301वीं जयंती पर याद की गईं लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर, इंदौर में बन रहा भव्य अहिल्या स्मारक

इंदौर। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती पर पूरे मालवा-निमाड़ क्षेत्र सहित देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। होल्कर रियासत की महान शासिका के रूप में प्रसिद्ध अहिल्याबाई का शासनकाल समाप्त हुए करीब 230 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जनकल्याण, न्यायप्रियता और धार्मिक-सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
इसी विरासत को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से इंदौर के ऐतिहासिक रामपुर कोठी परिसर में भव्य अहिल्या स्मारक का निर्माण किया जा रहा है। लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह स्मारक देवी अहिल्याबाई के जीवन, उनके शासनकाल और सामाजिक योगदान को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत करेगा।

साधारण परिवार से लोकमाता बनने तक का सफर

31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी गांव में जन्मी अहिल्याबाई का विवाह वर्ष 1735 में होल्कर राज्य के संस्थापक मल्हारराव होल्कर के पुत्र खंडेराव होल्कर से हुआ था। वर्ष 1745 में उन्हें पुत्र मालेराव की प्राप्ति हुई।
कुम्हेर युद्ध में पति खंडेराव होल्कर के निधन के बाद उनके जीवन में संघर्षों का दौर शुरू हुआ। बाद में मल्हारराव होल्कर के निधन और पुत्र मालेराव की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात वर्ष 1767 में अहिल्याबाई ने होल्कर रियासत की बागडोर संभाली। उन्होंने लगभग 28 वर्ष 5 माह 17 दिन तक कुशल प्रशासन चलाते हुए न्याय, धर्म और लोककल्याण की मिसाल कायम की। 13 अगस्त 1795 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवंत है।

ऐतिहासिक रामपुर कोठी बनेगी स्मृतियों का केंद्र

अहिल्या स्मारक का निर्माण इंदौर की ऐतिहासिक रामपुर कोठी में किया जा रहा है। इस भवन का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। महाराजा हरिराव होल्कर ने रामपुर नवाब के लिए इस कोठी का निर्माण कराया था। लालबाग महल बनने से पहले रियासत की महत्वपूर्ण बैठकें यहीं आयोजित होती थीं।

इतिहासकारों के अनुसार कोठी के समीप एक बावड़ी का भी निर्माण कराया गया था, जिसका उल्लेख 19 मार्च 1852 के रोजनामचे में मिलता है। बाद के वर्षों में यहां राज्य के प्रधानमंत्री टी. माधवराव का कार्यालय संचालित हुआ। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक यह भवन आरटीओ कार्यालय के रूप में उपयोग में रहा। वर्ष 2016 में आरटीओ कार्यालय स्थानांतरित होने के बाद वर्ष 2024 में यह परिसर अहिल्या स्मारक ट्रस्ट को सौंप दिया गया।

आधुनिक तकनीक से जीवंत होगा इतिहास

करीब साढ़े तीन एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहे इस स्मारक को तीन चरणों में तैयार किया जाएगा। वर्तमान में पहले चरण के अंतर्गत भवन के नवीनीकरण का कार्य जारी है, जिसमें लगभग 25 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
स्मारक में थ्री-डी पेंटिंग्स, लाइट एंड साउंड शो, ऑडियो प्रेजेंटेशन और डिजिटल डिस्प्ले के माध्यम से देवी अहिल्याबाई के जीवन और उनके ऐतिहासिक कार्यों को प्रदर्शित किया जाएगा। इसके साथ ही एक विशेष पर्यटन क्षेत्र भी विकसित किया जाएगा, जहां राजबाड़ा, गोपाल मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, लालबाग महल सहित होल्करकालीन धरोहरों की झलक देखने को मिलेगी।

परंपरागत तकनीक से हो रहा संरक्षण
पुरातत्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रवीण श्रीवास्तव के अनुसार स्मारक के संरक्षण और मरम्मत कार्य में पारंपरिक निर्माण सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। चूना, मैथी दाना, बेलपत्र, उड़द की दाल, सूखी ईंट का चूर्ण और सरस जैसे पारंपरिक मिश्रणों से भवन को उसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप में संरक्षित किया जा रहा है।

सुरक्षित रहेंगे पुराने वृक्ष

स्मारक निर्माण के दौरान पर्यावरण संरक्षण का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है। परिसर में मौजूद पुराने वृक्षों को काटने के बजाय संरक्षित किया जा रहा है। यहां “अहिल्या वन” और “अहिल्या घाट” भी विकसित किए जाएंगे। स्मारक का मुख्य प्रवेश द्वार होल्करकालीन किले के प्रवेश द्वार की तर्ज पर बनाया जाएगा।

अहिल्या ट्रस्ट के सचिव अशोक डागा के अनुसार परियोजना के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें पहले चरण हेतु 40 करोड़ रुपये स्वीकृत किए जा चुके हैं। लक्ष्य है कि सिंहस्थ 2027 से पहले यह स्मारक पूरी तरह तैयार हो जाए।

इंदौर से जुड़ी हैं अहिल्याबाई की विशेष स्मृतियां

इतिहास के अनुसार देवी अहिल्याबाई 26 मई 1784 को महेश्वर से इंदौर आई थीं और 21 जून 1784 तक यहां रहीं। उनका यह प्रवास कुल 27 दिनों का था।

इंदौर में उनके सम्मान में कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए। 5 सितंबर 1959 को अहिल्या उत्सव के अवसर पर राजबाड़ा चौक का नाम बदलकर “अहिल्या चौक” रखा गया। वहीं 29 अप्रैल 1969 को राजबाड़ा के सामने उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था।

लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर केवल एक सफल शासिका ही नहीं थीं, बल्कि न्याय, धर्म, सेवा और सुशासन की ऐसी प्रतीक थीं, जिनकी प्रेरणा आज भी समाज और प्रशासन दोनों के लिए प्रासंगिक बनी हुई है। उनकी 301वीं जयंती पर बन रहा यह भव्य स्मारक उनकी गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।

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