Dhar News:धार में फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में परिवाद खारिज, न्यायालय ने नहीं पाया आपराधिक आधार

धार। नगर परिषद चुनाव से जुड़े कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए परिवादी द्वारा दायर परिवाद को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया किसी भी आपराधिक धाराओं में संज्ञान लेने के पर्याप्त आधार नहीं बनते।

दोनों पक्षों ने रखे विस्तृत तर्क
मामले में वार्ड क्रमांक 12 की पार्षद अंजली अजय जायसवाल की ओर से अधिवक्ता डीएस चौहान ने पक्ष रखा, जबकि नगर परिषद अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल की ओर से अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने प्रकरण पंजीयन और आवेदन पर विस्तार से तर्क प्रस्तुत किए। अभियुक्त पक्ष ने यह भी कहा कि परिवाद दर्ज करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं, जिस पर न्यायालय ने मुख्य प्रकरण पर ही निर्णय सुनाया।

परिवादी ने लगाए थे फर्जी प्रमाण पत्र के आरोप
परिवादी अंजली जायसवाल ने आरोप लगाया था कि सवेरा जायसवाल ने नगर परिषद चुनाव 2022-23 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नाम पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुईं। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में संबंधित प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने का दावा किया गया था।

परिवादी पक्ष ने अपने समर्थन में अंजली जायसवाल, अजय जायसवाल और जाति प्रमाण पत्र शाखा प्रभारी हेमंत खलिया के बयान प्रस्तुत किए। साक्षियों के अनुसार संबंधित प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड शासकीय अभिलेखों में नहीं मिला और उसमें विसंगतियां पाई गईं।

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न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि केवल मौखिक साक्ष्य या प्रारंभिक जांच के आधार पर किसी जाति प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी या राज्य स्तरीय जाति सत्यापन समिति द्वारा विधिवत जांच आवश्यक होती है। साथ ही, परिवादी द्वारा ऐसी किसी समिति में शिकायत या उसकी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।

अदालत ने यह भी पाया कि धोखाधड़ी से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 420 सहित अन्य धाराओं के लिए आवश्यक तत्व साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं हुए।

परिवाद खारिज, आगे की तैयारी
इन सभी तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 के अंतर्गत संज्ञान लेने से इंकार करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 203 के तहत परिवाद को निराधार मानकर खारिज कर दिया।

इधर, परिवादी पक्ष के अधिवक्ता दिलीप चौहान ने कहा कि न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकर वे उच्च न्यायालय में रिवीजन याचिका दायर करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय ने अपने आदेश में सवेरा महेश जायसवाल के जाति प्रमाण पत्र को सत्य या फर्जी होने पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

इस फैसले के बाद स्थानीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है और मामले को लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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