
माखननगर। सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन गुरुवार को माखननगर परियोजना कार्यालय में जो तस्वीर सामने आई, उसने व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। जिस कार्यालय से सैकड़ों आंगनवाड़ी केंद्रों की निगरानी और महिला एवं बाल विकास विभाग की योजनाओं का संचालन होता है, उसी कार्यालय के मुख्य दरवाजे पर सुबह से ताला लटका रहा। विडंबना यह रही कि कर्मचारी और सुपरवाइजर कार्यालय परिसर के बाहर बैठकर अपना काम निपटाते रहे, जबकि सरकारी कार्यालय पूरे दिन अपनी ही चाबी का इंतजार करता रहा।
सूत्रों के अनुसार, बनखेड़ी से स्थानांतरित होकर आए स्थाईकर्मी सुनील ठाकुर बुधवार को घर लौटते समय सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। बताया जा रहा है कि कार्यालय की मुख्य चाबी उनके पास थी। दुर्घटना के कारण वे गुरुवार को कार्यालय नहीं पहुंच सके और चाबी भी कार्यालय तक नहीं पहुंच पाई। यदि यह जानकारी सही है तो सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या करोड़ों रुपये की योजनाओं का संचालन करने वाले कार्यालय की पूरी व्यवस्था केवल एक व्यक्ति और एक चाबी के भरोसे चल रही थी?
जानकारी के अनुसार कार्यालय की दूसरी चाबी सहायक ग्रेड-3 हरिसिंह मरकाम के पास भी उपलब्ध थी। जब कर्मचारियों ने उनसे संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनका मोबाइल फोन पूरे दिन बंद मिला। न फोन लगा, न चाबी पहुंची और न कार्यालय खुल सका। सरकारी व्यवस्था की यह तस्वीर अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। आखिर यदि किसी कर्मचारी का मोबाइल बंद हो जाए तो क्या पूरा सरकारी कार्यालय भी बंद हो जाना चाहिए?

इस बीच परियोजना अधिकारी सुषमा चौरसिया भी कार्यालय में मौजूद नहीं थीं। बताया गया कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंस (VC) में व्यस्त थीं। उन्होंने फोन पर जानकारी देते हुए कहा कि पूरे मामले से जिला कार्यक्रम अधिकारी को अवगत करा दिया गया है और किसी प्रकार का कार्य प्रभावित नहीं हुआ क्योंकि सुपरवाइजर ऑनलाइन कार्य कर रही थीं।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती दिखाई दी। सुबह से कार्यालय के बाहर बैठी सुपरवाइजरों को जरूरी दस्तावेज, रिकॉर्ड और कार्यालयीन संसाधनों तक पहुंच नहीं मिल सकी। कई कर्मचारी धूप और उमस के बीच बाहर बैठकर मोबाइल और दूसरे कार्यालय के कप्यूटर के सहारे काम करते रहे। सवाल यह है कि यदि कार्यालय के अंदर रखे अभिलेखों या किसी जरूरी फाइल की आवश्यकता पड़ जाती तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
सरकारी दफ्तरों में अक्सर यह कहा जाता है कि “काम नहीं रुकना चाहिए”, लेकिन यहां तो कार्यालय का दरवाजा ही नहीं खुला। यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरा प्रशासन ताले के आगे बेबस हो गया हो।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या किसी भी सरकारी कार्यालय के लिए वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? क्या आपातकालीन स्थिति में कार्यालय खोलने का कोई प्रोटोकॉल नहीं है? यदि चाबी रखने वाला कर्मचारी अनुपस्थित हो जाए, दुर्घटनाग्रस्त हो जाए या किसी अन्य कारण से उपलब्ध न हो, तो क्या पूरे कार्यालय को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाएगा?
विडंबना यह भी है कि डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस और स्मार्ट प्रशासन के दावे करने वाली व्यवस्था आज भी एक साधारण चाबी के सामने असहाय नजर आई। ऑनलाइन काम अपनी जगह है, लेकिन कार्यालय का खुला होना भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। यदि अधिकारी और कर्मचारी स्वयं कार्यालय में प्रवेश ही न कर सकें, तो आम नागरिक व्यवस्था पर कैसे विश्वास करेगा?
यह घटना केवल एक दिन कार्यालय बंद रहने की नहीं है, बल्कि यह सरकारी प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है। यदि आज कोई महत्वपूर्ण निरीक्षण हो जाता, कोई आपातकालीन आदेश आता या कोई संवेदनशील रिकॉर्ड तत्काल चाहिए होता, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होती?
लोगों के बीच भी इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। किसी ने कहा कि “सरकारी दफ्तर अब फाइलों से नहीं, चाबियों से चलते हैं।” तो किसी ने व्यंग्य किया कि “कार्यालय में कर्मचारी मौजूद थे, काम भी हो रहा था, बस दफ्तर ही नहीं खुला था।”
यह घटना प्रशासन के लिए एक सबक होनी चाहिए। किसी भी कार्यालय में चाबियों की सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था, जिम्मेदार अधिकारियों की उपलब्धता और आपातकालीन प्रबंधन प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए। अन्यथा भविष्य में ऐसी घटनाएं केवल कर्मचारियों की परेशानी ही नहीं बढ़ाएंगी, बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करेंगी।