इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’: छात्राओं ने उठाए शिक्षा, रोजगार और महिला सुरक्षा के सवाल
इंदौर में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में छात्राओं ने शिक्षा, रोजगार, सरकारी स्कूलों, महिला सुरक्षा और कानून के समान पालन को लेकर सवाल उठाए।


इंदौर। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 19 सितंबर को इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शामिल हुए। कार्यक्रम में शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, महिला सुरक्षा और कानून के समान अनुपालन जैसे मुद्दों पर छात्रों ने अपनी चिंताएं सामने रखीं। कार्यक्रम का फोकस युवाओं की समस्याओं और शिक्षा-रोजगार से जुड़े सवालों पर रहा।
कार्यक्रम में छात्राओं ने कहा कि केवल कानून बनाने से व्यवस्था नहीं बदलेगी, बल्कि कानून का समान रूप से पालन भी जरूरी है। उनका कहना था कि जब तक आम नागरिक और प्रभावशाली लोगों के लिए नियमों का पालन एक समान नहीं होगा, तब तक व्यवस्था में भरोसा कायम करना मुश्किल रहेगा।
‘शिक्षा को व्यापार बना दिया गया’
छात्रा जूही सोनी ने शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती फीस को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा रोजगार और शिक्षा की अव्यवस्थाओं से परेशान हैं। उनके मुताबिक शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि सामान्य आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लिए बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना मुश्किल होता जा रहा है।
जूही ने आरोप लगाया कि शिक्षा का व्यावसायीकरण बढ़ रहा है और कोचिंग संस्थानों की फीस लगातार बढ़ रही है। उन्होंने पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं से जुड़ी समस्याओं का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने तक को मजबूर हैं।
इंदौर के कार्यक्रम में छात्रों ने परीक्षा, भर्ती और रोजगार से जुड़े मुद्दे भी उठाए। राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कार्यक्रम में छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती में देरी, नर्सिंग शिक्षा और छात्रावास जैसी समस्याओं को भी सामने रखा।
‘नेता-अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते?’
छात्रा पूर्णिमा मौर्य ने सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि शिक्षा और रोजगार के मुद्दे लगातार उठाए जाते हैं, लेकिन छात्रों को इसका ठोस परिणाम दिखाई नहीं देता।
पूर्णिमा ने सवाल किया कि यदि सरकारी स्कूलों की व्यवस्था अच्छी है तो नेता और अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते। उन्होंने कहा कि जब तक व्यवस्था चलाने वाले लोग खुद सरकारी शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ेंगे, तब तक इसकी वास्तविक स्थिति में बदलाव मुश्किल है।
उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को लंबे समय से शिक्षा और रोजगार के सवालों का सामना करना पड़ रहा है और इसी कारण छात्र अपनी आवाज उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
महिला सुरक्षा पर छात्राओं ने उठाए सवाल
छात्रा रागिनी ने महिला सुरक्षा को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानून मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर महिलाओं के अनुभव अलग हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई महिलाएं असुरक्षा और भय के माहौल में रहती हैं।
रागिनी ने कानून के समान अनुपालन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि आम नागरिक से नियमों का पालन सख्ती से कराया जाता है, लेकिन प्रभावशाली लोगों के मामले में कार्रवाई को लेकर सवाल उठते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आम व्यक्ति के हेलमेट नहीं पहनने पर चालान हो जाता है, लेकिन यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति नियम तोड़े तो क्या उसके साथ भी उसी तरह कार्रवाई होती है—यह सवाल व्यवस्था की समानता से जुड़ा है।
उनका कहना था कि यदि कानून और नियम सभी के लिए हैं, तो उनका पालन भी सभी के लिए समान होना चाहिए।
शिक्षा और रोजगार पर केंद्रित रहा कार्यक्रम
‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम राहुल गांधी की छात्रों के साथ संवाद की श्रृंखला का हिस्सा था। इससे पहले कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इंदौर में कार्यक्रम का मुख्य फोकस शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं की समस्याओं पर रहा।
कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भी छात्रों के सवालों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि छात्रों का सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
छात्रों की मांग—सिर्फ घोषणाएं नहीं, व्यवस्था में बदलाव
इंदौर के मंच से सामने आई छात्राओं की बातों का केंद्र एक ही रहा—शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा से जुड़े सवालों का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव से होना चाहिए।
छात्राओं ने शिक्षा की बढ़ती लागत, सरकारी स्कूलों की स्थिति, भर्ती परीक्षाओं और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सवाल उठाते हुए व्यवस्था में समानता और जवाबदेही की मांग रखी। उनके बयानों में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि कानून और सरकारी व्यवस्थाओं का लाभ तभी प्रभावी होगा, जब उनका पालन और क्रियान्वयन बिना भेदभाव के हो।
‘छात्रों की गूंज’ में उठे ये सवाल अब केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और कानून के समान अनुपालन को लेकर युवाओं के बीच चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बन चुके हैं।

