विश्व पर्यावरण दिवस:वृक्षारोपण का मौसम प्रकृति से तय होता है, कैलेंडर से नहीं

हर वर्ष 5 जून को पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। सरकारी विभाग, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक बड़े उत्साह के साथ पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर हजारों तस्वीरें दिखाई दी, जिनमें लोग पौधे लगाते हुए नजर आते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल पौधा लगा देना ही पर्यावरण संरक्षण है? यदि लगाया गया पौधा कुछ दिनों बाद ही सूख जाए तो क्या उस पौधारोपण का कोई अर्थ रह जाता है?

भारत के अधिकांश उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में जून का पहला सप्ताह भीषण गर्मी और लू का समय होता है। तापमान कई स्थानों पर 42 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। धरती तप रही होती है, मिट्टी में नमी नहीं होती और जलस्रोत सिकुड़ चुके होते हैं। ऐसे में नवरोपित पौधों का जीवित रहना अत्यंत कठिन हो जाता है। यही कारण है कि अनेक पर्यावरणविद वर्षों से यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टि से उचित है?

पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी. पाण्डे का स्पष्ट मत है कि जून के प्रथम सप्ताह में पौधारोपण करना पौधों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों में उन्हें संघर्ष के लिए छोड़ देने जैसा है। उनका कहना है कि वृक्षारोपण का सबसे उपयुक्त समय मानसून शुरू होने के लगभग 10 से 12 दिन बाद होता है। तब तक धरती पर्याप्त जल ग्रहण कर चुकी होती है, मिट्टी में नमी स्थिर हो जाती है और पौधों की जड़ों को फैलने तथा स्थापित होने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है।

वास्तव में पौधारोपण केवल गड्ढा खोदकर पौधा लगाने का नाम नहीं है। पौधे के जीवित रहने के लिए मिट्टी की नमी, तापमान, जल उपलब्धता और देखभाल जैसी अनेक परिस्थितियां आवश्यक होती हैं। जब कोई पौधा नई जगह लगाया जाता है तो उसकी जड़ें उस वातावरण के अनुकूल होने में समय लेती हैं। यदि उसी दौरान उसे अत्यधिक गर्मी, सूखी हवाओं और जल संकट का सामना करना पड़े तो उसके जीवित रहने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

दुर्भाग्य से हमारे यहां पौधारोपण को अक्सर एक कार्यक्रम या अभियान के रूप में देखा जाता है, परिणाम के रूप में नहीं। विश्व पर्यावरण दिवस पर हजारों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद उनमें से कितने पौधे जीवित बचे, इसकी समीक्षा शायद ही कभी होती है। सरकारी आंकड़ों में पौधे लगाने की संख्या दर्ज हो जाती है, लेकिन पौधों के संरक्षण और जीवित रहने की दर पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि वृक्षारोपण केवल संख्या का खेल नहीं है। यदि एक हजार पौधे लगाए जाएं और उनमें से केवल सौ जीवित रहें, तो वास्तविक उपलब्धि सौ पौधों की ही मानी जाएगी। दूसरी ओर यदि उचित मौसम में सौ पौधे लगाए जाएं और उनमें से अस्सी या नब्बे जीवित रहें, तो वह कहीं अधिक प्रभावी और उपयोगी प्रयास होगा।

विश्व पर्यावरण दिवस की मूल भावना पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करना है। इसका उद्देश्य यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में केवल पौधे लगाए जाएं। यदि 5 जून को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना है तो उस दिन जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, प्लास्टिक प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा बचत और वृक्षों की सुरक्षा जैसे विषयों पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए। पौधारोपण का वास्तविक कार्य स्थानीय जलवायु और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।

भारत में परंपरागत रूप से भी वृक्षारोपण का संबंध वर्षा ऋतु से रहा है। ग्रामीण समाज में सावन और भादो के महीनों को पौधे लगाने का सर्वोत्तम समय माना जाता रहा है। उस समय मिट्टी नम रहती है, नियमित वर्षा होती है और पौधों को अतिरिक्त सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि पुराने समय में लगाए गए अनेक विशाल वृक्ष वर्षा ऋतु में ही रोपे गए थे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पौधारोपण अभियानों को वैज्ञानिक आधार पर संचालित किया जाए। किसी भी जिले या क्षेत्र में स्थानीय मौसम, मिट्टी की स्थिति और वर्षा के पैटर्न को ध्यान में रखकर वृक्षारोपण की योजना बनाई जानी चाहिए। पौधे लगाने से पहले गड्ढों की तैयारी, पौधों की प्रजाति का चयन और बाद की देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। केवल पौधा लगाने की तस्वीर खिंचवाकर अभियान पूरा मान लेना पर्यावरण संरक्षण नहीं है।

इसके साथ ही पौधारोपण के बाद कम से कम तीन वर्षों तक पौधों की निगरानी और संरक्षण की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। पौधों को पानी देना, पशुओं से सुरक्षा करना, समय-समय पर खाद उपलब्ध कराना और उनकी वृद्धि का रिकॉर्ड रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उन्हें लगाना। वास्तव में वृक्षारोपण का मूल्यांकन पौधे लगाने की संख्या से नहीं, बल्कि जीवित बचे वृक्षों की संख्या से होना चाहिए।

विश्व पर्यावरण दिवस पर यह बहस जरूरी है कि क्या हम पर्यावरण संरक्षण को गंभीरता से ले रहे हैं या केवल प्रतीकात्मक गतिविधियों तक सीमित हैं। यदि हमारा उद्देश्य वास्तव में हरित आवरण बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करना है, तो हमें पौधारोपण को मौसम, विज्ञान और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप करना होगा।

पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली जिम्मेदारी है। 5 जून को जागरूकता का दिन बनाया जा सकता है, संकल्प का दिन बनाया जा सकता है, लेकिन वृक्षारोपण का समय प्रकृति तय करती है, कैलेंडर नहीं। यदि हम प्रकृति के नियमों का सम्मान करेंगे, तभी लगाए गए पौधे वृक्ष बनेंगे और आने वाली पीढ़ियों को छाया, ऑक्सीजन और जीवन प्रदान कर सकेंगे।

विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि हम केवल पौधे नहीं लगाएंगे, बल्कि उन्हें जीवित भी रखेंगे। क्योंकि पर्यावरण को तस्वीरों में नहीं, धरती पर खड़े जीवित वृक्षों की आवश्यकता है।

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