क्या बच्चों को बहला-फुसलाकर बंद कराई जा रही है सरकारी स्कूल? नयापुरा कीरपुरा प्राथमिक शाला को लेकर उठे गंभीर सवाल

पालकों का आरोप- “कहा गया स्कूल बंद हो रहा है, टीसी ले लो”, जांच में सामने आई अलग तस्वीर

माखननगर। क्या सरकारी स्कूलों को कम छात्र संख्या दिखाकर बंद करने की तैयारी की जा रही है? क्या ग्रामीण क्षेत्र के छोटे बच्चों की शिक्षा पर प्रशासनिक सुविधाओं और आंकड़ों का खेल भारी पड़ रहा है? माखननगर क्षेत्र की प्राथमिक शाला नयापुरा कीरपुरा का मामला ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।


जहां एक ओर शासन “स्कूल चलें हम” जैसे अभियान चलाकर बच्चों को स्कूलों से जोड़ने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर नयापुरा कीरपुरा में ऐसी स्थिति सामने आई है जिसमें पालकों का आरोप है कि उन्हें यह कहकर बच्चों की टीसी (स्थानांतरण प्रमाण पत्र) लेने के लिए प्रेरित किया गया कि स्कूल बंद होने वाला है।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि स्कूल बंद करने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं था, तो आखिर पालकों से बच्चों को निकालने की सहमति क्यों ली जा रही थी?

छह बच्चों वाली शाला अचानक कैसे हो गई खाली?


जानकारी के अनुसार प्राथमिक शाला नयापुरा कीरपुरा में वर्तमान में मात्र छह छात्र-छात्राएं दर्ज हैं। अचानक इन बच्चों की टीसी निकालने की प्रक्रिया शुरू हो गई और प्रशासनिक स्तर पर स्कूल को शून्य दर्ज संख्या (जीरो एनरोलमेंट) वाली शाला घोषित करने की तैयारी की खबरें सामने आने लगीं।


लेकिन जब मामले की जानकारी मिलने पर denvapost टीम द्वारा स्थानीय स्तर पर पड़ताल की गई तो तस्वीर कुछ और ही निकली।
मौके पर पहुंचे लोगों ने पाया कि अधिकांश पालक अपने बच्चों को स्कूल से निकालना ही नहीं चाहते। उनका कहना है कि उन्हें बताया गया था कि स्कूल बंद होने वाला है, इसलिए मजबूरी में उन्होंने आवेदन दिए।

“मेरी बच्ची छोटी है, स्कूल बंद हुआ तो परेशानी होगी”


छात्रा खुशी कीर के पिता दीपक कीर ने स्पष्ट कहा कि यदि स्कूल बंद हो जाता है तो उनके परिवार को गंभीर परेशानी होगी।
उनका कहना है कि उनकी बच्ची अभी छोटी है और गांव के पास स्कूल होने से पढ़ाई सुगमता से चल रही है। यदि स्कूल बंद कर दिया गया तो बच्ची को दूर स्थित विद्यालय भेजना पड़ेगा, जो परिवार के लिए मुश्किल होगा।

“मेडम ने कहा स्कूल बंद हो रहा है”


एक अन्य पालक कमल दायमा ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी पुत्री दिव्यांशी चौथी कक्षा में पढ़ती है।


कमल दायमा के अनुसार उन्हें विद्यालय बुलाकर कहा गया कि स्कूल बंद होने वाला है, इसलिए लिखकर दे दीजिए कि आप अपनी बच्ची को निकाल रहे हैं।
उन्होंने साफ कहा कि यदि स्कूल चालू रहता है तो वे अपनी बच्ची को कहीं नहीं भेजेंगे।


कमल दायमा का सवाल है कि बरसात के मौसम में छोटे-छोटे बच्चों को दो से तीन किलोमीटर दूर स्थित स्कूल तक कैसे भेजा जाएगा? क्या प्रशासन ने इस विषय पर कोई व्यावहारिक अध्ययन किया है?

क्या पहले छात्रों को हटाओ, फिर स्कूल को जीरो घोषित करो?


मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यदि पालकों को यह बताया गया कि स्कूल बंद हो रहा है और इसी आधार पर बच्चों की टीसी ली गई, तो यह पूरी प्रक्रिया कितनी वैधानिक और नैतिक है?
शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार किसी भी स्कूल को बंद करने या मर्ज करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया, सर्वे, वैकल्पिक व्यवस्था और उच्चस्तरीय स्वीकृति आवश्यक होती है।


यदि पहले बच्चों को हटाया जाए और बाद में उसी आधार पर स्कूल को “जीरो एनरोलमेंट” दिखाकर बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जाए, तो यह पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

जन शिक्षक ने क्या कहा?


मामले में जन शिक्षक ब्रजेश त्रिवेदी ने बताया कि उन्हें विद्यालय प्रभारी का फोन आया था कि पालक टीसी मांग रहे हैं।


उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन लेने की सलाह दी थी।


यह बयान भी कई सवाल खड़े करता है। यदि वास्तव में पालक स्वयं टीसी मांग रहे थे तो मौके पर कई पालकों ने बच्चों को स्कूल से नहीं निकालने की बात क्यों कही?

शाला प्रभारी ने आरोपों को बताया झूठ


विद्यालय प्रभारी ब्रजेश पाल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी पालक से यह नहीं कहा कि स्कूल बंद होने वाला है। उन्होंने कहा कि उनके स्थानांतरण की चर्चा को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और उनके विरुद्ध लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह झूठे एवं अफवाह आधारित हैं।


हालांकि पालकों के बयानों और शाला प्रभारी के स्पष्टीकरण के बीच बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

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बीआरसी ने दिए कार्रवाई के संकेत


बीआरसी श्याम सिंह पटेल ने कहा कि वे पोर्टल पर स्थिति की जांच करेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि विद्यालय की दर्ज संख्या शून्य दिखाई जा रही है और इसमें किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित शाला प्रभारी को कारण बताओ सूचना पत्र (एससीएन) जारी किया जाएगा।

आखिर किसकी जिम्मेदारी है ग्रामीण बच्चों की शिक्षा?


यह मामला केवल छह बच्चों का नहीं है। यह उन सैकड़ों ग्रामीण परिवारों की चिंता का विषय है जिनके छोटे बच्चे गांव के प्राथमिक विद्यालयों पर निर्भर हैं।
शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को नजदीक विद्यालय में शिक्षा उपलब्ध कराने की बात करता है। ऐसे में यदि कम दर्ज संख्या का हवाला देकर स्कूल बंद किए जाते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब और ग्रामीण परिवारों को होगा जिनके पास बच्चों को दूर तक छोड़ने या लाने की सुविधा नहीं है।


सरकार एक ओर शिक्षा के अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान की बात करती है, दूसरी ओर यदि जमीनी स्तर पर विद्यालयों को समाप्त करने की प्रवृत्ति बढ़ती है तो इसका सीधा असर ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।

जांच की मांग तेज


स्थानीय नागरिकों और पालकों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर बच्चों की टीसी किन परिस्थितियों में निकाली गई, पालकों को क्या जानकारी दी गई और क्या विद्यालय को शून्य दर्ज संख्या वाली शाला बनाने की कोई सुनियोजित प्रक्रिया चल रही थी।


अब सभी की निगाहें शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। यदि समय रहते इस मामले की पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो यह केवल एक स्कूल का मामला नहीं रहेगा बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी प्रभावित होगा।
सवाल अब भी कायम है— क्या नयापुरा कीरपुरा प्राथमिक शाला वास्तव में बच्चों की कमी से बंद होने की कगार पर है, या फिर बच्चों को हटाकर स्कूल को बंद करने का रास्ता तैयार किया जा रहा है?

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