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नोबेल पुरस्कार 2026 · 5 मिनट पहले

मेडिसिन का नोबेल: प्रकाश से दिमाग की नसों को नियंत्रित करने वाली खोज के लिए तीन वैज्ञानिक सम्मानित

मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार 2026 कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज के लिए संयुक्त रूप से दिया गया।

अशोक शर्मा
अशोक शर्मा
Sub Editor · 5 मिनट पहले
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मेडिसिन का नोबेल: प्रकाश से दिमाग की नसों को नियंत्रित करने वाली खोज के लिए तीन वैज्ञानिक सम्मानित

स्टॉकहोम। नोबेल पुरस्कार 2026 की घोषणा शुरू हो गई है। फिजियोलॉजी या मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार से इस साल अमेरिकी वैज्ञानिक कार्ल डाइसेरोथ (Karl Deisseroth) और जर्मनी के वैज्ञानिक पीटर हेगेमैन (Peter Hegemann) तथा जॉर्ज नागेल (Georg Nagel) को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया है। तीनों वैज्ञानिकों को प्रकाश-संवेदनशील आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी उनकी महत्वपूर्ण खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया है।

इन वैज्ञानिकों के काम ने न्यूरोसाइंस की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है। उनकी विकसित की गई तकनीक की मदद से वैज्ञानिक यह समझने में सक्षम हुए कि मस्तिष्क की विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाएं किस तरह यादों, भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित करती हैं। ऑप्टोजेनेटिक्स ने जीवित मस्तिष्क में विशेष न्यूरॉन्स की गतिविधि को प्रकाश की मदद से नियंत्रित करने का रास्ता खोला है।

क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स?

ऑप्टोजेनेटिक्स ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें प्रकाश की मदद से विशेष तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित किया जाता है। इस तकनीक की नींव उस खोज से जुड़ी है, जिसमें पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने एक कोशिका वाले शैवाल क्लैमाइडोमोनास में प्रकाश के प्रति संवेदनशील प्रोटीन की भूमिका को समझा।

उन्होंने चैनलरोडॉप्सिन नाम के प्रोटीन की विशेषताओं का अध्ययन किया। जब इस प्रोटीन पर नीली रोशनी पड़ती है तो यह एक चैनल खोल देता है। इसके जरिए आवेशित आयन कोशिका के अंदर-बाहर जा सकते हैं और विद्युत संकेत पैदा होता है। यही गुण बाद में तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश के जरिए नियंत्रित करने की तकनीक का आधार बना।

कार्ल डाइसेरोथ ने खोज को दिमाग तक पहुंचाया

पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल की खोज को कार्ल डाइसेरोथ ने न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में आगे बढ़ाया। उन्होंने चैनलरोडॉप्सिन से संबंधित जीन को चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुंचाया।

इसके बाद इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डालने पर उनमें तंत्रिका संकेत पैदा किए जा सके। डाइसेरोथ ने 2005 में इस महत्वपूर्ण सफलता को प्रकाशित किया। इसके दो साल बाद उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि प्रकाश से नियंत्रित यह स्विच जीवित चूहों के दिमाग में भी काम कर सकता है।

यहीं से वैज्ञानिकों के सामने मस्तिष्क की गतिविधियों को पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीक तरीके से समझने का रास्ता खुला।

दिमाग की रिसर्च में क्यों आया बड़ा बदलाव?

मस्तिष्क में अरबों तंत्रिका कोशिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं और लगातार संकेतों का आदान-प्रदान करती हैं। ऐसे में यह पता लगाना बेहद मुश्किल था कि किसी विशेष याद, भावना या व्यवहार के पीछे कौन-सी कोशिकाएं जिम्मेदार हैं।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने इस चुनौती को काफी हद तक बदल दिया। अब शोधकर्ता विशेष प्रकार की तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश की मदद से सक्रिय या निष्क्रिय करके उनके प्रभाव का अध्ययन कर सकते हैं।

इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि मस्तिष्क के अलग-अलग न्यूरल सर्किट यादों, भावनाओं और व्यवहार को किस तरह प्रभावित करते हैं। नोबेल समिति के अनुसार, इस तकनीक ने न्यूरोसाइंस में एक नए दौर की नींव रखी है।

इंसानों के लिए क्या है इस खोज का महत्व?

ऑप्टोजेनेटिक्स का इस्तेमाल फिलहाल मुख्य रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान में किया जा रहा है, लेकिन इसके संभावित चिकित्सकीय उपयोग भी काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

शोधकर्ता इस तकनीक की मदद से न्यूरोलॉजिकल और मानसिक विकारों से जुड़े तंत्रिका सर्किट को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा दृष्टिबाधित लोगों में दृष्टि बहाल करने की संभावनाओं पर भी शोध चल रहा है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन संभावित उपचारों में से कई अभी शोध और विकास के चरण में हैं। इसलिए ऑप्टोजेनेटिक्स को वर्तमान में व्यापक रूप से उपलब्ध उपचार मानना सही नहीं होगा।

तीनों वैज्ञानिकों की खोज आसान भाषा में समझें

पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल:

दोनों वैज्ञानिकों ने एक कोशिका वाले शैवाल में प्रकाश के प्रति संवेदनशील प्रोटीन चैनलरोडॉप्सिन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझा।

चैनलरोडॉप्सिन क्या करता है?

नीली रोशनी पड़ने पर यह प्रोटीन एक आयन चैनल खोलता है। इससे आवेशित कणों की आवाजाही होती है और विद्युत संकेत उत्पन्न हो सकता है।

कार्ल डाइसेरोथ का योगदान:

उन्होंने इस प्रकाश-संवेदनशील तंत्र को तंत्रिका कोशिकाओं में इस्तेमाल किया और दिखाया कि प्रकाश के जरिए न्यूरॉन्स की गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है।

2005 में बड़ी सफलता:

डाइसेरोथ ने तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश के जरिए संकेत पैदा करने की क्षमता प्रदर्शित की।

2007 में अगला कदम:

उन्होंने जीवित चूहे के दिमाग में भी इस प्रकाश-नियंत्रित तकनीक को काम करते हुए दिखाया।

यहीं से ऑप्टोजेनेटिक्स की ताकत सामने आई:

प्रकाश और आनुवंशिक तकनीक को मिलाकर वैज्ञानिक विशेष तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित कर सकते हैं और उनके व्यवहार पर प्रभाव का अध्ययन कर सकते हैं।

मस्तिष्क के रहस्यों को समझने की नई राह

मस्तिष्क लंबे समय से विज्ञान की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक रहा है। कौन-सी तंत्रिका कोशिका किसी याद को जन्म देती है, डर या खुशी जैसी भावनाएं कैसे पैदा होती हैं और मस्तिष्क किसी व्यवहार को किस तरह नियंत्रित करता है—इन सवालों के जवाब तलाशने में ऑप्टोजेनेटिक्स ने वैज्ञानिकों को एक बेहद सटीक उपकरण दिया है।

इसी वजह से कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल के काम को 2026 के फिजियोलॉजी या मेडिसिन नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनकी खोज ने न केवल न्यूरोसाइंस को नई दिशा दी, बल्कि भविष्य में मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों के उपचार की संभावनाओं के लिए भी नए रास्ते खोले हैं।

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