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खेल-मनोरंजन · 30-01-2026

सियासत नहीं, सिद्धांत की लड़ाई : गांधी और चतुर्वेदी की कलम से सीखो!

आज की तारीख सिर्फ एक कैलेंडर पर दो नामों को याद करने का दिन नहीं है। यह एक क्रूर मज़ाक है। यह उस युग का अवसान और इस युग के ढोंग का प्रदर्शन है। एक तरफ महात्मा गांधी, जिनके लिए 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' विचारों के ऐसे मैदान-ए-जंग थे, जहाँ सत्य का एक शब्द साम्राज…

देनवा पोस्ट
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समाचार डेस्क · 30-01-2026
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आज की तारीख सिर्फ एक कैलेंडर पर दो नामों को याद करने का दिन नहीं है। यह एक क्रूर मज़ाक है। यह उस युग का अवसान और इस युग के ढोंग का प्रदर्शन है। एक तरफ महात्मा गांधी, जिनके लिए 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' विचारों के ऐसे मैदान-ए-जंग थे, जहाँ सत्य का एक शब्द साम्राज्य के गलाने वाले ज़हर का काम करता था। दूसरी तरफ माखन लाल चतुर्वेदी, जिनकी 'कर्मवीर' में छपी हर पंक्ति राजद्रोह के आरोप का खतरा ओढ़कर आती थी, फिर भी नहीं झुकी।

और आज देखिए! हमारे प्राइम टाइम के 'योद्धा', स्टूडियो की रोशनी में चमकते हुए, टीआरपी के नाम पर ज़हर उगलते हुए। गांधी की 'आक्रामकता' सत्य में थी। चतुर्वेदी की 'आक्रामकता' देशभक्ति के ज्वार में थी। आज की 'आक्रामकता' क्या है? सनसनी में। आधे सच में। किसी की जाति, धर्म, पोशाक पर कीचड़ उछालने में। यह  पत्रकारिता नहीं, पतन है।

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गांधी साफ़ कहते थे — अखबार का उद्देश्य जनता की भावनाएँ भड़काना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षित और संयमित करना है। आज क्या हो रहा है? हर खबर एक 'वार' है, हर बहस एक 'क्रिकेट मैच' है, और हर एंकर एक 'स्कोर' बताने वाला कमेंटेटर। चतुर्वेदी जेल जाने से नहीं डरे। क्या आज का कोई 'स्टार' रेटिंग गिरने, या 'दबाव' आने के डर से सच लिखने-बोलने से डरता है? जवाब आपके पास है।

गांधी कहते थे - "अपनी गलती स्वीकारने में कोई बुराई नहीं।" क्या आज का कोई चैनल, कोई अखबार यह हिम्मत दिखा सकता है?

चतुर्वेदी पूछते - "क्या लिखूं? अभिव्यक्ति की कठिनाई यही।" क्या आज की 'एंकर-शक्ति' को इस कठिनाई का अहसास भी है?

हमें एक सवाल पूछना होगा: क्या आज का मीडिया उस महासागर की बात कर रहा है, जिसमें देश तैर रहा है, या फिर खुद एक छोटे-से स्विमिंग पूल में उछल-कूद करके दिखावा कर रहा है? गांधी और चतुर्वेदी ने पूरे सागर की चुनौती स्वीकार की थी। उनकी कलम समाज के घावों पर नमक छिड़कने के लिए नहीं, मरहम लगाने के लिए थी।

यदि पत्रकारिता सत्ता के गलियारों में घूमने वाली 'लॉबी' बनकर रह गई है, तो यह उन सभी शहीदों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने कलम को तलवार माना था। आज उस तलवार पर जंग लग चुकी है। उसे फिर से तेज़ करने की ज़रूरत है। नहीं तो, इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा। गांधी और चतुर्वेदी की पुण्यतिथि सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं, आईना दिखाने का दिन है। क्या हम इस आईने में अपना चेहरा देखने की हिम्मत रखते हैं?

यह लड़ाई टीआरपी की नहीं, विवेक की है। यह लड़ाई सत्ता की कृपा की नहीं, जनता के विश्वास की है।

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