
Denvapost exclusive। अगर शिक्षा समिति का काम सिर्फ बैठकें न करना होता, तो जनपद की शिक्षा समिति अपने लक्ष्य से कहीं आगे निकल चुकी है।
दो साल।चार बैठकें। और गांवों में बर्बाद होती शिक्षा।
यह उपलब्धि नहीं तो और क्या है?
ग्रामीण अंचल के शासकीय स्कूलों की हालत देखकर एक बात साफ हो जाती है— विभाग बेबस है, जनप्रतिनिधि बेख़बर हैं और शिक्षा समिति पूरी तरह बेपरवाह।
यह आरोप नहीं है। यह ज़मीनी सच है, जो स्कूलों की टूटी कुर्सियों, बंद कमरों और गायब शिक्षकों में साफ दिखाई देता है।
13 साल से शिक्षक, लेकिन पढ़ाने की सजा नहीं
पवारखेड़ा खुर्द प्राथमिक स्कूल में एक शिक्षक पिछले 13 वर्षों से निर्वाचन कार्यों में सेवाएं दे रहा है।
मतलब लोकतंत्र मजबूत हो रहा है,
लेकिन शिक्षा को लगातार कमजोर किया जा रहा है।
जिस काम के लिए शिक्षक नियुक्त हुआ—पढ़ाने के लिए—
वह काम शायद उसकी नौकरी की शर्तों में अब शामिल ही नहीं है।
प्रस्ताव पंचायत से जनपद तक गया।
फाइल चली।
लेकिन नतीजा वही—शून्य।
शायद शिक्षा समिति का मानना है कि
बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, लेकिन चुनाव समय पर होने चाहिए।
भवन खड़ा है, शिक्षा लापत
सुप्लई गांव में स्कूल भवन बने एक साल हो गया। ईंट, सीमेंट, छत—सब कुछ है। बस स्कूल नहीं है।
बच्चे दूसरे गांव जाने को मजबूर हैं
और यह इमारत खड़ी है—सरकारी उदासीनता का स्मारक बनकर।अगर भवन ही शिक्षा होता,तो आज ठेकेदारों को नोबेल मिल रहे होते।
कहीं स्कूल से एलर्जी, कहीं मेडिकल अमर
सैंडरवाड़ा में एक महिला शिक्षिका को स्कूल आने से परहेज है। खरगावली में शिक्षिका का मेडिकल ऐसा है।जो न खत्म होता है, न सवालों के घेरे में आता है। लगता है मेडिकल प्रमाणपत्र अब
बीमारी का नहीं,सरकारी गैरहाज़िरी का लाइसेंस बन चुका है।
शिक्षा समिति? उसे शायद लगता है—“चलने दो, सिस्टम यूं ही चलता है।”
स्कूल गया, दीवार आई
मोहासा धमासा टोला की ईजीएस शाला बंद हो गई। लेकिन आश्चर्य देखिए— तीन लाख रुपये की बाउंड्री वॉल खड़ी हो गई।स्कूल नहीं।बच्चे नहीं।पढ़ाई नहीं। लेकिन दीवार है। क्योंकि दीवार में भुगतान है और शिक्षा में सिर्फ जिम्मेदारी।
शिक्षा समिति: अज्ञान या अनदेखी?
सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि स्कूल बदहाल हैं। सबसे खतरनाक बात यह है किcजनपद शिक्षा समिति को इसकी भनक तक नहीं लगती और अगर लग भी जाए, तो क्या? बैठक अगली तिथि तक टाल दी जाती है।
जहां पैसा, वहां सक्रियता
यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि— जहां निर्माण का पैसा होता है, वहां जनप्रतिनिधि दौड़ते हैं। जहां शिक्षा होती है, वहां सब बैठ जाते हैं। क्योंकि शिक्षा में ना टेंडर है,ना कमीशन ,ना उद्घाटन की फोटो।
सवाल पूछो तो याददाश्त लौट आती है
जब देनवापोस्ट ने शिक्षा समिति सभापति लालचंद यादव से सवाल किए,तो उन्हें अचानक बैठक करने की याद आ गई। समस्याएं हल करने की बातें भी होने लगीं।
पुरानी खबरें गवाह हैं कि— यही वादे पहले भी किए गए थे, न बैठकें हुईं,न स्कूल सुधरे। यानी बयान हर बार नया,
लेकिन नीयत और नतीजा—पुराना और खोखला।
कुर्सी सुरक्षित, शिक्षा असुरक्षित
आज जनपद पंचायत में कुर्सी सुरक्षित है, पद सुरक्षित है, समिति सुरक्षित है।
असुरक्षित है तो गांव का स्कूल, गरीब का बच्चा, और उसका भविष्य।
अगर दो साल में चार बैठकें पर्याप्त हैं, शिक्षक स्कूल जाएं या न जाएं कोई फर्क नहीं पड़ता, स्कूल बंद हों लेकिन दीवारें बनती रहें—तो फिर जनपद शिक्षा समिति को तत्काल भंग कर देना ही ज्यादा ईमानदार कदम नहीं होगा?
क्योंकि जब निगरानी सिर्फ कागज़ों में हो, तो शिक्षा ज़मीन पर नहीं, कब्र में पहुंच जाती है।