माखननगर का पुस्तक मेला बना मज़ाक! किताबें गायब, छूट नदारद, प्रशासन की ‘औपचारिकता’ उजागर

माखननगर। शासन के निर्देश पर विद्यार्थियों और अभिभावकों को राहत देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया पुस्तक मेला माखननगर में पूरी तरह से फेल साबित हुआ। कागजों में योजनाएं बड़ी-बड़ी और जमीनी हकीकत पूरी तरह खोखली—यही तस्वीर इस मेले में देखने को मिली। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आयोजन सिर्फ औपचारिकता निभाने और आंकड़ों में सफलता दिखाने के लिए किया गया, जबकि असल में पालकों को राहत देने का उद्देश्य कहीं नजर नहीं आया।

जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि कलेक्टर के आदेशानुसार सभी विकासखंडों में पुस्तक मेले लगाए जाएं, ताकि नवीन शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विद्यार्थियों को किताबें, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म, जूते और बैग उचित दरों पर उपलब्ध कराए जा सकें। लेकिन माखननगर में इन निर्देशों की खुलेआम अनदेखी होती नजर आई।

सोमवार 6 अप्रैल को बीईओ सुषमा पीपरे की उपस्थिति में मेले का शुभारंभ तो किया गया, लेकिन आयोजन की पोल उसी समय खुल गई जब यहां महज पांच स्टेशनरी दुकानों ने ही हिस्सा लिया। हैरानी की बात यह रही कि इन दुकानों पर किताबों की भारी कमी थी, जबकि अन्य सामान जैसे कॉपी, पेन, बैग आदि उपलब्ध थे। सबसे गंभीर बात यह रही कि जिन किताबों के लिए यह मेला लगाया गया था, उन्हीं पर कोई छूट नहीं दी जा रही थी।

दुकानदारों ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें पुस्तक डीलरों से ही किसी प्रकार की छूट नहीं मिलती, तो वे ग्राहकों को कैसे डिस्काउंट दें। इसका मतलब साफ है कि प्रशासन ने बिना किसी समन्वय और तैयारी के मेले का आयोजन कर दिया, जिससे पूरी योजना का मकसद ही खत्म हो गया।

स्थिति और भी शर्मनाक तब हो गई जब यह सामने आया कि मेले में स्कूल यूनिफॉर्म और जूतों की एक भी दुकान नहीं लगी। जबकि शासन के निर्देशों में इन सभी वस्तुओं को शामिल करने की बात कही गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जरूरी सामग्री ही उपलब्ध नहीं कराई जा सकी, तो फिर इस मेले का आयोजन किस उद्देश्य से किया गया?

प्रशासन की लापरवाही यहीं खत्म नहीं होती। मेले का कोई व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया गया, जिससे अधिकांश अभिभावकों को इसकी जानकारी ही नहीं मिल सकी। नतीजा यह रहा कि मेले में गिने-चुने पालक ही पहुंचे। जो पहुंचे, उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी।

इतना ही नहीं, मेले के समय को लेकर भी भारी लापरवाही देखने को मिली। जहां मेला सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चलना था, वहीं दुकानदारों ने शाम 4 बजे ही दुकानें समेट लीं। इससे साफ जाहिर होता है कि न तो प्रशासन ने कोई निगरानी रखी और न ही दुकानदारों पर कोई जवाबदेही तय की गई।

अभिभावक सुमित डेरिया ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि उन्होंने नर्मदापुरम से अपने बच्चे की किताबें खरीदीं, जहां एनसीईआरटी की किताबों पर 5 प्रतिशत और प्राइवेट प्रकाशनों की किताबों पर 10 प्रतिशत तक छूट मिली। माखननगर में भी वे इसी उम्मीद से आए थे, लेकिन यहां न तो किताबें सही तरीके से उपलब्ध थीं और न ही कोई छूट दी जा रही थी। ऊपर से जब वे पहुंचे तो दुकानें पहले ही बंद हो चुकी थीं।

इस पूरे मामले में जब जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने भी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया। बीईओ सुषमा पीपरे ने इसे “पहली बार का प्रयास” बताते हुए कहा कि ऊपर से निर्देश थे और कॉपियों पर कुछ डिस्काउंट मिल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ “पहली बार” का बहाना बनाकर इतनी बड़ी लापरवाही को नजरअंदाज किया जा सकता है?

वहीं डीईओ एल.एन. प्रजापति ने तो सीधा पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यदि किताबें नहीं हैं या डिस्काउंट नहीं मिल रहा है, तो एसडीएम से संपर्क करें। यह बयान प्रशासन की जिम्मेदारी से भागने की मानसिकता को उजागर करता है।

एसडीएम जय सोलंकी ने जरूर यह कहा कि यदि मेले में छूट नहीं मिल रही है तो वे इसकी जांच करवाएंगे और पालकों को राहत दिलाने का प्रयास करेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मेला मात्र दो दिन का और एक दिन लगभग खत्म हो चुका है, तब इस तरह की कार्रवाई का क्या औचित्य रह जाता है?

यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सिर्फ ऊपर से आए आदेशों को पूरा करने के लिए ऐसे आयोजन किए जा रहे हैं? क्या जमीनी स्तर पर उनकी गुणवत्ता और उद्देश्य की कोई समीक्षा नहीं होती?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन अभिभावकों को आर्थिक राहत देने के लिए यह मेला आयोजित किया गया था, क्या उन्हें वास्तव में कोई फायदा मिला? जवाब साफ है—नहीं। उल्टा उन्हें समय और उम्मीद दोनों का नुकसान हुआ।

माखननगर का यह पुस्तक मेला इस बात का उदाहरण बन गया है कि कैसे सरकारी योजनाएं कागजों में तो प्रभावी दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पूरी तरह फेल हो जाती हैं। यदि प्रशासन वास्तव में छात्रों और पालकों के हित में काम करना चाहता है, तो उसे ऐसे आयोजनों की सिर्फ औपचारिकता निभाने के बजाय उनकी गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर ध्यान देना होगा।

अब देखना यह है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। फिलहाल तो माखननगर के पालकों के मन में यही सवाल गूंज रहा है—क्या यह मेला उनके लिए था या सिर्फ प्रशासन की फाइलों के लिए?

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