सागर। भीषण गर्मी के बीच जहां बुंदेलखंड का बड़ा हिस्सा पानी की किल्लत से जूझ रहा है, वहीं सागर जिले से एक सकारात्मक और प्रेरणादायक पहल सामने आई है। जिले की 12 गौशालाओं में अब मवेशियों को गर्मी के मौसम में भी पौष्टिक हरा चारा मिल रहा है। यह संभव हुआ है ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी स्व-सहायता समूह की महिलाओं की मेहनत और हाइड्रोपोनिक्स तकनीक के उपयोग से।
परंपरा और विज्ञान का अनोखा मेल
इस पहल की खास बात यह है कि इसकी प्रेरणा भारतीय परंपरा से ली गई है। नवरात्रि में घरों में बोए जाने वाले ‘जवारे’ की पारंपरिक पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक से जोड़ते हुए महिलाओं ने हाइड्रोपोनिक्स विधि अपनाई है। इस तकनीक में बिना मिट्टी के केवल पानी की मदद से पौधे उगाए जाते हैं।
ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त कर बड़े पैमाने पर हरे चारे का उत्पादन शुरू किया है, जिससे गौशालाओं को राहत मिली है।
कम पानी में तैयार हो रहा पौष्टिक चारा
सागर जिले में संचालित 25 से अधिक छोटी-बड़ी गौशालाएं हर साल गर्मियों में चारे की कमी से परेशान रहती थीं। ऐसे में हाइड्रोपोनिक्स तकनीक वरदान साबित हो रही है, क्योंकि इसमें पारंपरिक खेती की तुलना में बेहद कम पानी की आवश्यकता होती है।
महिलाएं गेहूं, मक्का और जौ के बीजों से केवल एक सप्ताह के भीतर हरा और पौष्टिक चारा तैयार कर रही हैं। यह चारा विटामिन और खनिज तत्वों से भरपूर होता है, जिससे मवेशियों का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है।
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महिलाओं को मिला रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर
इस नवाचार ने न सिर्फ गौशालाओं में मवेशियों के लिए चारे की समस्या का समाधान किया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खोले हैं। महिलाएं स्वयं इस तकनीक का संचालन और प्रबंधन कर रही हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।
प्रदेश के लिए बन सकता है मॉडल
सागर की यह पहल साबित करती है कि यदि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और महिला शक्ति के साथ जोड़ा जाए, तो जल संकट और पशु चारे जैसी पुरानी समस्याओं का भी प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है। यह मॉडल बुंदेलखंड सहित प्रदेश और देश के अन्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।