
राष्ट्रप्रेम किसी भी समाज की सबसे सकारात्मक भावनाओं में से एक माना जाता है। अपने देश, संस्कृति, भाषा और इतिहास पर गर्व करना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। यही भावना लोगों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब राष्ट्रप्रेम संतुलन खो देता है और धीरे-धीरे चरम राष्ट्रवाद में बदलने लगता है।
आज दुनिया के कई देशों में राजनीति, मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवाद को एक शक्तिशाली भावनात्मक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। राष्ट्रप्रेम की भावना को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि जो व्यक्ति सरकार, व्यवस्था या नीतियों पर सवाल पूछे, उसे सीधे “राष्ट्रविरोधी” साबित करने की कोशिश होने लगती है। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र कमजोर और कट्टरता मजबूत होने लगती है।
देशभक्ति और चरम राष्ट्रवाद में मूलभूत अंतर समझना बेहद जरूरी है।
देशभक्ति अपने देश से प्रेम करना सिखाती है।
चरम राष्ट्रवाद दूसरों से घृणा करना सिखाने लगता है।
एक सच्चा देशभक्त अपने देश की कमियों पर सवाल भी उठाता है, सुधार की मांग भी करता है और संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की बात भी करता है। लेकिन चरम राष्ट्रवाद अक्सर सवालों को खतरे की तरह देखने लगता है। वहां आलोचना को सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि “देशद्रोह” के रूप में प्रचारित किया जाता है।
इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी राष्ट्रवाद अंधभक्ति में बदला, परिणाम विनाशकारी रहे। जर्मनी में Adolf Hitler ने राष्ट्रवाद को भावनात्मक उन्माद में बदल दिया। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि उनका राष्ट्र और नस्ल दुनिया में सर्वोच्च है। धीरे-धीरे लोकतंत्र खत्म हुआ, असहमति कुचली गई और अंततः World War II जैसी भयावह त्रासदी सामने आई।
चरम राष्ट्रवाद की सबसे खतरनाक विशेषता यह होती है कि वह समाज को “हम” और “वे” में बांट देता है। लोग नागरिक कम और पहचान आधारित समूहों के सदस्य ज्यादा बन जाते हैं। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर श्रेष्ठता की भावना पैदा की जाती है। फिर राजनीति इन भावनाओं को भड़काकर सत्ता मजबूत करने का माध्यम बना लेती है।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। आज कुछ सेकंड के वीडियो, उत्तेजक भाषण और भावनात्मक नारों के जरिए लोगों को तुरंत प्रभावित किया जा सकता है। जो जितना आक्रामक दिखता है, वह उतना “राष्ट्रवादी” घोषित कर दिया जाता है। तर्क, तथ्य और संवैधानिक मूल्यों की जगह शोर और भीड़ की मानसिकता ले लेती है।
विडंबना यह है कि चरम राष्ट्रवाद अक्सर उन लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी कमजोर करता है, जो वास्तव में राष्ट्र की ताकत होती हैं। न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय और स्वतंत्र संस्थाओं पर सवाल उठाने वालों को “राष्ट्रहित” के नाम पर चुप कराने की कोशिश होने लगती है। जबकि लोकतंत्र की असली ताकत सवाल पूछने की आजादी में होती है, न कि एकरूप सोच में।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि चरम राष्ट्रवाद आमतौर पर भावनाओं पर आधारित होता है, तथ्यों पर नहीं। इतिहास को चयनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, भावनात्मक नारों को तर्क से ऊपर रखा जाता है और जनता को लगातार यह एहसास दिलाया जाता है कि राष्ट्र “खतरे” में है। डर और गुस्सा राजनीति के सबसे प्रभावी उपकरण बन जाते हैं।
एक स्वस्थ राष्ट्र वही होता है जहां नागरिक अपने देश से प्रेम करें, लेकिन संविधान, लोकतंत्र और मानवता को भी उतना ही महत्व दें। जहां सैनिक का सम्मान हो, लेकिन शिक्षक, किसान, मजदूर और वैज्ञानिक भी राष्ट्रनिर्माता माने जाएं। जहां राष्ट्रध्वज पर गर्व हो, लेकिन मानवाधिकारों और असहमति का भी सम्मान हो।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता संतुलित राष्ट्रवाद की है — ऐसा राष्ट्रवाद जो जोड़ने का काम करे, तोड़ने का नहीं। जो विविधता को कमजोरी नहीं, ताकत माने। जो आलोचना से डरे नहीं, बल्कि उसे सुधार का अवसर समझे।
क्योंकि जब राष्ट्रप्रेम विवेक खो देता है, तब वह लोकतंत्र के लिए चुनौती बन जाता है। और जब सवाल पूछना अपराध लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रवाद धीरे-धीरे चरम राष्ट्रवाद में बदल रहा है।
राष्ट्र किसी एक नेता, एक विचारधारा या एक समूह का नाम नहीं होता। राष्ट्र उन करोड़ों लोगों का साझा विश्वास होता है जो अलग-अलग विचारों के बावजूद साथ रहते हैं। इसलिए देशभक्ति का अर्थ सत्ता से सहमति नहीं, बल्कि देश और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति ईमानदारी होना चाहिए।
अन्यथा इतिहास बार-बार यही साबित करता है कि चरम राष्ट्रवाद शुरुआत में शक्ति जैसा दिखता है, लेकिन अंत में समाज को विभाजन, भय और संघर्ष की ओर धकेल देता है।