Makhannagar News: नगर के डाकखाना से गायब हुए 10 रुपये के पोस्टल ऑर्डर, RTI एक्टिविस्ट एक साल से काट रहे चक्कर

सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआइ) के तरह शासकीय विभागों से जानकारी लेना तो दूर आरटीआइ लगाने में भी लोगों को पसीना आ रहा है। आवेदन के साथ आरटीआइ का निर्धारित शुक्ल अदा करने के लिए 10 रुपये का  पोस्टल ऑर्डर लगाना जरुरी है। लेकिन नगर में पोस्टल आर्डर नहीं मिलने से आम लोगों को आरटीआइ लगाने में दिक्कत आ रही है।

सरकारी महकमों में पारदर्शिता लाने के लिए आरटीआई कानून बना। इसके डर से भ्रष्टाचार करने वाले कांपते हैं। इसलिए सरकार ने इसका खर्चा भी बहुत कम रखा। मगर इस कानून का उपयोग करने के वाले आरटीआई एक्टिविस्टों को मुश्किलों से गुजरना पड़ रहा है। इन्हें ना तो डाकखानों में 10 रुपये के पोस्टल ऑर्डर मिल रहे हैं और ना ही राज्य सरकार के विभाग नकद करेंसी पर जन सूचना दे रहे हैं। पिछले एक साल से माखन नगर के डाकखाना में 10 रुपये के पोस्टल ऑर्डर गायब हैं। इस कारण आरटीआई का शुल्क जमा नहीं हो रहा है।

आरटीआई का शुल्क जमा कराने के लिए भारत सरकार ने 3 तरह की व्यवस्थाएं की हैं। इसमें पहला 10 रुपये का पोस्टल ऑर्डर, दूसरा बैंक का डीडी और तीसरा आवेदन पत्र के साथ 10 रुपये नकद जमा कराए जा सकते हैं। मगर हाल ही में प्रदेश सरकार ने एक शासनादेश जारी किया है। इसके तहत में आवेदन पत्र के साथ आप नकद धनराशि जमा नहीं करा सकते हैं। आवेदकों को अब बैंक डीडी या पोस्टल ऑर्डर से आरटीआई का शुल्क जमा कराना होगा।

महीनों से गायब हैं पोस्टल ऑर्डर

आरटीआई एक्टिविस्ट गोविंद यादव का कहना है कि वे पिछले एक साल से पोस्ट ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं। पोस्ट ऑफिस में वे 10 रुपये के पोस्टल ऑर्डर खोज रहे हैं मगर उन्हें नहीं मिल सके हैं। जिले से पोस्टल आर्डर बुलाने पड़ते हैं।

पहले पैसे जमा कराए कल आकर पोस्टल आर्डर ले जाए

जब देनवापोस्ट की टीम पोस्ट ऑफिस का जायजा लेने पहुंची तो एसपीएम मुकेश कटारे का अजीब ही बर्ताव रहा जब टीम ने ₹10 का पोस्टल आर्डर मांगना चाह तो उन्होंने पहले तो देने से मना कर दिया। फिर कहा कितने चाहिए हमारी टीम ने कहा 10 वाले 10 पोस्टल ऑर्डर चाहिए। तब एसपीएम ने जवाब दिया कि आप आज पैसे जमा कर जाइए कल जाकर पोस्टल आर्डर ले जाना।

पहले ऐसा नहीं था डाकखाना

सूत्रों की माने तो पहले नगर के डाकखाने में तमाम तरह सुविधाएं मौजूद थी । लेकिन जब से मुकेश कटारे ने नगर की पोस्ट ऑफिस का कार्यभार संभाला है, जब से डाकखाने में अवस्थाओं का आलम है। यहां पर कभी रसीदी  टिकट नहीं मिलती तो कभी पोस्टेज  टिकिट नदारत रहती है। रही पोस्टल आर्डर की बात तो जैसे नगर के डाकखाने में कसम खा रखी है कि माखननगर में पोस्टल आर्डर नहीं मिलेंगे।




एक शिक्षक पूरे विभाग पर भारी, अधिकारी भी उसके सामने भरते है पानी

“साविद्या या विमुक्तये.” उपनिषद की वाणी में विद्या वही है जो मनुष्य को मुक्त करे। लेकिन माखन नगर में पिछले दो दशक से पढ़ाई-लिखार्ई की बेहतरी के नाम पर जो बंदोबस्त चल रहा है, उससे तो लगता है कि पवारखेड़ा खुर्द के सरकारी प्राइमरी स्कूल और वहां के मास्साब ने पूरी तरह से शिक्षा के बंधन से अपने आप को  मुक्त ही कर लिया हैं और इस करेला जैसी व्यवस्था को नीम पर चढ़ाने की कसर अधिकारियों ने ऐसे शिक्षक पर कोई कार्यवाही नहीं करके पूरी कर ली।

बीस सालो कभी कभार देखा स्कूल का मुंह

हम बात कर रहे हैं शा. प्रा. शाला पवारखेड़ा खुर्द स्कूल की जहां पदस्थ शिक्षक चर्चा का विषय बना हुआ है। जिस शिक्षक राजेश मालवीय के बारे मे बताने जा रहे हैं वह विगत बीस वर्षों स्कूल कभी कभार गए। ज्यादा समय महानुभाव ने निर्वाचन कार्य को दिया। सैलरी लेते शिक्षा विभाग की लेकिन बजाते तहसील कार्यालय की ऐसे ही शिक्षकों ने विभाग को बदनाम करके रखा है। करे भी क्यों न इनकी तूती जो बोलती, इनसे अधिकारी तक डरते हैं। जब देनवा पोस्ट ने इन्वेस्टिगेशन किया तो पाया कि इनके नक्शे कदम पर तीन शिक्षक और चलते मिले जिन्होंने विभाग की आंखों में मिर्च झोंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पिंकी मीना सात साल से स्कूल ही नहीं पहुंची। स्वेता मिश्रा चार साल से छुट्टी ओर मेडिकल के सहारे जॉब कर रही है। अब बात कर ले अजय इरपांचे अभी कुछ वर्षों से अपनी सेवा तहसील कार्यालय देना शुरू किया है। इन्हें तहसील कार्यालय में अटैच करने का श्रेय भी राजेश मालवीय को ही जाता है।

सम्बीलियन एवं इंक्रीमेंट में संशय

यह बात समझ से परे है कि जिस शिक्षक ने लगातार शिक्षकीय कार्य को किया ही नहीं उसका विभाग सम्बीलियन कैसे हो गया और गौर करने वाली बात यह है कि हर साल इंक्रीमेंट भी मिल रहा है। जबकि कोई भी विभाग अपने कर्मचारी को इंक्रीमेंट उसके अच्छे काम के लिए देता है। लेकिन इनका उत्कृष्ट कार्य निर्वाचन एवं तहसील की सेवा हैं। फिर भी विभाग इन्हे इंक्रीमेंट क्यों दे रहा है यह समझ नहीं आ रहा है।

आर टी आई में खुलासा 11 सालो में मात्र 182 दिन ही पढ़ाया

जब आरटीआई एक्टिविस्ट गोविंद द्वारा आरटीआई लगाकर उक्त शिक्षक के बारे में जानकारी ली गई तो मालूम चला कि वह विगत 10 सालों में मात्र 182 दिन ही स्कूल में अपनी सेवा दी। वहीं कुछ महीनो से जिला स्तरीय अधिकारी विकासखंड के समस्त स्कूलों का निरीक्षण कर रहे हैं लेकिन उक्त शिक्षक के स्कूल में जाने की हिम्मत कोई भी अधिकारी नहीं उठा पाया।

अधिकारियों में निर्वाचन का इतना डर की आदेश देखते ही नहीं

निर्वाचन शाखा का सारा कार्य शिक्षक राजेश मालवीय के हाथों में है। स्वयं के आदेश भी उसी के द्वारा निकाला जाता है। शिक्षा विभाग आदेश निर्वाचन के आदेश तक पढ़ने की जहमत तक नहीं उठाता। देनवापोस्ट यह ऐसे ही नहीं कह रहा क्योंकि जिस शिक्षक को निर्वाचन शाखा ने कभी रिलीव ही नहीं किया फिर भी बार-बार निर्वाचन शाखा में बुलाने के आदेश क्यों जारी होते रहते हैं। वही एक आदेश में तो वर्तमान तहसीलदार अनिल पटेल भी यह स्वीकारा है कि यह आदेश उनकी जानकारी के बिना साइन कराया गया है। शिक्षा विभाग निर्वाचन द्वारा जारी आदेश को कभी ठीक से पड़ता ही नहीं क्या आदेश सही है या गलत है को अपनी मौन स्वीकृति दे देता है। अभी 10 जनवरी 2025 शिक्षक अजय अपाचे का निर्वाचन शाखा से रिलीव आदेश जारी होता है। जिसमें तहसील कार्यालय 6 जनवरी 2025 को उन्हें शाला साल में उपस्थिति के निर्देश दिए थे लेकिन आदेश 10 जनवरी 2025 को जारी होता है कैसे? यह अपने आप में एक सवाल हैं।

समग्र शिक्षा अभियान में शिक्षकों को गैर-शिक्षा के कामों से बचाने के पर्याप्त इंतजाम हैं।लेकिन जिला स्तर की ब्यूरोक्रेसी इनका पालन नहीं कर रही है। जब ही जिला शिक्षा अधिकारी एसपीएस विसेन का जबाव यह है कि तहसील हमारे अंडर में नहीं आती आप कलेक्टर मैडम से बात करे, कि शिक्षक स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं।




Narmadapuram News : नो लाख नहीं डेढ़ करोड़ का मामला कोष लेखा आयुक्त ने दिए जांच के आदेश

पूरा मामला मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के माखन नगर तहसील का है। यहां पर तहसील कार्यालय में पदस्थ कर्मचारियों के द्वारा सरकारी धन का गबन करने का मामला सामने आया है। Denvapost को सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकारी योजनाओं के तहत हितग्राहियों को दी जाने वाली करीब डेढ़ करोड़ रुपये की राशि का गबन किया है। मामला संज्ञान में आने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है।

जिले की माखन नगर तहसील में पदस्थ कर्मचारियों द्वारा शासन की विभिन्न योजनाओं के तहत हितग्राहियों को प्रदान की जानी वाली करीब डेढ़ करोड़ की बड़ी राशि का फर्जी तरीके से आहरण कर गंभीर भ्रष्टाचार किया गया है। जिले के लगभग हर विभाग में इस तरह के करोड़ों के घोटाले लगातार सामने आना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्न चिंन्ह खड़ा कर रहा है।  लगातार घोटाले उजागर होने से एक बात तो तय है कि, सत्ता के साथ प्रशासन भी मिलकर शासकीय राशि का दुरुपयोग कर रहे हैं। हालांकि आयुक्त कोष लेखा ने एक शिकायत पर संज्ञान लेते हुए है। नर्मदापुरम कलेक्टर सोनिया मीना को टीम गठित कर जांच करने के आदेश दे दिए है।

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ऐसे मामला सामने आया

Denvapost ने 10 सितंबर 2024 को खबर प्रकाशित की थी। जिसमें बाढ़ राहत की राशि में घोटाले का मामला सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था। जिसमे लाखों रूपए निजी खातों में ट्रांसफर करने की बात सामने आ रही थी। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तहसील के पटवारी एवं बाबू की मिली भगत से इस काम को अंजाम दिया गया है। उसके बाद सीताराम यादव के द्वारा 18 सितंबर 2024 को इसकी शिकायत आयुक्त कोष लेखा विभाग भोपाल को गई और मामला संज्ञान में आया। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक एस एफ आई सी डाटा एनालिसिस टीम ने आयुक्त को करीब डेढ़ करोड़ के संदिग्ध लेन देन का मामला होना बताया है। वहीं यह कारनामा वर्ष 2018-19 से 2022-23 यानि करीब 4 साल में किया गया है।

डोलरिया तहसील में भी हो चुका करोड़ों का घोटाला

डोलरिया तहसील के सहायक ग्रेड 3 नायब नाजिर अमित लौवंशी एवं चपरासी आशीष कहार ने तहसीलदार के हस्ताक्षर और पदमुद्रा का दुरुपयोग कर शासन द्वारा हितग्राहियों को बाढ़ आपदा के लिये दी जाने वाली राशि, किसानों को दी जाने वाली राशि, मृतकों के परिजनों को दी जाने वाली राशि में करीब 100 से ज्यादा किसानों और लोगों के फर्जी दस्तावेज और प्रकरण तैयार कर 2 करोड़ 23 लाख 35 हजार 863 रूपये की राशि आहरित की है। इन दोनों ने यह राशि अपने पत्नि, बच्चों के साथ-साथ रिश्तेदारों के खाते में ट्रांसफर कराकर शासन को चपत लगा दी। भृत्य और बाबू ने यह कारनामा वर्ष 2018-19 से 2022-23 यानि 4 साल में किया है।

कलेक्टर से नहीं हुआ संपर्क

जब denvapost टीम ने नर्मदापुरम कलेक्टर सोनिया मीना से इस सम्बन्ध फोन पर जानकारी प्राप्त करनी चाही तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया।




Narmadapuram News : फर्जी पत्रकार पत्रकारिता की आड़ में कर रहे दलाली

समाज के समाजीकरण तथा समय समय पर समाज के सन्दर्भ में सजग रहकर नागरिकों तथा शासनकर्ता व बुद्धिजीवी वर्गो में दायित्व बोध कराने की कला को पत्रकारिता की संज्ञा दी गयी है। समाजहित, राष्ट्रहित में सम्यक प्रकाशन को पत्रकारिता कहा जाता है। असत्य अशिव असुन्दर पर सत्यम शिवम् सुन्दरम की शंख ध्वनि ही पत्रकारिता है।

मनुष्य स्वाभाव के हीन व्यक्तियों को उत्तेजना देकर, हिंसा द्वेश फैलाकर, बडों की निंदाकर, लोगों की घरेलू बातों पर कुत्सित टीका टिप्पणी कर, अमोद प्रमोद का अभाव, अश्लीलता से पूर्ण करने की चेेष्टा कर तथा ऐसे ही अन्य उपायों से समाचार पत्रों की बिक्री और चैनलों का क्रेज तो बढाया जा सकता है। महामूर्ख धनी की प्रसशा की पुल बांध कर तथा स्वार्थ विशेष के लोगो के हित चिंतक बनकर भी रूपया कमाया जा सकता है।

देश भक्त बनकर भी स्वार्थ सिद्धि की जा सकती है। लेेकिन सब कुछ अगर पत्रकारिता के आड मे हो तो कितना शर्मनाक है। नर्मदापुरम क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह फैले तथाकथित, पत्रकार, पत्रकार शब्द के गौरव को नष्ट करने के लगे हुये है। क्षेत्र मे दर्जनों ऐसी गाडियाँ है जिनमें प्रेस अथवा पत्रकार लिखा हुआ है। वास्तविकता यह है। कि ऐसे लोग न किसी समाचार पत्र से जुडे हुये है। और न ही व पत्रकार है न उनका अखबार क्षेत्र में आता हैै। दलाली में जुटे तथाकथित पत्रकारों ने कर्मठ और निष्ठावान पत्रकारों को बदनाम करने की ठान ली है। कहीं लकडी कटान से अवैध वसूली तो कही लोगों को गुमराह कर दलाली से क्षेत्र के लोग देखकर हैरान हैं।

कुछ तथाकतिथ ऐसे भी पत्रकार पनप चुके हैं जो कि अपने लच्छेदार बातों से हाईफाई बताकर किसी का शस्त्र लाइसेंस बनवाने, जमीन का पट्टा करवाने, ठेका दिलाने, स्थानान्तरण करवाने अथवा रूकवाने आदि बहुत से कार्य करवाने आदि का ठेका लेकर अच्छी खासी दलाली चमका रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि  इनके बिछाये हुये जाल में वही फंसते हैं जो अपने को सबसे बड़ा सयाना समझते हैं। इन सयानों को यही तथाकथित पत्रकार खून चूस कर छोड देते हैं। जबकि इनकी असलियत की जांच की जाये तो यह तथाकथित पत्रकार लिखने में जीरो और तालमेल मिलाने में हीरो हैं।

पत्रकारिता का रौब दिखाकर पंचायत सचिवों से विज्ञापन के नाम पर वसूली करते हैं। जब कि देखा जाए तो इन्हीं तथाकथित पत्रकारों की यह घिनौनी करतूत असली पत्रकारों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। जब कभी पुलिस द्वारा वाहन चेकिंग अभियान चलाया जाता है तो प्रेस व पत्रकार लिखा होने का फायदा उठाकर यह तथाकथित पत्रकार बच जाते है, क्योंकि यह तथाकथित पत्रकार इतने शातिर हैं कि  इनकी लच्छेदार भाषा शैली तथा मिल बांट कर खाने वाली प्रणाली के चलते इनकी पुलिस विभाग से लेकर सभी महत्वपूर्ण विभागों तक पहुंच होती है। जबकी न तो इनके पास लाइसेन्स रहता है और न ही जिस गाड़ी से चलते हैं उसका बीमा।

इन फर्जी पत्रकारों तथा पत्रकारिता की आड़ में कर रहे दलाली वाले तथाकथित पत्रकारों की वजह से अपने पेसे को मिशन मान कर जुटे पत्रकारों की कलम भी कलंकित हो रही है।




Sehore News : शिवराज के जाने से छिटके वोटर ? बुधनी में 20 साल बाद कांग्रेस ने दी टक्कर

बुधनी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रामाकांत भार्गव ने जीत तो हासिल की, लेकिन कांग्रेस के उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। 23 नवंबर 2024 को हुए इस चुनाव में भाजपा को मात्र नौ प्रतिशत वोटों से जीत मिली, जबकि कुछ महीने पहले ही हुए विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान को लगभग 70% वोट मिले थे। इस बार भाजपा को 52% और कांग्रेस को 43% वोट मिले।

कांग्रेस के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी और भाजपा के वोट शेयर में गिरावट ने भाजपा के लिए चिंता का विषय पैदा कर दिया है। खासकर 136 पोलिंग बूथ पर मिली हार और 98 बूथ पर बेहद कम अंतर से जीत ने भाजपा के लिए आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी है।

20 साल बाद देखने को मिली ऐसी टक्कर

बुधनी विधानसभा में लगभग 20 साल बाद इतना रोमांचक मुकाबला देखने को मिला। रामाकांत भार्गव ने जीत तो हासिल की, लेकिन दोनों दलों के लिए यह चुनाव सीख देने वाला रहा। पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजों पर गौर करें तो कांग्रेस ने भले ही चुनाव हारा हो, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।

बीजेपी का प्रदर्शन ग्राफ गिरा

भाजपा के प्रदर्शन में गिरावट साफ दिखी। 2018 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 43 पोलिंग बूथ पर हार का सामना करना पड़ा था। 2023 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या घटकर 16 रह गई थी। लेकिन हाल ही में हुए उपचुनाव में भाजपा को 136 पोलिंग बूथ पर हार मिली। 16 से 136 तक पहुंचने वाली हार के आंकड़ों ने भाजपा के लिए आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी है।

98 बूथों पर आमने सामने का रहा मुकाबला

इस उपचुनाव में 98 पोलिंग बूथ ऐसे रहे, जहां दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर रही। इन बूथों पर जीत और हार का अंतर 50 वोटों से भी कम रहा। भाजपा 50 ऐसे बूथों पर जीती, जहां जीत का अंतर 50 से कम था। कांग्रेस 48 ऐसे बूथों पर जीती, जहां जीत का अंतर 50 से कम था। इन बूथों पर जीत-हार का अंतर 2 से लेकर 49 वोटों तक रहा। कई बूथ ऐसे रहे, जहां जीत का अंतर सिर्फ 2, 7, 9 और 10 वोटों का रहा। डोबा और महागांव बूथ पर भाजपा सिर्फ 2 वोटों से जीती। नारायणपुर में 13 वोट, ग्वाडिया में 6 वोट, जोशीपुरा में 10 वोट, बुधनी के पांच बूथों पर 30, 49, 6, 18, 35 वोटों से जीत मिली।

बारेला वोट ने भाजपा को दिलाई जीत

इस चुनाव में बारेला समाज के वोट किरार समाज के वोटों पर भारी पड़े। कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल किरार समाज से आते हैं। विधानसभा क्षेत्र में किरार समाज के लगभग 23,000 वोट हैं। ऐसा माना जा रहा था कि किरार वोट बैंक कांग्रेस के पक्ष में जाएगा। लेकिन राजकुमार पटेल को अपने समाज का पूरा समर्थन नहीं मिला। बारेला समाज के वोट भाजपा की तरफ चले गए। भाजपा प्रत्याशी को 38 पोलिंग बूथ पर बारेला समाज के 12,000 से ज्यादा वोट मिले। 16 अन्य बूथों पर बारेला समाज के 4,000 से ज्यादा वोट भाजपा को मिले। कुल मिलाकर भाजपा को बारेला समाज के 16,000 से ज्यादा वोट मिले, जो उसकी जीत की बड़ी वजह बने। किरार समाज में भी भाजपा ने सेंध लगाई। इस वजह से राजकुमार पटेल अपने गृह क्षेत्र से बड़ी बढ़त नहीं बना पाए।

सलकनपुर पंचायत के मतदाताओं ने भाजपा को 1 वोट से हराया

कांग्रेस को 48 पोलिंग बूथ पर 50 से भी कम वोटों से जीत मिली। कई बूथ ऐसे थे जहां जीत का अंतर सिर्फ 1, 2, 5, 7 और 11 वोटों का रहा। तीन बूथों पर 1 वोट और एक बूथ पर 2 वोटों से कांग्रेस जीती। सलकनपुर में 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से देवीलोक का निर्माण हो रहा है। लेकिन सलकनपुर पंचायत के मतदाताओं ने भाजपा को 1 वोट से हरा दिया। यह भाजपा के लिए चिंता का विषय है।




गांधी व्यक्ति नहीं, एक विचार

गांधीजी पल-पल विकसित होते रहे, यह भली-भांति समझ लेने की बात है। अगर हम इसे नहीं समझेंगे तो गांधीजी को जरा भी नहीं समझ सकेंगे। वे तो रोज-रोज बदलते, पल-पल विकसित होते रहे हैं। यह आदमी ऐसा नहीं था कि पुरानी किताब के संस्मरण ही निकालता रहे। कोई नहीं कह सकता कि आज वे होते तो कैसा मोड़ लेते। उन्होंने अमुक समय, अमुक बात कही थी, इसलिए आज भी वैसे काम को आशीर्वाद ही देंगे, ऐसा अनुमान लगाना अपने मतलब की बात होगी। मैं कहना चाहता हूं कि ऐसा अनुमान लगाने का किसी को हक नहीं। ‘लोकोत्तराणा चेतांसि को हि विज्ञातु-मर्हति’- लोकोत्तर पुरुष के चित की थाह कौन पा सकता है? इसलिए गांधीजी आज होते तो क्या करते और क्या न करते, इस तरह नहीं सोचना चाहिए।

यदि हम यह नहीं समझते, तो हम गांधीजी के साथ बहुत अन्याय करेंगे। उनसे हमें एक विचार मिल गया है, ऐसा समझकर अब हमें स्वतंत्र चिन्तन करना है। यदि हम उनके विचार को उनके शब्दों में और उनके कार्यों से सीमित कर डालेंगे, तो उनके साथ अन्याय कर बैठेंगे। गुजरात में जिसे ‘वेदिया’ कहते हैं, वैसे ‘वेदिया’ अर्थात शब्द को पकड़कर रखने वाले हम बन जायेंगे, तो गांधीजी के साथ अन्याय करेंगे।

स्थूल छोड़ो, सूक्ष्म पकड़ो – हमें महापुरूषों के विचार ही ग्रहण करने चाहिए, उनके स्थूल जीवन को न पकड़ रखें। ऐसा एक शास्त्र-वचन भी है। उसमें कहा गया है कि हमें महापुरूषों के वचनों का चिन्तन करना चाहिए, उनके स्थूल चरित्र का नहीं। इतना ही नहीं, वचनों का भी, जो उतम-से-उतम अर्थ हो सके, वही ग्रहण करें। इससे साफ है कि वचनों का जो कुछ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और शुद्ध-से-शुद्ध अर्थ निकलता हो, वही ग्रहण करना चाहिए। आज के विज्ञान युग में पुराणकाल का मनु और पुराना मार्क्स नहीं चलेगा। मैं नम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि गांधी भी आज ज्यों-का-त्यों नहीं चलेगा।

तब यह प्रश्न खड़ा होगा कि क्या आप गांधीजी से भी आगे बढ़ गये? तो हममें अत्यन्त नम्रतापूर्वक यह कहने का साहस होना चाहिए कि ‘हम गांधीजी के जमाने से आगे ही हैं।’ इसमें गांधीजी से आगे बढ़ जाने का

सवाल ही नहीं और न ऐसा करने की जरूरत ही है। बढ़े या घटे, यह तो भगवान तौलेगा। यह हमारे हाथ की बात नहीं। हमें उनसे बढ़ने की जरूरत नहीं, लेकिन हमारा जमाना उनके जमाने से आगे है। हमारे सामने नये दर्शन (क्षितिज) खड़े हो गये हैं। हमें यह समझना ही होगा। न समझेंगे तो जो काम करने की जवाबदारी हम पर आ पड़ी है, उसे हम निभा नहीं पायेंगे।

गांधीजी स्वयं तो इतने संवेदनशील थे कि नित्य-निरंतर परिस्थिति के अनुसार झट बदलते जाते थे। कभी भी एक शब्द से चिपके नहीं रहते थे। किसी को भी ऐसा भरोसा नहीं था कि आज गांधीजी ने यह रास्ता पकड़ा है, तो कल कौन-सा पकड़ेंगे, क्योंकि वे विकासशील पुरुष थे। उनका मन सदैव सत्य के शोध के विचार में ही रहता था। तो, मुझे कहना यह है कि गांधीजी सतत् परिवर्तनशील थे। इसलिए हमें आज की परिस्थिति के अनुसार स्वतंत्र चिंतन करते रहना चाहिए।

इस लेख के लेखक आचार्य विनोबा भावे हैं, वह भूदान आंदोलन के प्रणेता हैं।

(सप्रेस)




खबर का दिखाअसर : बुधनी पंचायत के सरपंच व सचिव से होगी 2 लाख 67 हजार की वसूली

denvapostexclusive : जनपद पंचायत माखन नगर की ग्राम पंचायत बुधनी में सरपंच व सचिव द्वारा शासकीय राशि का दुरुपयोग एवं गबन किया गया है। ऐसा एक नोटिस (Notice) ग्राम पंचायत बुधनी के सरपंच व सचिव को जिला पंचायत द्वारा जारी किया गया है। हमारे सुधी पाठकों को बता दे कि सरकार ने महिलाओं को सरपंच तो बना दिया लेकिन अभी तक उन्हें अधिकार ही नहीं दिला पाए। इसी का परिणाम बुधनी जैसी पंचायत हैं यहां पर महिला सरपंच पर रिकवरी निकली है। जब तक सरपंच पति पंचायत में दखल देते रहेंगे तब तक ऐसी अनियमितता पंचायत में होती ही रहेगी। अगर नर्मदापुरम जिले की महिला सरपंच पंचायत की जांच कराई जाए तो अधिकतर पंचायत में ऐसी अनियमितता मिलना स्वाभाविक हैं क्योंकि वहां महिला सरपंच नहीं उनके पति पंचायतो को चला रहे हैं।

देनवापोस्ट की खबर का दिखा असर

आपको बता दे की ग्राम पंचायत बुधनी में हो रहे भ्रष्टाचार की खबर देनवा पोस्ट में 16 जनवरी 2024 से तीन दिनों तक लगातार प्रकाशित की गई थी। उसके बाद ग्रामीणों द्वारा भी बार बार पंचायत में चल रहा है भ्रष्टाचार(corruption) की शिकायत की गई थी। उसके बाद खंड पंचायत अधिकारी द्वारा 6 मई 24को जांच की गई थी। जिसमें ग्राम पंचायत में उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर वित्तीय अनियमितता एवं शासकीय राशि का दुरुपयोग तथा गबन होना पाया गया।

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सरपंच सचिव से होगी 2 लाख 67 की वसूली

जिला पंचायत कार्यालय नर्मदापुरम ने मध्य प्रदेश  पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 89 के तहत ग्राम पंचायत बुधनी को नोटिस जारी किया। जिसमें बताया गया की पंचायत के द्वारा 2,67,880/- से सामग्री क्रय एवं अन्य भुगतान किया गया। जिसमें पंचायत द्वारा सामग्री के पूर्व पंचायत की बैठक में अनुमोदन नहीं किया गया है एवं प्राधिकृत अधिकारी से अनुमति भी नहीं ली गई। इस प्रकार सरपंच श्रीमती ज्योति चौहान, सचिव आनंदपुरी गोस्वामी एवं तात्कालिक सचिव प्रदीप शर्मा द्वारा गंभीर वित्तीय अनियमितता एवं शासकीय राशि का दुरुपयोग किया गया। वहीं तीनों मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993  की धारा 92 के तहत दोषी पाए गए। 24 सितंबर 2024 को सरपंच एवं सचिव को जिला पंचायत कार्यालय में उपस्थित होकर अपना जवाब प्रस्तुत करना है संतुष्टि पूर्वक जवाब नहीं होने पर तीनों से संयुक्त रूप से वसूली की कार्रवाई की जाएगी।

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उप सरपंच को मिला प्रभार

ग्राम पंचायत बुधनी में उपसरपंच पुष्पाबाई शर्मा को बुधनी सरपंच का प्रभार लेने के लिए जनपद पंचायत माखन नगर की ओर से एक अनुमोदन पत्र जारी किया गया। जिसमें बताया गया है वर्तमान सरपंच द्वारा अनियमितताएं की गई है एवं प्रधानमंत्री आवास के प्रकरणों को सरपंच द्वारा पूर्ण नहीं किया जा रहा है। इसलिए उपसरपंच पुष्पाबाई शर्मा को बुधनी सरपंच का प्रभार सौंपा जाए।




सोशल मीडिया पर सूची वायरल : तहसील क्षेत्र में बाढ़ राहत वितरण में बड़ा घोटाला!

Makhannagar News: बाढ़ राहत की राशि में घोटाले का मामला सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमे लाखों रूपए निजी खातों में ट्रांसफर करने की बात सामने आ रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तहसील के पटवारी एवं बाबू की मिली भगत से इस काम को अंजाम दिया गया है। तहसील कार्यालय में भी यह चर्चा आम हैं। सोशल मीडिया पर घोटाले की सूची खूब वायरल हो रही हैं।

फोटो: सोशल मीडिया

ऐसे मामला सामने आया

Denvapost को सूत्रों से जो जानकारी मिली उसके अनुसार ग्वालियर से ऑडिट टीम रिवेन्यू का ऑडिट करने माखन नगर आई। टीम को कुछ खातों में शंका हुई। जिसकी सूची बनाकर तहसीलदार को सौपी है। जिसमें करीब चार पांच खातों में बार बार बाढ़ राहत की राशी डाली गई है। यह करीब आठ लाख 68 हजार का मामला है।

फोटो: सोशल मीडिया

हर साल आडिट फिर भी तीन साल बाद पकड़ा घोटाला!

सूत्रों की माने तो मामले को रफा दफा करने की तैयारी है। क्योंकि तहसील का ऑडिट कलेक्टर एवं कमिश्नर द्वारा हर साल ऑडिट कराया जाता है। फिर भी यह पकड़ में नहीं आया आखिर ऐसा कैसे हुआ। ग्वालियर टीम हर तीन साल में ऑडिट करती है। यह वर्ष 2021 से 2023 के ऑडिट में निकला मामला है। अगर इससे पहले की जांच कराई जाए तो राशी बढ़ने अनुमान है। वैसे अभी ऑडिट टीम ने रिपोर्ट सबमिट नही की है।

फोटो: सोशल मीडिया

अभी मुझे कोई सूची नहीं मिली

जब देनवापोस्ट तहसीलदार सुनील गड़वाल से बात की तो उन्होंने ने बताया कि इस तरह की कोई सूची अभी मुझे नही मिली। ऑडिट रिपोर्ट एक महीने बाद आती है उसमें कुछ मिलेगा तो संबंधित पर कार्रवाई की जायेगी।

फोटो: सोशल मीडिया
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Narmadapuram News : स्कूलों में अटैचमेंट का खेल, शासन के निर्देश के बाद भी डटे शिक्षक

देनवापोस्ट एक्सक्लूसिव : प्रदेश के स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर स्कूलों में तैनात किए गए शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों में अटैच हैं। जिला शिक्षा अधिकारी के एक आदेश से शिक्षा विभाग एवं शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ है, डीईओ ने शिक्षा एवं अन्य विभागों में शिक्षकों के अटैचमेंट तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का आदेश जारी किया हैं।

इस आदेश से करीब आधा सैकड़ा से अधिक शिक्षक प्रभावित हुए जो सालों से अध्यापन के बजाय अटैचमेंट कराकर आराम की नौकरी करते हुए नेतागिरी कर रहे थे । डीईओ ने आदेश में यह भी कहा कि इस आदेश के बाद भी यदि शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्य में संलग्न किया जाता है और उनका वेतन भुगतान किया जाता है। तो इसके लिए संबंधित संपूर्ण प्राचार्य और विकासखंड शिक्षा अधिकारी जिम्मेदार होंगे ।

सूत्रों के मुताबिक जिले में करीब आधा सैकड़ा से अधिक शिक्षक ऐसे हैं, जो पिछले कई सालों से स्कूल की बजाय जिला शिक्षा विभाग और अन्य विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें से कई को ऐसे हैं जो अटैचमेंट के नाम पर केवल राजनीति कर रहे है । जिला पंचायत, एसडीएम कार्यालय, तहसील कार्यालय सहित अन्य विभागों में अटैचमेंट कराकर कतिपय शिक्षक आरामतलबी की नौकरी कर रहे है। इससे स्कूलों में अध्यापन कार्य तो प्रभावित हो ही रहा है और इसका सीधा असर बच्चों पर पढ़ रहा है। जिससे रिजल्ट खराब हो रहा है ,यही कारण है कि लोग शिक्षण संचनालय आयुक्त में इसको गंभीरता से लेते हुए शिक्षकों की अटैचमेंट समाप्त करने का निर्णय लिया है। जानकारी के मुताबिक कुछ समय पहले के प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इसको संज्ञान में लेकर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। अब देखना है की डीईओ के आदेश के बाद कितने शिक्षक अपनी मूल पद स्थापना पर वापस लौटते हैं।

लोक शिक्षा संरचनालय ने जारी किया ये आदेश

आयुक्त लोक शिक्षण संचनालय मध्यप्रदेश भोपाल ने आदेश जारी कर कहा कि जिला अंतर्गत विभाग  अथवा अन्य विभाग के किसी भी कार्यालय में शासकीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकीय संवर्ग  के लोकसेवकों को यदि संलग्न या आसंजित किया गया है, तो ऐसे समस्त शिक्षकों के संलग्न व आसंजित सभी आदेशों को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए और उन्हें मूल पदस्थापना में अध्यापन कार्य कराए जाने हेतु  कार्य मुक्त करें। आदेश की पश्चात जिला अंतर्गत शासकीय विद्यालय में पत्र शिक्षकों को गैर शैक्षिक कारण यदि संलग्न व आसंजन किया जाता है तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जावेगी और वही उत्तरदायी होंगे।

तीन शिक्षको को डीईओ आफिस से हटाया

जेडी भावना दुबे ने denvapost को बताया कि अभी तीन शिक्षक डीईओ आफिस में अटैच थे उन्हे मूल पदस्थापना में भेजा गया है। बाकी पर कार्यवाही जारी है।




Denvapost Exclusive : खनन गतिविधियों पर कर लगाने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

ऐसा अक्सर नहीं होता कि राजकोषीय संघवाद को न्यायिक चर्चा में प्रमुख स्थान मिले। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, 8:1 के भारी बहुमत से यह कहना कि राज्य खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं, वास्तव में एक ऐतिहासिक फैसला है, क्योंकि यह उनके विधायी क्षेत्र को संसद के हस्तक्षेप से बचाता है। दशकों से, यह माना जाता था कि केंद्रीय कानून, खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के प्रचलन के कारण राज्यों को अपनी भूमि से निकाले गए खनिज संसाधनों पर कोई भी कर लगाने की शक्ति से वंचित कर दिया गया था। खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में प्रविष्टि 50 के माध्यम से राज्यों को प्रदान किया गया है, इसे “खनिज विकास से संबंधित कानून द्वारा संसद द्वारा लगाई गई किसी भी सीमा के अधीन” बनाया गया था। केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि उसके 1957 के कानून का अस्तित्व ही खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति पर एक सीमा थी, लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश, डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ ने बेंच के लिए लिखते हुए अधिनियम के प्रावधानों की जांच की और निष्कर्ष निकाला कि इसमें ऐसी कोई सीमा नहीं है। 1957 के अधिनियम द्वारा परिकल्पित रॉयल्टी को बिल्कुल भी कर नहीं माना गया था। संघ उम्मीद कर रहा था कि एक बार रॉयल्टी को कर के रूप में स्वीकार कर लेने के बाद, यह पूरी तरह से क्षेत्र पर कब्जा कर लेगा और इस तरह खनिज अधिकारों पर कर लगाने के लिए राज्यों की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। हालाँकि, न्यायालय ने रॉयल्टी को खनिज अधिकारों के लिए एक संविदात्मक विचार के रूप में देखने का फैसला किया। साथ ही फैसला सुनाया कि राज्य प्रविष्टि 49 के तहत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं, जो भूमि पर कर लगाने की एक सामान्य शक्ति है।

राजकोषीय संघवाद और स्वायत्तता के समर्थक विशेष रूप से इस तथ्य का स्वागत करेंगे कि यह निर्णय राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण नया कराधान मार्ग खोलता है और यह अवलोकन कि राज्यों की कराधान शक्तियों में कोई भी कमी कल्याणकारी योजनाओं और सेवाओं को वितरित करने की उनकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। हालाँकि, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने अपनी असहमति में तर्क दिया कि यदि न्यायालय ने केंद्रीय कानून को राज्य की कराधान शक्तियों पर एक सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी, तो इसके अवांछनीय परिणाम होंगे क्योंकि राज्य अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करने के लिए एक अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा में प्रवेश करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप खनिजों की कीमत में असमान और असंगठित वृद्धि; और खनिजों के खरीदार बहुत अधिक भुगतान करेगें, जिससे औद्योगिक उत्पादों की कीमत में वृद्धि होगी। इसके अलावा, मध्यस्थता के लिए राष्ट्रीय बाजार का उपयोग किया जा सकता है। इन निहितार्थों को देखते हुए, यह संभव है कि केंद्र राज्यों की कराधान शक्ति पर स्पष्ट सीमाएं लगाने या उन्हें खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकने के लिए कानून में संशोधन करने की मांग कर सकता है। हालाँकि, इस तरह के कदम से खनन गतिविधियों को कर के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जा सकता है, क्योंकि बहुमत ने यह भी माना है कि संसद में खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता का अभाव है।