सुप्रीम कोर्ट (supreme court) का ताज़ा निर्णय: भारत में जमानत का प्रश्न हमेशा से ही न्यायिक विमर्श का एक संवेदनशील और बहस योग्य विषय रहा है। जमानत का मूलभूत सिद्धांत यह है कि “बेल एक नियम है और जेल अपवाद”। यह सिद्धांत केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की आत्मा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केरल में 2021 में हुई एसडीपीआई नेता के.एस. शान की हत्या के मामले में पाँच आरोपियों की जमानत बहाल करते हुए इस सिद्धांत को एक बार फिर रेखांकित किया।

इस निर्णय का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण सामने आए थे—
- निचली अदालत (सत्र न्यायालय) का दृष्टिकोण, जिसने आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रहने और लोक अभियोजक की आपत्ति न होने के आधार पर जमानत दी।
- उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण, जिसने आपराधिक पृष्ठभूमि और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका के आधार पर जमानत रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने अंततः कहा कि सिर्फ आपराधिक पृष्ठभूमि या आशंका मात्र जमानत रद्द करने का ठोस आधार नहीं हो सकती।
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केस की पृष्ठभूमि
दिसंबर 2021 में केरल के अलाप्पुझा ज़िले में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के ज़िला सचिव के.एस. शान की निर्मम हत्या कर दी गई। वह मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे, तभी उन पर घात लगाकर हमला किया गया। यह हत्या कथित तौर पर राजनीतिक प्रतिशोध की पृष्ठभूमि में हुई थी, क्योंकि इससे एक दिन पहले ही एक आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या हुई थी। पुलिस ने इस मामले में कुल 10 लोगों को आरोपी बनाया। इनमें से पाँच को 2022 में सत्र न्यायालय ने जमानत दी थी। लेकिन 2024 में केरल उच्च न्यायालय ने इस जमानत आदेश को रद्द कर दिया।
निचली अदालत (सत्र न्यायालय) का दृष्टिकोण
सत्र न्यायालय ने जब पाँच आरोपियों को जमानत दी, तब उसने निम्नलिखित तर्क दिए:
- आरोपी पहले ही एक वर्ष से अधिक समय जेल में रह चुके हैं।
- लोक अभियोजक (Public Prosecutor) ने जमानत पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
- मुक़दमे के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं है, इसलिए विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं।
यह तर्क विचाराधीन कैदियों के अधिकार को केंद्र में रखकर दिया गया था।
उच्च न्यायालय का निर्णय
2024 में केरल उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय का आदेश पलट दिया। उच्च न्यायालय ने कहा:
- सत्र न्यायाधीश ने “यांत्रिक ढंग” से जमानत दी।
- इस बात की गंभीर आशंका है कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।
- उनका आपराधिक इतिहास यह दिखाता है कि उन्हें खुला छोड़ना सामाजिक सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है।
इसलिए, उच्च न्यायालय ने पाँचों की जमानत रद्द कर दी।
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सुप्रीम कोर्ट (supreme court) का फैसला
यह मामला सुप्रीम कोर्ट (supreme court)में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आया।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) की प्रमुख टिप्पणियाँ
- आपराधिक पृष्ठभूमि पर्याप्त आधार नहीं:अदालत ने कहा कि केवल आपराधिक पृष्ठभूमि या पूर्व मामलों की वजह से किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं।
- लंबे समय तक विचाराधीन कैद:आरोपी पहले ही एक वर्ष जेल में रह चुके थे, और फिर दो वर्ष तक जमानत पर भी रहे। इस दौरान उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया। ऐसे में उनकी जमानत अचानक रद्द करना अनुचित है।
- जमानत रद्द करने का सिद्धांत:अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत तभी रद्द की जा सकती है जब ठोस सबूत हों कि आरोपी:
- गवाहों को प्रभावित कर रहा है,
- सबूतों से छेड़छाड़ कर रहा है, या
- मुक़दमे की निष्पक्षता को प्रभावित कर रहा है।
- न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर का सिद्धांत:पीठ ने कहा कि वे हमेशा उस स्वर्णिम सिद्धांत की ओर झुकेंगे, जो न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने प्रतिपादित किया था— “जमानत एक नियम है और जेल अपवाद।”
अंतरिम जमानत शर्तों के उल्लंघन का आरोप
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट (supreme court) में तर्क दिया कि पाँच में से दो आरोपियों ने अंतरिम जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया। उन पर आरोप था कि उन्होंने अलाप्पुझा ज़िले में प्रवेश करके एक व्यक्ति को धमकाया।
लेकिन बचाव पक्ष ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा:
- आरोपी केवल अदालत की कार्यवाही में शामिल होने के लिए ज़िले में गए थे।
- जिस व्यक्ति ने धमकी का आरोप लगाया था, उसने बाद में अदालत में इस दावे से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने कहा कि इस तरह के आरोप यदि सिद्ध हो जाते तो ज़रूर गंभीर होते, लेकिन सिर्फ़ आरोप मात्र पर जमानत रद्द नहीं की जा सकती।
जमानत न्यायशास्त्र का विश्लेषण
भारतीय न्यायशास्त्र में जमानत का विषय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
- संवैधानिक दृष्टिकोण
अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसका अर्थ है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो, तब तक आरोपी को अनावश्यक रूप से जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। - सुप्रीम कोर्ट (supreme court) की पूर्व टिप्पणियाँ
- State of Rajasthan v. Balchand (1977): न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने कहा—“जमानत एक नियम है और जेल अपवाद।”
- Gudikanti Narasimhulu v. Public Prosecutor (1978): अदालत ने कहा कि जमानत न देना आरोपी की स्वतंत्रता का हनन है।
- Hussainara Khatoon v. State of Bihar (1979): अदालत ने विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि लंबे समय तक मुक़दमे की देरी के कारण आरोपी को जेल में रखना अन्यायपूर्ण है।
- जमानत और समाज का हित
अदालतें मानती हैं कि समाज के हित की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि कोई आरोपी गवाहों को धमकाता है या सबूत नष्ट करता है, तो उसकी जमानत रद्द की जा सकती है। लेकिन यह केवल कथन या आशंका के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस प्रमाण पर होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) के इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव
- विचाराधीन कैदियों के अधिकार मज़बूत होंगे
यह फैसला संदेश देता है कि न्यायालय केवल आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी को लंबे समय तक जेल में नहीं रख सकते। - निचली अदालतों को मार्गदर्शन
ट्रायल कोर्ट और उच्च न्यायालय दोनों को यह स्पष्ट संकेत मिला है कि जमानत आदेशों में संतुलन और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखना अनिवार्य है। - राजनीतिक मामलों में निष्पक्षता
राजनीतिक हत्या जैसे मामलों में भावनाएँ तीव्र होती हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर निर्णय लेंगी, न कि राजनीतिक माहौल पर। - “बेल एक नियम है” की पुनः पुष्टि
यह निर्णय उन सभी लंबित मामलों पर असर डालेगा जहाँ आरोपी का आपराधिक इतिहास है। अब अदालतें और अधिक सावधानी से देखेंगी कि कहीं आरोपी को अनावश्यक रूप से तो जेल में नहीं रखा जा रहा।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र के लिए एक अहम मील का पत्थर है। अदालत ने साफ़ किया कि:
- आपराधिक पृष्ठभूमि मात्र जमानत से इनकार का आधार नहीं हो सकती।
- लंबी अवधि तक विचाराधीन कैदी को जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
- जमानत तभी रद्द की जानी चाहिए जब ठोस सबूत हों कि आरोपी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने सही कहा कि यदि आरोपी गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने का प्रयास करते हैं, तो अदालतें तुरंत उन्हें वापस जेल भेज सकती हैं। लेकिन जब तक ऐसा कोई प्रमाण न हो, तब तक “जमानत एक नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत ही लागू होगा।
यह फैसला हमें याद दिलाता है कि न्यायालयों का मूल कर्तव्य नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। अभियोजन की कमियों या मुक़दमे की देरी का खामियाज़ा आरोपी को जेल में रहकर नहीं भुगतना चाहिए। यही भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की असली पहचान है।