मंत्री के आदेश की अनदेखी? केसला जनपद में ‘चार्ज’ पर सियासी-प्रशासनिक टकराव, आठ महीने से भटक रहा लेखाधिकारी

नर्मदापुरम। शासन के स्पष्ट निर्देश, मंत्री का लिखित आदेश और स्थानांतरण के आठ महीने बाद भी एक अधिकारी को उसका वैधानिक प्रभार (चार्ज) न मिलना—यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला बन चुका है। केसला जनपद पंचायत में सहायक लेखाधिकारी के प्रभार को लेकर खड़ा हुआ विवाद अब खुलकर शासन बनाम प्रशासन की टकराहट का रूप लेता दिख रहा है।

मामले के केंद्र में हैं सहायक लेखाधिकारी पद पर पदस्थ किए गए राकेश उपाध्याय, जिन्हें लगभग आठ महीने पहले केसला जनपद पंचायत में पदस्थ किया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक उन्हें उनके पद का प्रभार नहीं दिया गया। उल्टा, भृत्य से पदोन्नत होकर सहायक ग्रेड-3 बने दिलीप डांग को इस महत्वपूर्ण पद का प्रभार सौंप दिया गया। सवाल यह उठता है कि जब विधिवत पदस्थ अधिकारी मौजूद है, तो फिर प्रभार किसी अन्य को क्यों और किस आधार पर दिया गया?

मंत्री का पत्र भी बेअसर!

मामले ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब प्रदेश के आर्थिक एवं सांख्यिकी मंत्री जगदीश देवड़ा ने 26 मार्च 2026 को जिला पंचायत सीईओ को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए कि राकेश उपाध्याय को सहायक लेखाधिकारी का प्रभार सौंपा जाए। यह कोई मौखिक निर्देश नहीं, बल्कि विधिवत लिखित आदेश था।

लेकिन सवाल यहीं से और गंभीर हो जाता है—क्या मंत्री का पत्र अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है? क्योंकि पत्र जारी हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सीईओ की सफाई या टालमटोल?

इस पूरे मामले पर जब जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन से सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब दिया कि “कर्मचारी की सर्विस बुक मंगाई गई है और यह देखा जा रहा है कि उसकी पूर्व पदस्थापनाएं कहां-कहां रही हैं। उसी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”

यह तर्क कई मायनों में सवालों के घेरे में है। प्रशासनिक जानकारों का साफ कहना है कि किसी भी अधिकारी को प्रभार देने का संबंध उसकी सर्विस बुक से नहीं होता, बल्कि उसके वर्तमान पदस्थापन आदेश और योग्यता से होता है। ऐसे में ‘सर्विस बुक’ की आड़ में फैसले को टालना कहीं न कहीं संदेह को और गहरा करता है।

नियमों की अनदेखी या ‘सेटिंग’ का खेल?

सूत्रों की मानें तो यह पूरा मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि ‘सेटिंग’ और ‘प्रभाव’ का खेल भी हो सकता है। जिस पद पर वित्तीय अधिकार जुड़े होते हैं, वहां प्रभार देना या न देना सीधे तौर पर आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसके दबाव में एक विधिवत पदस्थ अधिकारी को दरकिनार किया जा रहा है?

क्या यह महज संयोग है कि एक भृत्य से पदोन्नत कर्मचारी को उस पद का प्रभार दे दिया गया, जहां पहले से एक नियमित अधिकारी मौजूद है? या फिर इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?

प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने जिला पंचायत स्तर की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि एक मंत्री के लिखित आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो आम कर्मचारी और नागरिकों के लिए यह संदेश क्या जाता है?

  • क्या प्रशासन अब जनप्रतिनिधियों के निर्देशों को नजरअंदाज करने लगा है?
  • क्या नियमों की व्याख्या मनमर्जी से की जा रही है?
  • क्या पदस्थापन आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया है?

ये सवाल सिर्फ केसला जनपद पंचायत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं।

राकेश उपाध्याय का मामला अब एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली का प्रतीक बन गया है। एक अधिकारी, जिसे शासन ने विधिवत पदस्थ किया, वह आठ महीने से अपने ही अधिकार के लिए इंतजार कर रहा है। यह स्थिति न सिर्फ उसके पेशेवर सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है।

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