नई दिल्ली। मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदियों से इंसानों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करता रहा है। अब अमेरिका की एक रिसर्च ने इस बहस को नया आयाम दे दिया है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखा जा सकता है। सुअर के दिमाग पर किए गए एक प्रयोग में शोधकर्ताओं ने मृत्यु के बाद दिमाग की कोशिकाओं और न्यूरॉन्स को संरक्षित रखने में सफलता हासिल की है।
इस शोध ने मेडिकल साइंस, न्यूरोसाइंस और मानव चेतना को लेकर नई संभावनाओं के साथ कई नैतिक सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सुअर के दिमाग पर किया गया सफल प्रयोग
अमेरिका के पोर्टलैंड स्थित स्टार्टअप “नेक्टोम” ने इस प्रयोग को अंजाम दिया। शोधकर्ताओं ने सुअर को इसलिए चुना क्योंकि उसका दिमाग और हृदय-रक्त संचार प्रणाली काफी हद तक इंसानों से मिलती-जुलती है।
प्रयोग के दौरान हृदय की धड़कन बंद होने के लगभग 10 मिनट बाद शरीर से सारा रक्त निकाल दिया गया। इसके बाद दिमाग में एल्डिहाइड नामक विशेष रसायन पहुंचाया गया, जिसने दिमाग के भीतर मौजूद प्रोटीन और कोशिकाओं को उनकी मूल स्थिति में स्थिर कर दिया।
इसके बाद दिमाग के ऊतकों में मौजूद पानी को विशेष क्रायोप्रोटेक्टेंट द्रव से बदला गया, जिससे ठंड के दौरान बर्फ के क्रिस्टल न बनें और कोशिकाएं क्षतिग्रस्त न हों। अंत में दिमाग को माइनस 32 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित कर दिया गया।
क्यों महत्वपूर्ण है 14 मिनट का समय?
शोधकर्ताओं के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रारंभिक परीक्षणों में जब प्रक्रिया मृत्यु के 18 मिनट बाद शुरू की गई तो दिमाग की बाहरी कोशिकाओं में टूट-फूट और क्षति के संकेत दिखाई दिए। लेकिन जब यह समय घटाकर 14 मिनट से कम किया गया तो परिणाम पूरी तरह बदल गए।
माइक्रोस्कोपिक जांच में न्यूरॉन्स और उनके आपसी कनेक्शन लगभग सुरक्षित पाए गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि मृत्यु के बाद कोशिकाओं के भीतर मौजूद एंजाइम ऊतकों को नष्ट करना शुरू कर देते हैं। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ जाए तो नुकसान की भरपाई संभव नहीं रहती। यही कारण है कि मृत्यु के बाद शुरुआती 14 मिनट इस तकनीक की सफलता की कुंजी माने जा रहे हैं।
क्या यादों को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा?
इस परियोजना की सबसे रोचक अवधारणा “कनेक्टोम” है। कनेक्टोम दिमाग के भीतर मौजूद अरबों न्यूरॉन्स और उनके बीच के कनेक्शनों का त्रि-आयामी नक्शा होता है।
कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसान की यादें, अनुभव, व्यक्तित्व और सोच इसी जटिल नेटवर्क में संग्रहित रहते हैं। यदि इस नेटवर्क को पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके तो सैद्धांतिक रूप से किसी व्यक्ति की मानसिक पहचान भी संरक्षित की जा सकती है।
हालांकि वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि फिलहाल किसी सुरक्षित दिमाग को पढ़ना, उसकी यादों को समझना या किसी व्यक्ति को दोबारा जीवित करना संभव नहीं है।
गंभीर मरीजों पर हो सकता है प्रयोग
नेक्टोम अब भविष्य में गंभीर और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को यह सुविधा देने की योजना बना रहा है। अमेरिका के कुछ राज्यों में ऐसे कानून मौजूद हैं जो असाध्य रोगियों को चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु चुनने की अनुमति देते हैं।
योजना के अनुसार मरीज की मृत्यु की आधिकारिक पुष्टि के तुरंत बाद उसके दिमाग को संरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके लिए पहले से कानूनी अनुमति और शरीरदान संबंधी दस्तावेज पूरे करना अनिवार्य होगा।
वैज्ञानिक समुदाय में मतभेद
इस शोध को लेकर वैज्ञानिक जगत में उत्साह के साथ-साथ संदेह भी मौजूद है।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखने में तो सफल हो सकती है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति को दोबारा जीवित करना संभव नहीं होगा। आलोचकों का तर्क है कि किसी व्यक्ति के दिमाग की संरचना की प्रतिकृति बनाना और वास्तविक व्यक्ति को वापस लाना दो अलग-अलग बातें हैं।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन केवल न्यूरॉन्स की वायरिंग नहीं है, बल्कि उसमें जैविक प्रक्रियाएं, चेतना और व्यवहार जैसे कई जटिल तत्व शामिल होते हैं, जिन्हें अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।
क्या बदल जाएगी मौत की परिभाषा?
इस शोध ने मृत्यु की पारंपरिक मेडिकल परिभाषा पर भी सवाल खड़े किए हैं।
वर्तमान चिकित्सा मानकों के अनुसार रक्त प्रवाह और हृदय की धड़कन बंद होने के बाद व्यक्ति को मृत माना जाता है। लेकिन यदि मृत्यु के कुछ मिनट बाद तक दिमाग की संरचना सुरक्षित रखी जा सकती है, तो भविष्य में “मृत्यु” की परिभाषा पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक चिकित्सा विज्ञान, जैव-नैतिकता और कानून के क्षेत्र में व्यापक बहस का विषय बन सकती है।
भविष्य की संभावनाएं
फिलहाल यह तकनीक केवल दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखने तक सीमित है। किसी व्यक्ति की चेतना को पुनर्जीवित करना या उसे कंप्यूटर में स्थानांतरित करना अभी विज्ञान कथा जैसी अवधारणा है।
फिर भी वैज्ञानिक मानते हैं कि यह शोध मानव मस्तिष्क को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और उन्नत न्यूरोसाइंस की मदद से ऐसी संभावनाओं पर और काम किया जा सकता है।
हालांकि एक बात स्पष्ट है कि मौत के बाद जीवन और चेतना को लेकर चल रही वैज्ञानिक खोजों में यह शोध एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।