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राजकाज · 26-01-2026

1.38 करोड़ का विश्रामगृह: उद्घाटन के बाद अंधेरे में ‘विश्राम’, प्रशासन रोशनी ढूंढता रह गया

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा 16 जनवरी को जिस विश्रामगृह का लोकार्पण किया गया था, वह आज अपने नाम के अनुरूप विश्राम नहीं बल्कि अंधकार साधना करता नजर आ रहा है। 1 करोड़ 38 लाख रुपए की लागत से बना यह भवन उद्घाटन के दिन दुल्हन की तरह सजा था—झालरें, रोशनी, साज-स…

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झीलें और नदियां
समाचार डेस्क · 26-01-2026
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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा 16 जनवरी को जिस विश्रामगृह का लोकार्पण किया गया था, वह आज अपने नाम के अनुरूप विश्राम नहीं बल्कि अंधकार साधना करता नजर आ रहा है। 1 करोड़ 38 लाख रुपए की लागत से बना यह भवन उद्घाटन के दिन दुल्हन की तरह सजा था—झालरें, रोशनी, साज-सज्जा और प्रशासनिक मुस्कान सब कुछ मौजूद था।

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लेकिन जैसे ही उद्घाटन संपन्न हुआ, रोशनी भी विदा हो गई और जिम्मेदारी भी।

लोकार्पण के बाद बालाजी कॉन्ट्रैक्शन ने भवन को लोक निर्माण विभाग (PWD) को हैंडओवर किया और उसी के साथ अस्थाई बिजली कनेक्शन कटवाने का आवेदन भी दे दिया। यानी फीता कटा, बिजली कटी और भवन अंधेरे में चला गया।

जहां गणतंत्र दिवस चमका, वहां विश्रामगृह बुझा रहा

राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर नगर के लगभग सभी शासकीय भवन तिरंगे की रोशनी में नहाए हुए थे। कहीं झालरें चमक रहीं थीं, कहीं फोकस लाइट्स से देशभक्ति झलक रही थी।

लेकिन 1.38 करोड़ की लागत से बना नया विश्रामगृह वीरानों की तरह खड़ा रहा—न रोशनी, न गतिविधि, न जिम्मेदारी। यह दृश्य अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य था।

जब बिजली ही नहीं, तो झालर किस भरोसे?

पीडब्ल्यूडी सब इंजीनियर आर.बी. चौहान का बयान इस पूरे मामले का सबसे उजला… माफ कीजिए, सबसे अंधेरा पक्ष उजागर करता है। उन्होंने कहा—“कल झालर लगवा देंगे।”

अब सवाल यह है कि जब विश्रामगृह में बिजली कनेक्शन ही नहीं है, तो झालर आखिर चलेगी कैसे?

क्या अब सरकारी सजावट भावनाओं से जलाई जाएगी या फिर फाइलों की गर्मी से रोशनी फैलेगी?

कॉन्ट्रैक्टर का तर्क: हैंडओवर मतलब हाथ झाड़ना

बालाजी कॉन्ट्रैक्शन के प्रतिनिधि कृष्ण गोपाल अग्रवाल का कहना है कि—

“विश्रामगृह पीडब्ल्यूडी को हैंडओवर कर दिया गया है, इसलिए बिजली कनेक्शन कटवाने का आवेदन दिया।”

यानी उद्घाटन तक जिम्मेदारी, उसके बाद मजबूरी।

प्रश्न यह उठता है कि क्या 1.38 करोड़ की योजना केवल उद्घाटन समारोह तक ही सीमित थी?

क्या विश्रामगृह का भविष्य सिर्फ फोटो फ्रेम और प्रेस रिलीज़ तक था?

बिजली विभाग बोला: आवेदन आया, हमने निभाया

मध्यप्रदेश विद्युत मंडल (MPEB) के सब इंजीनियर का कहना है—

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“बालाजी कॉन्ट्रैक्शन की ओर से कनेक्शन काटने का आवेदन आया था, उसी आधार पर कनेक्शन काटा गया।”

मतलब यह कि बिजली विभाग ने नियम निभाया, कॉन्ट्रैक्टर ने जिम्मेदारी छोड़ी और पीडब्ल्यूडी… अब तक नए कनेक्शन के लिए आवेदन करना भूल गया।

तो फिर बिजली आएगी कहां से?

यही सबसे बड़ा सवाल है।

जब पीडब्ल्यूडी ने नए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन ही नहीं किया, तो विश्रामगृह में बिजली चालू कैसे होगी?

क्या मुख्यमंत्री के उद्घाटन की रौशनी को स्थायी मान लिया गया है?

या फिर यह मान लिया गया है कि कागजों में बिजली चालू होना ही काफी है?

दुल्हन से वीरान तक का सफर

16 जनवरी को जो भवन दुल्हन की तरह सजा था, वही कुछ दिनों में वीरान खड़ा है।

न कोई उपयोग, न कोई गतिविधि, न कोई जवाबदेही।

कॉन्ट्रैक्टर कहता है—हम मुक्त।

पीडब्ल्यूडी कहता है—देख लेंगे।

बिजली विभाग कहता है—आवेदन लाओ।

और 1.38 करोड़ रुपए का विश्रामगृह कहता है—मैं अंधेरे में ठीक हूं।

व्यंग्य नहीं, सिस्टम की सच्चाई

यह सिर्फ एक व्यंग्यात्मक खबर नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है जहां योजनाएं बनती हैं, उद्घाटन होते हैं, लेकिन उपयोग और रखरखाव फाइलों में दम तोड़ देते हैं।

अगर यही हाल रहा, तो यह विश्रामगृह जल्द ही विश्राम नहीं बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का स्मारक बन जाएगा।

प्रशासन से सीधे सवाल

पीडब्ल्यूडी ने अब तक स्थायी बिजली कनेक्शन का आवेदन क्यों नहीं किया?

उद्घाटन से पहले यह मूलभूत व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

क्या किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होगी?

क्योंकि अब जनता सिर्फ रौशनी नहीं, जवाब भी चाहती है।

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