
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक का आंदोलन अब राजनीतिक रूप से भी केंद्र में आ गया है। अनशन के 21वें दिन के बीच 1984 की एक ऐतिहासिक घटना फिर चर्चा में है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुंचकर वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल का अनशन समाप्त करवाने गई थीं।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ के सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी अब सोनम वांगचुक के आंदोलन के प्रति खुलकर समर्थन जताना शुरू कर दिया है।
जंतर-मंतर पर बढ़ रहा समर्थन
सोनम वांगचुक पिछले तीन सप्ताह से जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनका कहना है कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
लगातार अनशन के कारण उनकी सेहत बिगड़ती जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार उनका वजन करीब 10 किलोग्राम तक कम हो चुका है और उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
शुरुआत में दूरी, अब कांग्रेस का खुला समर्थन
आंदोलन के शुरुआती दिनों में कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी थी, जबकि आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दल पहले से समर्थन दे रहे थे।
अब कांग्रेस ने भी अपना रुख बदलते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता पवन खेड़ा को जंतर-मंतर भेजा। उन्होंने सोनम वांगचुक और आंदोलन से जुड़े लोगों से मुलाकात की तथा उनकी सेहत को देखते हुए अनशन समाप्त करने की अपील भी की।
42 साल पुरानी घटना क्यों आई चर्चा में?
साल 1984 में लद्दाख में अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन का नेतृत्व सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल कर रहे थे।
उन्होंने अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी। आंदोलन का दबाव बढ़ने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं दिल्ली से लेह पहुंचीं, सोनम वांगयाल से मुलाकात की और उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने का भरोसा दिया। इसके बाद सोनम वांगयाल ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।
हालांकि उसी वर्ष अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद के वर्षों में आंदोलन जारी रहा और 1989 में केंद्र सरकार ने लद्दाख की आठ समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्रदान किया।
कौन थे सोनम वांगयाल?
सोनम वांगयाल लद्दाख की राजनीति का एक प्रमुख चेहरा रहे। वे:
- 1957 से 1967 तक जम्मू-कश्मीर विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य रहे।
- 1967 और 1972 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए।
- 1975 में जम्मू-कश्मीर सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
- बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस से भी जुड़े।
- लद्दाख के विभिन्न समुदायों को ST दर्जा दिलाने के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कांग्रेस ने क्यों बदला रुख?
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने 1984 की उस घटना का उल्लेख किया, जब इंदिरा गांधी स्वयं लेह जाकर सोनम वांगयाल से मिली थीं। इसके बाद पार्टी ने आंदोलन के प्रति अपना रुख बदला और सार्वजनिक रूप से समर्थन देना शुरू किया।
हालांकि कांग्रेस की ओर से इस संबंध में आधिकारिक विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है।
सोनम वांगचुक कौन हैं?
सोनम वांगचुक एक शिक्षाविद, नवाचारकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।
2019 में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद भी उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारों और स्थानीय हितों से जुड़े कई मुद्दों पर आंदोलन किए।
20 जुलाई तक जारी रहेगा अनशन
सोनम वांगचुक ने संकेत दिया है कि वे 20 जुलाई तक अपना अनशन जारी रखेंगे। इसी दिन संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ संसद मार्च का भी आह्वान किया गया है।
इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर डॉक्टर लगातार उनकी स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। देशभर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कोई समाधान निकलता है या आंदोलन और तेज होता है।

