भोपाल/इंदौर। भारतीय जनता पार्टी सरकार ने प्रदेश के निगम-मंडलों में नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन नियुक्तियों को लेकर सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है और इसे नेताओं को साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। सबसे ज्यादा घमासान इंदौर और भोपाल के विकास प्राधिकरण बोर्ड को लेकर मचा हुआ है।
इंदौर विकास प्राधिकरण: नाम तय, घोषणा अटकी
इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद के लिए भाजपा नेता हरिनारायण यादव का नाम लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन आधिकारिक घोषणा अब तक नहीं हो पाई है। सूत्रों के अनुसार इंदौर और भोपाल—दोनों शहरों के प्राधिकरणों का मामला फिलहाल होल्ड पर रखा गया है।
साथ में बनेगा पूरा राजनीतिक बोर्ड
संगठन की मंशा है कि अध्यक्ष की घोषणा के साथ ही दोनों शहरों के प्राधिकरणों में राजनीतिक बोर्ड का गठन भी किया जाए। इसी कारण संभावित नामों पर मंथन जारी है।
भाजपा सरकार का ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है और पार्टी के वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि इस अवसर पर अधिक से अधिक नेताओं को जिम्मेदारी देकर संतुलन बनाया जाए।
हरिनारायण यादव का मजबूत दावा
हरिनारायण यादव को इस पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। उनकी पहचान कैलाश विजयवर्गीय के करीबी नेताओं में होती है।
यादव 90 के दशक में एलआईजी वार्ड से पार्षद चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि वे चुनाव जीत नहीं पाए थे। इसके बाद वे दो बार इंदौर विकास प्राधिकरण बोर्ड में उपाध्यक्ष और संचालक के रूप में काम कर चुके हैं। अब वे अध्यक्ष पद की दौड़ में सबसे आगे बताए जा रहे हैं।
अन्य दावेदार भी मैदान में
यादव के अलावा मुकेश राजावत और दीपक जैन (टीनू) के नाम भी चर्चा में हैं।
दीपक जैन को इस बार भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं मिली, जिसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि संगठन उनके लिए किसी अन्य महत्वपूर्ण पद की योजना बना रहा है। ऐसे में उनका दावा भी कमजोर नहीं माना जा रहा।
दल-बदल करने वालों को भी मौका?
सूत्रों के अनुसार यदि प्राधिकरण में राजनीतिक बोर्ड का गठन होता है, तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए नेताओं को भी स्थान दिया जा सकता है। यह कदम पार्टी के विस्तार और संगठनात्मक मजबूती की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
युवा आयोग पर भी नजरें
इसी बीच स्वप्निल कोठारी का नाम युवा आयोग के अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में है। संगठन स्तर पर इसे लेकर भी विचार-विमर्श जारी है।
फिलहाल सस्पेंस बरकरार
हालांकि नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों के प्राधिकरणों को लेकर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है।
राजनीतिक समीकरण, गुटबाजी और संतुलन साधने की कवायद के चलते अंतिम निर्णय में देरी हो रही है