हरदा में तबादला, नर्मदापुरम में डटा शिक्षक! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा निर्वाचन ड्यूटी का खेल?

दस साल से स्कूल से ज्यादा तहसील कार्यालय में सेवाएं; शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

नर्मदापुरम। मध्यप्रदेश के शिक्षा विभाग में स्थानांतरण नीति और निर्वाचन कार्य की आड़ में नियमों के पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। हरदा जिले में स्थानांतरित किए गए एक शिक्षक आज भी नर्मदापुरम जिले में सक्रिय हैं। मामला केवल एक शिक्षक तक सीमित नहीं बताया जा रहा, बल्कि ऐसे कई शिक्षकों की ओर संकेत करता है जो वर्षों से निर्वाचन कार्य के नाम पर विद्यालयों से दूर रहकर तहसील कार्यालयों में सेवाएं दे रहे हैं। यदि दस्तावेजों में सामने आए तथ्य सही हैं तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, बल्कि मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियमों, स्थानांतरण नीति और बच्चों के शिक्षा के अधिकार पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

मामला बनखेड़ी विकासखंड के तिंदवाड़ा माध्यमिक विद्यालय में पदस्थ शिक्षक उमाकांत मिश्रा से जुड़ा है। शासन ने 19 जून 2025 को उनका स्थानांतरण हरदा जिले के आदमपुर प्राथमिक विद्यालय में कर दिया था। सूत्रों के अनुसार शिक्षक ने स्थानांतरण के विरुद्ध उच्च न्यायालय में चार अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कीं। इन याचिकाओं में निर्वाचन कार्य में उनकी सेवाओं का भी उल्लेख किया गया था।

जानकारी के अनुसार, उच्च न्यायालय ने 11 फरवरी 2026 को WP क्रमांक 31604/2025 सहित संबंधित प्रकरणों में आदेश पारित कर दिया था। इसके बाद नियमानुसार शिक्षक को हरदा जिले के आदमपुर विद्यालय में कार्यभार ग्रहण करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आरोप है कि उन्होंने विभाग को न्यायालय के अंतिम आदेश की जानकारी भी नहीं दी और न ही नए विद्यालय में आमद दर्ज कराई।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिक्षक ने नए विद्यालय में कार्यभार ग्रहण नहीं किया, तो फरवरी के बाद से उनका वेतन किस आधार पर जारी होता रहा? इस संबंध में जब संकुल प्राचार्य पी.डी. शर्मा से चर्चा की गई तो उनका स्पष्ट कहना था कि उन्होंने संबंधित शिक्षक को ज्वाइन नहीं कराया है और न ही उनके वेतन का भुगतान उनके स्तर से किया जा रहा है।

यहीं से मामला और अधिक गंभीर हो जाता है। यदि संकुल प्राचार्य ने न तो ज्वाइन कराया और न वेतन निकाला, तो फिर शिक्षक की उपस्थिति किस विद्यालय से दर्ज हो रही थी? वेतन किस कार्यालय से स्वीकृत हुआ? और इसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी बनती है?

आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार शिक्षक वर्ष 2015 से लगातार तहसील कार्यालय बनखेड़ी में निर्वाचन संबंधी कार्यों में संलग्न हैं। दस्तावेज बताते हैं कि जैसे ही उच्च न्यायालय से प्रारंभिक राहत मिली, शिक्षक ने 5 जुलाई 2025 को विद्यालय में उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद 3 नवंबर 2025 को निर्वाचन संबंधी आदेश प्राप्त होते ही पुनः तहसील कार्यालय पहुंच गए और तब से लगातार वहीं कार्यरत बताए जा रहे हैं।

आरटीआई में मिले आदेशों का अध्ययन कई सवाल खड़े करता है। 21 जनवरी 2020 को संकुल शासकीय कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय, बनखेड़ी द्वारा जारी आदेश क्रमांक 566/कार्यभार/स्थाना./2019 में शिक्षक को तहसील कार्यालय में उपस्थिति देने के निर्देश दिए गए। इसके बाद 19 दिसंबर 2020 को तहसील कार्यालय द्वारा जारी पत्र क्रमांक 3095/कानूनगो/2020 के माध्यम से उन्हें केवल तीन दिनों के लिए विद्यालय भेजा गया, जिसमें एक दिन रविवार भी शामिल था। इसके तुरंत बाद 23 दिसंबर 2020 को पुनः आदेश जारी कर उन्हें तहसील कार्यालय में संलग्न कर लिया गया।

इसी प्रकार 12 अगस्त 2024 को तहसील कार्यालय ने उन्हें विद्यालय भेजने का आदेश जारी किया, लेकिन अगले ही दिन 13 अगस्त 2024 को पुनः तहसील कार्यालय में बुला लिया गया। इन आदेशों की श्रृंखला यह संकेत देती है कि विद्यालय में उपस्थिति महज औपचारिकता बनकर रह गई, जबकि वास्तविक सेवाएं लंबे समय से तहसील कार्यालय में ली जाती रहीं।

निर्वाचन कार्य लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और आवश्यकता पड़ने पर शिक्षकों की सेवाएं निर्वाचन आयोग द्वारा ली जा सकती हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कोई शिक्षक वर्षों तक लगातार निर्वाचन कार्य के नाम पर विद्यालय से बाहर रह सकता है? क्या निर्वाचन संबंधी दायित्व स्थायी प्रतिनियुक्ति का आधार बन सकते हैं? यदि नहीं, तो आखिर यह व्यवस्था किसके आदेश और संरक्षण में चलती रही?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का मूल उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और नियमित शिक्षा उपलब्ध कराना है। जब किसी विद्यालय का शिक्षक वर्षों तक विद्यालय में उपलब्ध ही नहीं रहेगा, तब सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों का होगा। शिक्षक का मूल दायित्व शिक्षण कार्य है, न कि स्थायी रूप से किसी अन्य कार्यालय में सेवाएं देना। यदि किसी विद्यालय में शिक्षक पदस्थ है तो उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी उसी विद्यालय में रहकर विद्यार्थियों को शिक्षा देना है।

त्रों का दावा है कि केवल उमाकांत मिश्रा ही नहीं, बल्कि ऐसे लगभग छह अन्य शिक्षक भी हैं जो पिछले कई वर्षों से निर्वाचन कार्य के नाम पर विद्यालयों से अनुपस्थित रहकर अन्य कार्यालयों में कार्य कर रहे हैं। यदि यह तथ्य सही हैं तो यह पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी एल.एन. प्रजापति ने कहा कि, “मैं पूरे मामले की जांच कराता हूं। यदि संबंधित शिक्षक स्थानांतरण के बाद भी नियमों के विपरीत यहां रुके हुए हैं तो तत्काल कार्रवाई की जाएगी। यह भी देखा जाएगा कि वे किस आधार पर यहां कार्यरत रहे।”

अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा विभाग केवल जांच की औपचारिकता करता है या वास्तव में यह पता लगाएगा कि स्थानांतरण आदेश के बाद भी शिक्षक किसके संरक्षण में नर्मदापुरम में कार्यरत रहे, उनकी उपस्थिति किसने प्रमाणित की, वेतन किसने स्वीकृत किया और वर्षों से निर्वाचन कार्य के नाम पर विद्यालयों से दूर रहने की अनुमति किन अधिकारियों ने दी।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक शिक्षक का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही तय करने वाला प्रकरण साबित हो सकता है।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों, आरटीआई से प्राप्त जानकारी, संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक बयानों तथा विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है। समाचार में वर्णित तथ्यों एवं आरोपों की निष्पक्ष जांच संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना शेष है। प्रकाशित सामग्री का उद्देश्य जनहित से जुड़े प्रश्नों को सामने लाना है, किसी व्यक्ति या संस्था की छवि धूमिल करना नहीं। यदि संबंधित पक्ष इस संबंध में अपना स्पष्टीकरण या पक्ष प्रस्तुत करना चाहता है, तो उसे यथावत प्रकाशित किया जाएगा।

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