चोर पहले से ज्ञात, केस फिर भी अज्ञात!

देश में अपराध रोकने की जिम्मेदारी जिस संस्था के कंधों पर है, आज वही संस्था कई बार अपने काम करने के तरीके को लेकर सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। आम नागरिक जब किसी चोरी, लूट या अपराध का शिकार होता है, तो सबसे पहले पुलिस थाने का दरवाजा खटखटाता है। उसे उम्मीद होती है कि कानून उसकी रक्षा करेगा, अपराधी पकड़े जाएंगे और न्याय मिलेगा। लेकिन विडंबना यह है कि कई मामलों में पुलिस का पूरा ध्यान अपराध रोकने से ज्यादा “खुलासा” करने की कला पर केंद्रित दिखाई देता है।

सबसे हास्यास्पद स्थिति तब बनती है जब पुलिस आरोपी को पकड़ने के बाद भी मामला “अज्ञात आरोपी” के खिलाफ दर्ज करती है और फिर कुछ दिनों बाद उसी आरोपी को मीडिया के सामने पेश कर “बड़ी सफलता” का ढोल पीटती है। मानो अपराधी कोई अंतरराष्ट्रीय गिरोह का मास्टरमाइंड हो, जिसे खोजने में एजेंसियों के पसीने छूट गए हों।

आजकल पुलिसिया प्रेस नोट पढ़िए तो लगता है जैसे किसी फिल्म का ट्रेलर चल रहा हो —“पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली… घेराबंदी की गई… आरोपी भागने लगा… पुलिस ने बहादुरी दिखाते हुए पकड़ लिया…”और अंत में पता चलता है कि आरोपी वही है, जिसे पुलिस पहले से जानती थी, इलाके में उसका पुराना रिकॉर्ड था और कई बार थाने में उसका आना-जाना भी रहा है।

लेकिन असली सवाल यह है कि यदि आरोपी पहले से पहचान में था तो मामला “अज्ञात” क्यों दर्ज हुआ?क्या कानून की किताब में “अज्ञात” शब्द अब सिर्फ एक औपचारिकता बन चुका है?या फिर यह “खुलासा उद्योग” का हिस्सा है, जहां अपराध से ज्यादा उसकी प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो गई है?

अब स्थिति यह हो गई है कि चोरी होने के बाद जनता अपराधी पकड़ने से ज्यादा पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करती है। पुलिस आरोपी पकड़ती कम और फोटो ज्यादा खिंचवाती दिखाई देती है। बरामद सामान को इस अंदाज में सजाया जाता है मानो किसी प्रदर्शनी का उद्घाटन होने वाला हो। एक पुरानी बाइक, दो मोबाइल, तीन हजार रुपए और एक जंग लगी रॉड के साथ आरोपी को खड़ा कर दिया जाता है। फिर बयान आता है —“आरोपी से पूछताछ जारी है, अन्य वारदातों के खुलासे की संभावना है।”यानी अपराधी पकड़ने से ज्यादा “संभावनाएं” पकड़ी जा रही हैं।व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस अपराध को होने से रोकना चाहिए, उसी के बाद उसका “खुलासा” उपलब्धि माना जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे डॉक्टर मरीज को बीमार होने से रोकने के बजाय बीमारी बढ़ने का इंतजार करे ताकि बाद में ऑपरेशन कर वाहवाही लूट सके।

यह भी कम दिलचस्प नहीं कि कई बार चोरी की घटनाओं में पुलिस पहले पीड़ित से ही सवाल-जवाब करती है, मानो वही संदेह के घेरे में हो। “दरवाजा खुला क्यों था?”, “इतना सामान घर में क्यों रखा?”, “सीसीटीवी क्यों नहीं लगाए?”लेकिन जब जनता पुलिस से पूछे कि गश्त क्यों नहीं थी, अपराधी खुलेआम क्यों घूम रहे थे, पुराने बदमाशों पर निगरानी क्यों नहीं थी — तब जवाब अक्सर मौन में मिलता है।दरअसल, आज अपराध नियंत्रण से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” का दौर चल रहा है। अपराध का ग्राफ चाहे बढ़े, लेकिन प्रेस नोट की भाषा हमेशा विजयी रहती है। चोरी की घटनाएं लगातार होती रहेंगी, लेकिन यदि हर चोरी के बाद एक प्रेस वार्ता हो जाए तो व्यवस्था स्वयं को सफल मान लेती है।

कई बार तो ऐसा लगता है कि पुलिस और अपराधियों के बीच एक मौन समझौता चल रहा हो —“तुम चोरी करते रहो, हम खुलासा करते रहेंगे।”जनता बीच में सिर्फ दर्शक बनी रहती है।सबसे दुखद पहलू यह है कि आम आदमी धीरे-धीरे इस व्यवस्था को सामान्य मानने लगा है। उसे अब अपराध से ज्यादा यह चिंता रहती है कि “कम से कम सामान मिल जाए।” यानी न्याय की उम्मीद छोटी होकर सिर्फ बरामदगी तक सीमित हो गई है।

सोचिए, यदि कोई किसान हर साल फसल बर्बाद होने के बाद सिर्फ यह कहे कि “अगली बार सुधार करेंगे”, तो क्या उसे सफल किसान माना जाएगा?फिर पुलिस व्यवस्था में अपराध रोकने की विफलता को सफलता की तरह क्यों प्रस्तुत किया जाता है?आज जरूरत इस बात की है कि पुलिस व्यवस्था अपनी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करे।

अपराध होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करना आसान है, लेकिन अपराध होने से पहले उसे रोकना असली पुलिसिंग है। इलाके के बदमाशों पर निगरानी, नियमित गश्त, तकनीकी जांच, मुखबिर तंत्र की सक्रियता और जनता के साथ विश्वास — यही किसी भी मजबूत कानून व्यवस्था की पहचान होती है।लेकिन यदि व्यवस्था सिर्फ “अज्ञात आरोपी” से “खुलासा” तक की यात्रा में ही उलझी रहेगी, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा और जनता का भरोसा घटेगा।

आजकल पुलिस की सबसे बड़ी उपलब्धि अपराध रोकना नहीं, बल्कि अपराध होने के बाद उसका पोस्टर बनाना रह गई है।और जनता भी अब इस तमाशे की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि जब तक प्रेस नोट में “बड़ी सफलता” न लिखा हो, उसे लगता ही नहीं कि कोई कार्रवाई हुई है।कानून व्यवस्था का असली उद्देश्य भयमुक्त समाज बनाना होना चाहिए, न कि “खुलासों” की प्रतियोगिता।

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