लोकतंत्र की नींव रखने वाला ऐतिहासिक संकल्प

भारत का संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं, बल्कि आज़ाद भारत के सपनों, संघर्षों और समानता के संकल्प का दस्तावेज है। इसकी रचना एक लंबी, लोकतांत्रिक और विचारशील प्रक्रिया का परिणाम रही, जिसने देश को गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
जब भारत आज़ाद हुआ, तब सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जो भाषा, धर्म, जाति और संस्कृति की असंख्य विविधताओं को एक सूत्र में बाँध सके। इसी ऐतिहासिक आवश्यकता ने भारतीय संविधान को जन्म दिया—एक ऐसा संविधान, जो लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की नींव पर खड़ा है।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया आज़ादी से पहले ही शुरू हो चुकी थी। वर्ष 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। यह सभा किसी एक दल या विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी, बल्कि इसमें देश के हर वर्ग और क्षेत्र की आवाज़ शामिल थी। यही कारण है कि भारतीय संविधान को जनता की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब कहा जाता है।

संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस ऐतिहासिक कार्य को दिशा दी। विशेष रूप से डॉ. अंबेडकर की भूमिका केंद्रीय रही। उन्होंने संविधान को केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों को अधिकारों की गारंटी देना इसी सोच का परिणाम था।

करीब 2 वर्ष 11 माह 18 दिन तक चली संविधान निर्माण की प्रक्रिया में हर अनुच्छेद पर गहन बहस हुई। यह दिखाता है कि संविधान किसी जल्दबाजी का दस्तावेज नहीं, बल्कि गहन मंथन से निकला हुआ समझौता है—जहाँ आदर्शों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन साधा गया।

भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों—दोनों को समान महत्व देता है। मौलिक अधिकार नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्व सरकार को कल्याणकारी राज्य की दिशा दिखाते हैं। यह संतुलन ही संविधान को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखता है।

26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। इसी दिन भारत एक संप्रभु गणराज्य बना। 26 जनवरी का चयन अपने आप में ऐतिहासिक था, क्योंकि 1930 में इसी दिन पूर्ण स्वराज का संकल्प लिया गया था।

आज जब संविधान की मूल भावना पर बार-बार बहस होती है, तब यह समझना जरूरी है कि संविधान केवल सरकार चलाने का उपकरण नहीं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच सामाजिक अनुबंध है। यह अधिकार देता है, तो कर्तव्य भी याद दिलाता है।

संपादकीय दृष्टि से, संविधान की रक्षा केवल संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसे जीवित रखने का दायित्व हर नागरिक पर है। संविधान सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा—और लोकतंत्र मजबूत रहेगा, तभी भारत अपने मूल्यों के साथ आगे बढ़ेगा।
संविधान केवल किताबों में रखने की वस्तु नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के आचरण में उतारने की आवश्यकता है। यही इसकी सच्ची श्रद्धांजलि है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This will close in 0 seconds

error: Content is protected !!