झुकने से कोई छोटा नहीं होता, फिर संवाद से परहेज़ क्यों?

“झुकने से कोई छोटा नहीं होता।” यह वाक्य हम बचपन से सुनते आए हैं। माता-पिता ने सिखाया, शिक्षक ने पढ़ाया और समाज ने समझाया कि यदि किसी की बात में दम हो तो उसे सुन लेना, अपनी गलती स्वीकार कर लेना और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना ही परिपक्वता की निशानी है। लेकिन वर्तमान समय की राजनीति और शासन व्यवस्था को देखकर लगता है कि यह सीख अब केवल नैतिक शिक्षा की किताबों तक सीमित होकर रह गई है। वास्तविक जीवन में अब झुकना नहीं, बल्कि अपनी बात पर अड़े रहना ताकत का प्रतीक बना दिया गया है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां सत्ता जनता से बनती है और जनता के प्रति जवाबदेह भी होती है। लेकिन जब जनता की आवाज़ सत्ता तक पहुंचाने के लिए धरना, प्रदर्शन और अनशन जैसे रास्ते अपनाने पड़ें, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर संवाद की परंपरा कमजोर क्यों पड़ती जा रही है? क्या अब केवल वही आवाज़ सुनी जाती है जो सड़कों पर उतरती है या राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाती है?

इसी संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का हालिया धरना एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया। बच्चों और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर उन्हें दिल्ली में धरने पर बैठना पड़ा। यह घटना केवल एक व्यक्ति के विरोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह बताती है कि यदि समय रहते संवाद स्थापित न हो, तो लोकतांत्रिक असहमति धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले लेती है। यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती।

निश्चित रूप से किसी भी सरकार के लिए हर मांग को स्वीकार करना संभव नहीं होता। शासन केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कानून, वित्तीय संसाधनों, प्रशासनिक व्यवस्था और व्यापक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर चलता है। लेकिन किसी मांग को स्वीकार करना और किसी की बात सुनना—दोनों अलग-अलग बातें हैं। सरकार किसी मांग से असहमत हो सकती है, लेकिन संवाद से दूरी बनाना लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

आज राजनीति में एक नई मानसिकता विकसित होती दिखाई देती है। यदि सरकार किसी आंदोलनकारी से बातचीत कर ले, तो इसे उसकी कमजोरी बताया जाता है। यदि कोई मंत्री अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे, तो उसे यू-टर्न कहकर राजनीतिक निशाना बनाया जाता है। दूसरी ओर यदि आंदोलनकारी एक कदम पीछे हट जाए, तो उसे अपने समर्थकों के बीच जवाब देना पड़ता है। इस माहौल में संवाद की जगह जिद और राजनीतिक प्रतिष्ठा ने ले ली है। सबसे अधिक नुकसान लोकतांत्रिक संस्कृति का होता है।

सोनम वांगचुक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके विचारों से असहमति हो सकती है, उनकी मांगों पर बहस हो सकती है, लेकिन उन्हें सुनने में किसी लोकतांत्रिक सरकार की गरिमा कम नहीं होती। बल्कि इससे यह संदेश जाता है कि सरकार हर नागरिक की बात सुनने के लिए तैयार है। लोकतंत्र में संवाद करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और परिपक्वता का परिचायक होता है।

इतिहास पर नजर डालें तो दुनिया के अनेक बड़े विवाद संवाद की मेज पर ही समाप्त हुए हैं। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में भी कई ऐसे अवसर आए, जब सरकारों ने आंदोलनकारियों से बातचीत कर समाधान निकाला। कई बार समझौते हुए, कई बार मांगें आंशिक रूप से मानी गईं और कई बार सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है कि यहां बंदूक नहीं, बल्कि बातचीत अंतिम रास्ता होती है।

दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में किसानों का आंदोलन, युवाओं के रोजगार संबंधी प्रदर्शन, आरक्षण से जुड़े आंदोलन, विभिन्न राज्यों के स्थानीय जनआंदोलन और कई सामाजिक विरोध इस बात का संकेत देते हैं कि संवाद अक्सर तब शुरू होता है, जब आंदोलन बड़ा रूप ले चुका होता है। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही गंभीरता से बातचीत हो जाए, तो न आंदोलन लंबा चले, न जनजीवन प्रभावित हो और न ही सरकार तथा जनता के बीच अविश्वास बढ़े।

लोकतंत्र विरोध का अधिकार देता है, लेकिन हिंसा का नहीं। शांतिपूर्ण धरना, ज्ञापन और संवाद लोकतांत्रिक अधिकार हैं, जबकि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या अराजकता फैलाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं।

दरअसल यह समस्या केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। समाज में भी संवाद की संस्कृति कमजोर होती जा रही है। परिवारों में रिश्ते टूट रहे हैं क्योंकि कोई पहले माफी नहीं मांगना चाहता। संस्थानों में विवाद इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि कोई अपनी बात से थोड़ा पीछे हटने को तैयार नहीं होता। सोशल मीडिया ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ाया है, जहां बहस का उद्देश्य समाधान नहीं बल्कि दूसरे को हराना बन गया है। राजनीति भी इसी सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब बनती जा रही है।

झुकना हमेशा हार का प्रतीक नहीं होता। पेड़ की वह शाखा जो हवा के साथ थोड़ा झुक जाती है, वह तूफान के बाद भी बची रहती है। जो पूरी तरह अकड़ जाती है, उसके टूटने की आशंका अधिक होती है। यही सिद्धांत लोकतंत्र पर भी लागू होता है। सरकार का संवाद करना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी मजबूती का प्रमाण है। इसी प्रकार आंदोलनकारियों का सकारात्मक समाधान स्वीकार करना भी पराजय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें विरोध को दुश्मनी की नजर से न देखें और आंदोलनकारी सरकार को शत्रु न मानें। लोकतंत्र में दोनों की भूमिका एक-दूसरे को हराने की नहीं, बल्कि बेहतर समाधान खोजने की है। सत्ता का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि समाज की बात सुनना भी है। वहीं विरोध का अर्थ केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना भी है।

सोनम वांगचुक का धरना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे लोकतंत्र में संवाद की जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है? क्या अब किसी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए धरना और अनशन ही सबसे प्रभावी माध्यम बनते जा रहे हैं? यदि ऐसा है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

अंततः यह समझना होगा कि झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक है। किसी मंत्री का किसी आंदोलनकारी से मिल लेना, किसी सरकार का किसी मांग पर पुनर्विचार कर लेना या किसी नागरिक का अपनी बात तर्क और संयम के साथ रखना—इनमें से कोई भी लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता। बल्कि यही वे मूल्य हैं जो लोकतंत्र को जीवंत और विश्वसनीय बनाते हैं।

लोकतंत्र की असली ताकत बहुमत में नहीं, बल्कि विश्वास में होती है। और विश्वास केवल कानूनों से नहीं, संवाद से बनता है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र पर गर्व करें, तो हमें अहंकार की राजनीति से ऊपर उठकर संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे बड़ी जीत किसी व्यक्ति, दल या सरकार की नहीं होती, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और समाधान की होती है।

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