
माखननगर । लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत को लोकतंत्र की नर्सरी कहा जाता है। यहां सरपंच, सचिव और पंच मिलकर गांव के विकास की गाड़ी चलाते हैं। लेकिन बुधनी ग्राम पंचायत में लगता है कि इस गाड़ी के कुछ पहियों को वर्षों पहले ही निकालकर किनारे रख दिया गया है। कारण यह है कि पंचायत के करीब 25 पंचों को पिछले चार साल से उनका मानदेय नहीं मिला, जबकि सरपंच मानदेय समय पर निकलता रहा।
अब सवाल यह है कि गांव के विकास की बैठकों में हाथ उठाने वाले पंच क्या केवल सजावट के लिए हैं? क्या उनकी भूमिका सिर्फ बैठक की फोटो में कुर्सी भरने तक सीमित है? या फिर पंचायत व्यवस्था ने उन्हें ऐसा “मानद” पद मान लिया है, जिसमें “मान” तो दूर, “देय” भी गायब हो गया?
पंचों को सालाना मात्र 600 रुपये मानदेय मिलना है। यानी चार साल में कुल 2400 रुपये। यह वह राशि है जिसे आजकल शहरों में लोग एक बार दोस्तों के साथ होटल में खाना खाकर खर्च कर देते हैं। लेकिन ग्राम पंचायत बुधनी में यही 2400 रुपये शायद किसी खजाने की चाबी बन गए हैं, जिसे खोलने के लिए चार साल भी कम पड़ गए।
पंच पार्वती दुबे के पति तुलसीराम दुबे ने जब मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत की तो उम्मीद जगी कि शायद अब व्यवस्था की नींद खुलेगी। लेकिन शिकायत के बाद भी भुगतान नहीं हुआ। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि यदि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत भी किसी फाइल के नीचे दब जाए तो फिर आम ग्रामीण किस दरवाजे पर जाए?
पंचों का कहना है कि उन्हें लगातार आश्वासन मिलता रहा। कभी कहा गया कि प्रक्रिया चल रही है, कभी बताया गया कि तकनीकी समस्या है। अब नया तर्क सामने आया है कि ऑपरेटर नहीं था, इसलिए भुगतान नहीं हो पाया।
यह तर्क सुनकर गांव के लोग भी हैरान हैं। क्योंकि इसी पंचायत में अन्य भुगतान नियमित रूप से होते रहे। यदि ऑपरेटर नहीं था तो क्या कंप्यूटर केवल पंचों का भुगतान करते समय ही बंद हो जाता था? क्या सिस्टम को भी पता था कि सामने पंचों की फाइल है, इसलिए उसने काम करने से इंकार कर दिया?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन पंचों के 2400 रुपये चार साल में नहीं निकल पाए, वहीं पंचायत में सरपंच मानदेय का करीब 1 लाख 87 हजार रुपये समय पर निकलता रहा। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि पंचायत के कंप्यूटर, बैंकिंग सिस्टम और प्रशासनिक मशीनरी को सरपंच मानदेय का रास्ता अच्छी तरह याद था, लेकिन पंचों के भुगतान वाली गली का नक्शा कहीं खो गया था।
लोकतंत्र की यह भी एक खूबसूरती है कि चुनाव के समय पंचों को गांव की सरकार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जाता है। उन्हें विकास योजनाओं की निगरानी, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और जनता की आवाज माना जाता है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनकी हैसियत शायद उस बल्ब जैसी हो जाती है, जिसे जरूरत पड़ने पर जलाया जाए और बाकी समय बंद रखा जाए।
पंचायत सचिव रूपनारायण त्रिवेदी का कहना है कि चार्ज लेने के बाद उन्हें पता चला कि भुगतान नहीं हुआ है और जल्द ही पंचों के वेंडर बनाकर भुगतान किया जाएगा। यह सुनकर राहत जरूर मिलती है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि चार साल तक किसी को यह पता क्यों नहीं चला कि पंचायत के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को उनका अधिकार नहीं मिला?
क्या पंचायत की बैठकों में कभी यह मुद्दा नहीं उठा? क्या किसी ऑडिट में यह तथ्य सामने नहीं आया? क्या जनपद पंचायत और जिला स्तर पर इसकी समीक्षा नहीं हुई? यदि हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मामले में पंचायत इंस्पेक्टर हरि प्रसाद बरेले का कहना है कि पंचायत को पंच मानदेय के लिए राशि समय पर जारी की गई है। यदि पंचायत ने भुगतान नहीं किया है तो कार्रवाई होगी।
यहीं से कहानी और रोचक हो जाती है। यदि राशि समय पर पंचायत को मिल गई थी तो फिर वह गई कहां? क्या वह किसी फाइल में विश्राम कर रही थी? क्या वह किसी खाते में ध्यानमग्न बैठी थी? या फिर वह भी चार साल तक ऑपरेटर की प्रतीक्षा करती रही?
ग्राम पंचायतों में अक्सर यह कहा जाता है कि वित्तीय संसाधनों की कमी है, स्टाफ की कमी है और तकनीकी बाधाएं हैं। लेकिन जब बात जनप्रतिनिधियों के वैधानिक अधिकारों की हो तो ऐसी दलीलें जवाब से ज्यादा बहाने लगती हैं।
असल समस्या केवल 2400 रुपये की नहीं है। यह सम्मान और जवाबदेही का प्रश्न है। यदि गांव के चुने हुए पंचों को चार साल तक उनका वैधानिक मानदेय नहीं मिल सकता, तो फिर पंचायत राज व्यवस्था की पारदर्शिता और संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
विडंबना देखिए, पंचों को मिलने वाला मानदेय इतना कम है कि उससे शायद साल भर की मोबाइल रिचार्ज योजना भी पूरी न हो। फिर भी उसका भुगतान वर्षों तक लंबित रखा गया। इससे यह संदेश जाता है कि पंचायत व्यवस्था में सबसे कमजोर कड़ी वही है, जिसकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है।
बुधनी पंचायत का यह मामला केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें छोटे अधिकारों को महत्वहीन मान लिया जाता है। जबकि लोकतंत्र की मजबूती सबसे निचले स्तर के प्रतिनिधियों के सम्मान और अधिकारों से ही तय होती है।
अब देखना यह है कि पंचों को उनका चार साल पुराना मानदेय वास्तव में कब मिलता है और जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं। क्योंकि यदि इस मामले में भी केवल आश्वासन ही मिलता रहा, तो फिर पंचों को मिलने वाला मानदेय नहीं, बल्कि व्यवस्था का व्यंग्य ही सबसे बड़ा भुगतान माना जाएगा।
आखिर में एक सवाल— यदि 2400 रुपये देने में चार साल लग गए, तो सोचिए करोड़ों की योजनाओं का हिसाब कितनी तेजी से चलता होगा? लोकतंत्र के इस गणित का उत्तर शायद वही लोग दे सकते हैं, जिनके लिए पंचों का मानदेय चार साल तक “प्रोसेस में” रहा, लेकिन बाकी भुगतान “समय पर” होते रहे।