“एफआईआर नहीं, जवाब नहीं: माखननगर वेयरहाउस कार्यालय में आखिर छुप क्या रहा है?”

माखननगर।मध्य प्रदेश वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक कार्पोरेशन का माखननगर कार्यालय एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला भले ही एक प्रिंटर का हो, लेकिन इसकी गूंज कहीं ज्यादा गहरी है। क्योंकि यह सिर्फ एक मशीन के गायब होने की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां ताले तो लगे रहते हैं, लेकिन जिम्मेदारियां खुली घूमती हैं।

सूत्रों के मुताबिक, कार्यालय से  एक प्रिंटर गायब हो गया। घटना तब हुई जब ऑफिस में ताला लगा हुआ था। यानी दरवाजा बंद, ताला सही सलामत, कोई तोड़फोड़ नहीं—फिर भी प्रिंटर गायब। यह स्थिति सामान्य चोरी की परिभाषा से बाहर है और सीधे-सीधे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है।

हैरानी की बात यह है कि कार्यालय प्रशासन इस पूरे मामले को सिरे से नकार रहा है। न कोई चोरी हुई, न कोई सामान गायब हुआ—ऐसा आधिकारिक रुख अपनाया गया है। अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर यह चर्चा क्यों? अगर प्रिंटर मौजूद है, तो दिखाया क्यों नहीं जा रहा? और अगर गायब है, तो स्वीकार करने में हिचकिचाहट क्यों?

कार्यालय के मैनेजर हेमंत चंदेल ने इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा कि प्रिंटर खराब था और उसे सुधार के लिए कंप्यूटर शॉप पर भेजा गया है। पहली नजर में यह बयान स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश जैसा लगता है। लेकिन जैसे ही संबंधित रिपेयर शॉप से जानकारी ली गई, वहां से साफ इनकार कर दिया गया कि उनके पास कोई प्रिंटर सुधारने के लिए आया ही नहीं।

यहीं से कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा शुरू होता है। अगर प्रिंटर रिपेयर के लिए नहीं गया, तो वह कहां है? और अगर गया है, तो उसका कोई रिकॉर्ड, कोई रसीद, कोई एंट्री क्यों नहीं है? सरकारी कार्यालयों में छोटी से छोटी चीज का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था होती है, फिर यहां इतनी बड़ी लापरवाही कैसे संभव है?

यह सवाल इसलिए भी और गंभीर हो जाता है क्योंकि यह पहली घटना नहीं है। इसी वर्ष 14 फरवरी को इसी निगम के एक निजी गोदाम से करोड़ों रुपये की मूंग गायब हो गई थी। तब भी ताला लगा हुआ था, तब भी कोई तोड़फोड़ नहीं हुई थी, और तब भी जवाबों से ज्यादा सवाल सामने आए थे।

अब एक बार फिर वही पैटर्न सामने है—ताला लगा है, सामान गायब है, और जिम्मेदार चुप हैं। यह अब संयोग नहीं लगता, बल्कि एक ऐसी प्रवृत्ति का संकेत देता है जिसमें घटनाओं को स्वीकार करने के बजाय दबाने की कोशिश की जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई? जब सरकारी संपत्ति गायब होती है, तो यह एक आपराधिक मामला बनता है और इसकी रिपोर्ट दर्ज करना अनिवार्य होता है। लेकिन यहां चुप्पी साध ली गई है। यह चुप्पी सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संदेह को और गहरा करती है।

क्या किसी को बचाया जा रहा है?
क्या मामला अंदर ही अंदर सुलझाने की कोशिश हो रही है?
या फिर यह मान लिया गया है कि “जो दिख रहा है, उसे नजरअंदाज कर दो”?

सूत्र बताते हैं कि कर्मचारियों से पूछताछ की जा रही है। लेकिन यह पूछताछ कितनी निष्पक्ष है, यह एक बड़ा प्रश्न है। जब जांच उसी सिस्टम के भीतर हो रही हो, जिस पर आरोप हैं, तो निष्पक्षता की उम्मीद कमजोर हो जाती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर ताला लगा होने के बावजूद चोरी हो सकती है, तो इसका मतलब साफ है कि या तो चाबी का दुरुपयोग हो रहा है या फिर सिस्टम के भीतर ही कहीं सेंध है। और अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ एक प्रिंटर या एक गोदाम तक सीमित नहीं रहेगा—यह पूरे वेयरहाउस सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है।

यह भी चिंता का विषय है कि अगर आज एक प्रिंटर के मामले में इतनी ढिलाई बरती जा रही है, तो करोड़ों रुपये के अनाज की सुरक्षा को लेकर क्या भरोसा किया जा सकता है? क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं फिर नहीं होंगी? और अगर होंगी, तो क्या हर बार यही कहानी दोहराई जाएगी—ताला लगा था, चोरी हो गई, और किसी को कुछ पता नहीं चला?

माखननगर का यह मामला अब सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं रह गया है। यह उस व्यापक समस्या का हिस्सा है जहां सरकारी तंत्र में जवाबदेही धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जहां गलती स्वीकार करने के बजाय उसे छिपाने की संस्कृति विकसित हो रही है।

जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। यह तय किया जाए कि प्रिंटर कहां गया, किसकी जिम्मेदारी थी और अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई। अगर इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है, तो सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि अगर आज भी इसे नजरअंदाज किया गया,तो कल यह एक और बड़ी घटना का कारण बन सकता है और तब शायद नुकसान सिर्फ एक प्रिंटर या कुछ बोरी मूंग का नहीं होगा, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का होगा।

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