्मचारी तैनात किया जा सकता है?

क्या हर व्यक्ति को कचरा फेंकने से रोकने के लिए किसी अधिकारी की जरूरत होनी चाहिए?

अगर जवाब नहीं है तो फिर हमें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। सफाई कर्मचारी नगर साफ कर सकता है, लेकिन नगर को गंदा न करने का निर्णय नागरिक को ही लेना होगा।

हमें दूसरों की गलती बहुत जल्दी दिखाई देती है।

हमारी एक आदत बहुत खतरनाक है—हमें दूसरे की गलती तुरंत दिखाई देती है, अपनी नहीं।

दुकानदार कहता है—ग्राहक गंदगी फैलाते हैं।

ग्राहक कहता है—दुकानदार ने सामान सड़क पर रख रखा है।

वाहन चालक कहता है—पुलिस यातायात नहीं संभालती।

पुलिस कहती है—लोग नियम नहीं मानते।

नागरिक कहते हैं—नगर परिषद सफाई नहीं करती।

नगर परिषद कहती है—लोग कचरा फैलाते हैं।

और इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच नगर की समस्या वहीं खड़ी रहती है। किसी को दोष देने से ज्यादा जरूरी है अपने हिस्से की गलती स्वीकार करना।

सिविक सेंस (Civic Sense) कोई बड़ी चीज नहीं,सिविक सेंस (Civic Sense) सुनने में अंग्रेजी का बड़ा शब्द लगता है, लेकिन इसका अर्थ बहुत सरल है।

कूड़ा डस्टबिन में डालना हो,सड़क पर गलत पार्किंग न करना। ट्रैफिक नियमों का पालन करना,

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचाना। दूसरे व्यक्ति के रास्ते का सम्मान करना,लाइन में खड़ा होना।सड़क पर थूकने से बचना एवं दुकान का सामान सड़क पर नहीं फैलाना सिविक सेंस (Civic Sense) है।

यानी सिविक सेंस (Civic Sense) कोई किताब में पढ़ने वाली चीज नहीं है। यह हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देता है।

प्रशासन को भी अपना काम ईमानदारी से करना होगा।,यह कहना भी गलत होगा कि सारी जिम्मेदारी नागरिकों की है। प्रशासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जहां अतिक्रमण है, वहां निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। जहां पार्किंग की समस्या है, वहां व्यवस्थित पार्किंग की व्यवस्था होनी चाहिए। जहां जाम लगता है, वहां ट्रैफिक प्वाइंट चिन्हित कर पुलिस की व्यवस्था होनी चाहिए। सड़क निर्माण के दौरान नागरिकों के आवागमन की सुविधा का ध्यान रखा जाना चाहिए। जहां अप्रोच रोड अधूरी है, उसे पूरा कराया जाना चाहिए।

नगर परिषद को सफाई व्यवस्था बेहतर करनी चाहिए और कचरा संग्रहण की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। लेकिन प्रशासन की जवाबदेही का मतलब यह नहीं कि नागरिक अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं।  सरकार और नागरिक दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे, तभी व्यवस्था बदलेगी।

सरकार

सिर्फ त्योहारों पर नहीं, रोज चाहिए व्यवस्था

शांति समिति की बैठकें त्योहारों के समय होती हैं। मिलादुन्नबी हो, रक्षाबंधन हो, कावड़ यात्रा हो या कोई अन्य आयोजन—व्यवस्था पर चर्चा होती है।

यह जरूरी भी है।

लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि यातायात और सफाई की समस्या सिर्फ त्योहारों की समस्या नहीं है। जाम रोज लगता है,अतिक्रमण रोज होता है। कचरा रोज फैलता है,गलत पार्किंग रोज होती है।

इसलिए समाधान भी केवल त्योहारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमें रोजमर्रा की नागरिक आदतों में बदलाव लाना होगा। बच्चों को भी सिखाना होगा नागरिक जिम्मेदारी,सिविक सेंस की शुरुआत बचपन से होनी चाहिए।

अगर बच्चा घर में देखता है कि माता-पिता सड़क पर कचरा फेंक रहे हैं तो वह भी यही सीखेगा। वाहन कहीं भी पार्क किया जा रहा है तो उसके मन में नियमों का महत्व कम होगा। अगर घर में ही उसे सिखाया जाए कि सार्वजनिक जगह हमारी अपनी जगह की तरह है, तो वह बड़ा होकर जिम्मेदार नागरिक बनेगा। स्कूलों में भी नागरिक जिम्मेदारी को व्यवहारिक रूप से समझाने की जरूरत है। क्योंकि आने वाला माखन नगर आज के बच्चों का नगर होगा।

नगर हमारा है, इसलिए जिम्मेदारी भी हमारी है

हम चाहते हैं कि बाहर से आने वाला व्यक्ति माखन नगर की तारीफ करे। बाजार साफ-सुथरा दिखे, सड़क पर जाम न हो। त्योहार शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से मनें। लेकिन यह सब तभी संभव है जब हम यह समझें कि नगर सिर्फ प्रशासन का नहीं, हमारा भी है।

नगर परिषद की गाड़ी आएगी, सफाई करेगी और चली जाएगी। लेकिन अगर हम फिर वही कचरा सड़क पर फेंक देंगे तो व्यवस्था फिर बिगड़ जाएगी। पुलिस जाम हटाएगी। लेकिन अगर हम फिर गलत पार्किंग करेंगे तो जाम दोबारा लगेगा। प्रशासन अतिक्रमण हटाएगा। लेकिन अगर हम फिर सड़क पर सामान रखना शुरू कर देंगे तो कुछ दिनों बाद वही स्थिति लौट आएगी। इसलिए स्थायी समाधान कार्रवाई से नहीं, व्यवहार परिवर्तन से आएगा।

शिकायत से पहले खुद से पूछें—मेरी जिम्मेदारी क्या है?

अब समय आ गया है कि हम हर समस्या के सामने केवल यह सवाल न पूछें कि प्रशासन क्या कर रहा है।

एक सवाल खुद से भी पूछें—

मैं क्या कर रहा हूं?

क्या मैं सड़क पर सही जगह वाहन खड़ा करता हूं?

क्या मैं कचरा निर्धारित स्थान पर डालता हूं?

क्या मैं सार्वजनिक रास्ते पर सामान नहीं फैलाता?

क्या मैं यातायात नियमों का पालन करता हूं?

क्या मैं दूसरे नागरिक की सुविधा का सम्मान करता हूं?

अगर इन सवालों का जवाब हां है तो हम बदलाव का हिस्सा हैं। अगर जवाब नहीं है तो शिकायत करने से पहले हमें खुद को बदलने की जरूरत है।

आखिर नगर सुधरेगा कैसे?

नगर को सुधारने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं जरूरी हो सकती हैं। अच्छी सड़कें, बेहतर नालियां, आधुनिक सफाई व्यवस्था, पार्किंग स्थल और बेहतर यातायात प्रबंधन भी जरूरी हैं।लेकिन इन सबके साथ एक चीज सबसे ज्यादा जरूरी है—जिम्मेदार नागरिक। क्योंकि अच्छी सड़क पर भी गलत पार्किंग होगी तो जाम लगेगा। महंगी सफाई व्यवस्था के बावजूद लोग कचरा फैलाएंगे तो गंदगी होगी। अतिक्रमण हटाने के बाद फिर सड़क घेर ली जाएगी तो समस्या वापस आ जाएगी।

इसलिए विकास केवल सीमेंट और डामर से नहीं होता। विकास हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। माखन नगर को बदलना है तो सिर्फ अधिकारियों की बैठक का इंतजार मत कीजिए।

बदलाव अपने घर से शुरू कीजिए। अपनी दुकान से शुरू कीजिए, अपनी गाड़ी की पार्किंग से शुरू कीजिए। अपने हाथ के कचरे से शुरू कीजिए,अपने व्यवहार से शुरू कीजिए।

क्योंकि आखिर में सवाल यही है—

हम हर बार प्रशासन से पूछते रहेंगे कि “नगर कब सुधरेगा?” या एक दिन खुद से पूछेंगे कि “नगर सुधारने के लिए मैंने क्या किया?”

शायद जिस दिन दूसरा सवाल हमारे भीतर पैदा हो जाएगा, उसी दिन माखन नगर के बदलने की शुरुआत भी हो जाएगी।

नगर हमारा है,सड़क हमारी है।बाजार हमारा है,सफाई हमारी जिम्मेदारी है। और सबसे बढ़कर—इस नगर का भविष्य भी हमारा ही है।

इसलिए प्रशासन को जवाबदेह बनाइए, लेकिन अपनी जिम्मेदारी से मत भागिए।

क्योंकि नगर तभी बदलेगा, जब हम बदलेंगे।

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