बंद नंबर, बंद जवाबदेही: सरकारी तंत्र की सुस्त रफ्तार

कहते हैं भारत डिजिटल हो रहा है। हर चीज़ ऑनलाइन, हर सुविधा एक क्लिक पर… लेकिन अगर आपने कभी किसी सरकारी विभाग के बोर्ड पर लिखे नंबर पर फोन मिलाया हो, तो आपको सच्चाई का “नेटवर्क एरर” तुरंत मिल जाएगा।

कई सरकारी दफ्तरों में आज भी बड़े गर्व से BSNL के लैंडलाइन नंबर चमकते हुए दिखाई देंगे—जैसे कोई विरासत हो, जिसे संभालकर रखा गया हो। फर्क बस इतना है कि ये विरासत अब “स्वर्गवासी” हो चुकी है। नंबर हैं, लेकिन सेवा नहीं। फोन है, लेकिन घंटी नहीं। और जवाबदेही… वो तो शायद किसी दूसरे विभाग में ट्रांसफर हो गई है।

आप फोन लगाइए—पहले तो लगेगा ही नहीं। अगर लग गया तो या तो “यह नंबर अस्तित्व में नहीं है” सुनने को मिलेगा, या फिर घंटी ऐसे बजेगी जैसे किसी पुराने खंडहर में गूंज रही हो… जहां कोई उठाने वाला नहीं।

मजेदार बात यह है कि इन नंबरों को बड़े ही आत्मविश्वास के साथ हर जगह छापा जाता है—दीवारों पर, वेबसाइट पर, पंपलेट पर… मानो सरकार कह रही हो, “लो, नंबर दे दिया… अब बात करना तुम्हारी जिम्मेदारी!”

अब सवाल यह नहीं है कि नंबर बंद क्यों हैं। असली सवाल यह है कि क्या इन नंबरों को अपडेट करने के लिए भी किसी “विशेष अभियान” की जरूरत है? क्या इसके लिए भी कोई योजना बनेगी—“मिशन नंबर अपडेट 2027”?

शायद अधिकारियों की सोच कुछ ऐसी हो—“जब तक बोर्ड टंगा है, नंबर लिखा है… काम पूरा है।” भले ही जनता कॉल करते-करते थक जाए, लेकिन बोर्ड की इज्जत बनी रहनी चाहिए!

डिजिटल इंडिया के इस दौर में सरकारी नंबरों की हालत देखकर ऐसा लगता है कि टेक्नोलॉजी आगे बढ़ गई है, लेकिन फाइलें अभी भी 90 के दशक में अटकी हुई हैं।

अगर नंबर चालू नहीं है, तो कम से कम उसके नीचे यह भी लिख दीजिए:
“यह नंबर केवल देखने के लिए है, काम के लिए नहीं।”

कम से कम जनता को उम्मीद तो नहीं बंधेगी!

क्योंकि जनाब, यहां फोन नहीं बजता… सिर्फ सिस्टम की खामोशी गूंजती है।

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