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राजकाज · 22-01-2026

बजट 2026 पर बड़ा सवाल: आम आदमी को आखिर मिला क्या?

Budget: केंद्रीय बजट किसी भी लोकतंत्र में केवल आय-व्यय का हिसाब नहीं होता, बल्कि वह सरकार की नीतिगत सोच, सामाजिक संवेदनशीलता और  राजनीतिक प्राथमिकताओं का सबसे बड़ा दस्तावेज़ होता है। बजट 2026 को भी सरकार ने विकास, स्थिरता और भविष्य की तैयारी का रोडमैप बताकर पे…

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समाचार डेस्क · 22-01-2026
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बजट 2026 पर बड़ा सवाल: आम आदमी को आखिर मिला क्या?

Budget: केंद्रीय बजट किसी भी लोकतंत्र में केवल आय-व्यय का हिसाब नहीं होता, बल्कि वह सरकार की नीतिगत सोच, सामाजिक संवेदनशीलता और राजनीतिक प्राथमिकताओं का सबसे बड़ा दस्तावेज़ होता है। बजट 2026 को भी सरकार ने विकास, स्थिरता और भविष्य की तैयारी का रोडमैप बताकर पेश किया है। लेकिन जब इस बजट को आम नागरिक की ज़िंदगी के संदर्भ में परखा जाता है, तो यह कई अहम सवाल खड़े करता है।

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सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बजट ज़मीन पर खड़े उस भारत को संबोधित करता है, जो महंगाई, बेरोज़गारी और असमानता से जूझ रहा है?

आंकड़ों का बजट, संवेदनाओं की कमी

बजट 2026 में बड़े-बड़े आंकड़े हैं—लाखों करोड़ का परिव्यय, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश, पूंजीगत व्यय में वृद्धि। लेकिन बजट की भाषा और प्राथमिकताओं में आम आदमी की पीड़ा कहीं हाशिए पर दिखती है।

विकास का दावा तब खोखला लगने लगता है, जब वही विकास लोगों की रोज़मर्रा की परेशानियों को कम न कर पाए। GDP की वृद्धि तब अर्थहीन हो जाती है, जब रसोई का खर्च लगातार बढ़ता जाए।

महंगाई: समस्या बनी रही, समाधान नहीं

महंगाई आज देश के हर घर की सबसे बड़ी चिंता है। खाद्य पदार्थों से लेकर ईंधन, दवाइयों और शिक्षा तक—हर चीज़ महंगी है। इसके बावजूद बजट में महंगाई नियंत्रण के लिए कोई ठोस रणनीति सामने नहीं आती।

सरकार न तो अप्रत्यक्ष करों में बड़ी राहत देती है और न ही आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण का स्पष्ट रोडमैप दिखाती है।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बजट आम उपभोक्ता के दर्द को समझने में विफल रहा?

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मध्यम वर्ग: कर देता रहा, राहत से दूर

मध्यम वर्ग हर बजट का सबसे भरोसेमंद करदाता होता है। न उसे सब्सिडी मिलती है, न योजनाओं का सीधा लाभ। फिर भी उससे हर बार “देशहित” के नाम पर त्याग की उम्मीद की जाती है।

बजट 2026 में टैक्स स्लैब में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। बढ़ती शिक्षा फीस, महंगा स्वास्थ्य खर्च और महंगे होम लोन के बीच मध्यम वर्ग को जिस राहत की उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हुई।

यह वर्ग न तो गरीब की श्रेणी में आता है, न अमीर की—और शायद इसी वजह से बार-बार नजरअंदाज होता है।

युवा और रोजगार: आश्वासन बहुत, अवसर कम

देश का सबसे बड़ा वर्ग युवा है, और उसके सामने सबसे बड़ा संकट रोजगार का है। बजट में स्किल डेवलपमेंट, स्टार्टअप और डिजिटल इकॉनमी की बातें तो हैं, लेकिन स्थायी और सुरक्षित नौकरियों को लेकर स्पष्ट नीति का अभाव है।

सरकारी भर्तियां सीमित हैं, निजी क्षेत्र में अस्थायी नौकरियों का चलन बढ़ रहा है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं के लिए अवसर लगातार सिमटते जा रहे हैं।

बजट यह नहीं बताता कि अगले एक या दो वर्षों में कितने वास्तविक रोजगार पैदा होंगे। जब लक्ष्य मापने योग्य न हों, तो घोषणाएं केवल भाषण बनकर रह जाती हैं।

किसान: नीति में प्राथमिकता नहीं

किसानों को हर बजट में “अन्नदाता” कहकर सम्मान दिया जाता है, लेकिन नीतियों में यह सम्मान कम ही दिखता है।बजट 2026 में भी कृषि क्षेत्र के लिए तकनीक और वैल्यू चेन की बातें तो हैं, लेकिन एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज राहत और आपदा सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दे अनसुलझे रह गए।

खेती आज भी घाटे का सौदा बनी हुई है। जब तक किसान की आय स्थिर और सुरक्षित नहीं होगी, तब तक कृषि सुधार के दावे अधूरे ही रहेंगे।

स्वास्थ्य और शिक्षा: प्राथमिकता या औपचारिकता?

कोविड महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया था। इसके बावजूद बजट में स्वास्थ्य पर खर्च अपेक्षा से कम ही नजर आता है।

शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण बढ़ रहा है, जिससे गरीब और ग्रामीण छात्रों के लिए अवसर सीमित हो रहे हैं।यदि सरकार सच में भविष्य की बात करती है, तो उसे स्वास्थ्य और शिक्षा को खर्च नहीं, निवेश के रूप में देखना होगा।

राजकोषीय अनुशासन की कीमत कौन चुका रहा है?

सरकार राजकोषीय घाटा कम करने को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका बोझ किस पर पड़ रहा है?

जब सामाजिक योजनाओं में कटौती होती है, सब्सिडी सीमित की जाती है और कल्याणकारी कार्यक्रमों का दायरा सिमटता है, तो यह अनुशासन नहीं बल्कि नीतिगत असंतुलन का संकेत देता है।

बजट और जनता के बीच की दूरी

बजट 2026 निवेशकों और बाजार को भरोसा देता है, लेकिन आम नागरिक को राहत नहीं। यह बजट यह तो बताता है कि सरकार अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि उस यात्रा में आम आदमी की भूमिका क्या है।

एक सफल बजट वही होता है जो केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी में बदलाव लाए।यदि बजट में जनता की वास्तविक चिंताओं की झलक न हो, तो वह कितना भी बड़ा क्यों न हो—अधूरा ही माना जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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